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महाराष्ट्र के 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित, अन्नदाताओं को बड़ी राहत

महाराष्ट्र के 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित, अन्नदाताओं को बड़ी राहत

महाराष्ट्र की सियासत और ग्रामीण आर्थिकी इन दिनों एक बेहद संवेदनशील मोड़ से गुजर रही है। राज्य के लाखों किसानों के माथे पर चिंता की जो रेखाएं पिछले कई महीनों से गहरी होती जा रही थीं, उन्हें पाटने के लिए सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्राकृतिक मार और बारिश की बेरुखी से बुरी तरह प्रभावित महाराष्ट्र के 265 तालुकों को आधिकारिक तौर पर सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अन्नदाताओं को कर्ज और बिजली बिलों के मोर्चे पर बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जिसकी दरकार वे लंबे समय से कर रहे थे।

बारिश की बेरुखी और कुदरत का कहर

इस साल मानसून का मिजाज राज्य के कई जिलों में बेहद निराशाजनक रहा। खरीफ सीजन की शुरुआत से ही बादलों की आंख मिचौनी ने किसानों की नींद उड़ा रखी थी। कई इलाकों में तो बुवाई के तुरंत बाद बारिश ने ऐसा मुंह मोड़ा कि लहलहाती फसलें खेतों में ही सूख गईं। भूजल स्तर नीचे चला गया और कुएं व बोरवेल जवाब दे गए। ऐसे में खेतों में खड़ी फसल को बचाना तो दूर, पीने के पानी का संकट भी गहराने लगा था। राज्य के कृषि विशेषज्ञों और जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने यह माना कि स्थिति वाकई गंभीर है और तत्काल प्रभाव से सहायता पहुंचाए जाने की जरूरत है।

किन जिलों और तालुकों पर गिरी है गाज?

प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, विदर्भ, मराठवाड़ और उत्तर महाराष्ट्र के कई इलाके इस सूखे की चपेट में सबसे ज्यादा आए हैं। इन क्षेत्रों में बारिश का औसत सामान्य से बेहद कम दर्ज किया गया। मराठवाड़ा के कई जिलों में तो जलाशयों का जलस्तर न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुका है। सरकार द्वारा जारी सूची के अनुसार कुल 265 तालुकों को गंभीर और मध्यम सूखे की श्रेणी में रखा गया है, जहां कृषि उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

किसानों को क्या-क्या मिलेंगी राहतें?

सूखाग्रस्त घोषित किए जाने के बाद सरकार के नियमानुसार कई प्रकार की राहत योजनाएं स्वतः लागू हो जाती हैं। किसानों के लिए यह किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। आइए जानते हैं कि इस फैसले से जमीन पर क्या बदलाव आएंगे:

  • कृषि ऋण वसूली पर रोक: सूखाग्रस्त घोषित तालुकों में बैंकों द्वारा किसानों से फसल ऋण (Crop Loan) की जबरन वसूली नहीं की जा सकेगी। कर्ज चुकाने की समयसीमा को आगे बढ़ाया जाएगा।
  • बिजली बिलों में छूट: किसानों को कृषि पंपों के लिए आने वाले बिजली बिलों में भारी राहत या आंशिक माफी का लाभ मिलेगा। इससे सिंचाई के खर्च का बोझ कुछ कम होगा।
  • स्कूल और कॉलेज की फीस माफी: सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के बच्चों की शिक्षण संस्थाओं में ट्यूशन फीस और परीक्षा शुल्क माफ किए जाने का प्रावधान है।
  • घरेलू बिजली कनेक्शन नहीं कटेंगे: आपातकालीन स्थिति को देखते हुए बिजली आपूर्ति बाधित करने पर रोक लगाई जाती है।
  • रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS): ग्रामीण क्षेत्रों में काम की मांग बढ़ने पर मनरेगा के तहत काम के दिनों और बजट को बढ़ाया जाएगा ताकि पलायन रोका जा सके।

प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय, सर्वे का काम तेज

राज्य के राहत और पुनर्वास विभाग ने सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का आकलन (पंचनामा) जल्द से जल्द पूरा करें। सरकार का जोर इस बात पर है कि किसी भी पात्र किसान का नाम सूची से छूटने न पाए। राजस्व अधिकारियों की टीमें गांवों का दौरा कर रही हैं और जमीनी हकीकत का जायजा ले रही हैं।

विपक्ष और किसान संगठनों का कहना है कि यह फैसला भले ही देर से आया हो, लेकिन इसका क्रियान्वयन बहुत पारदर्शिता के साथ होना चाहिए। अक्सर यह शिकायत मिलती है कि कागजी घोषणाएं जमीन पर बैठे अंतिम छोर के किसान तक नहीं पहुंच पाती हैं। ऐसे में सरकार और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि राहत सामग्री और वित्तीय मदद सीधे जरूरतमंदों के बैंक खातों में पहुंचे।

आगे की राह और चुनौतियां

सिर्फ कर्ज माफी या बिजली बिलों की राहत से ही इस संकट का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में वाटरशेड डेवलपमेंट, ड्रिप सिंचाई और फसल चक्र में बदलाव जैसी दीर्घकालिक योजनाओं पर युद्धस्तर पर काम करने की जरूरत है। बार-बार आने वाले सूखे से निपटने के लिए जल संरक्षण ही एकमात्र अचूक उपाय है।

फिलहाल, 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने से किसानों को मानसिक और आर्थिक संबल जरूर मिला है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासनिक अमला इस राहत पैकेज को कितनी तेजी से जमीन पर उतार पाता है, ताकि इस विकट परिस्थिति में अन्नदाता की सांसें कुछ और संभल सकें।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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