महाराष्ट्र में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने कुपोषित बच्चों में तपेदिक यानी टीबी (TB) की बीमारी की जल्द से जल्द पहचान करने और समय पर इलाज मुहैया कराने के लिए अपने स्वास्थ्य तंत्र को पूरी तरह से सक्रिय कर दिया है। इसके तहत पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRC) में बच्चों की टीबी जांच की प्रक्रिया को न केवल मजबूत किया गया है, बल्कि इसके दायरे को भी व्यापक रूप से फैलाया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल यानी 2026 में जुलाई तक कुल भर्ती बच्चों में से 94 प्रतिशत की स्क्रीनिंग पूरी कर ली गई है, जो स्वास्थ्य विभाग की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।
कुपोषण और टीबी का खतरनाक गठजोड़ और सरकार की रणनीति
चिकित्सकीय रूप से यह प्रमाणित है कि कुपोषण और टीबी का पुराना और गहरा संबंध है। कुपोषित बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बेहद कमजोर होती है, जिस वजह से वे किसी भी संक्रमण की चपेट में बहुत जल्दी आ जाते हैं। इनमें टीबी का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। इसी खतरे को भांपते हुए, राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने मुख्यमंत्री के निर्देशों के तहत पोषण पुनर्वास केंद्रों में आने वाले हर एक बच्चे की व्यापक जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
कुपोषण के चक्र को तोड़ने के लिए बाल टीबी की समय पर पहचान, उसका सटीक निदान और तुरंत उपचार बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य विभाग महिला और बाल विकास विभाग के साथ मिलकर इस दिशा में निरंतर काम कर रहा है ताकि कोई भी बच्चा इस गंभीर बीमारी की गिरफ्त में आकर लाचार न हो सके।
जुलाई 2026 तक के आंकड़े: 94 प्रतिशत बच्चों की स्क्रीनिंग
स्वास्थ्य विभाग की तरफ से जारी रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में टीबी जांच के आंकड़ों में जबरदस्त सुधार देखने को मिला है। साल 2021 से लेकर जुलाई 2026 तक, पोषण पुनर्वास केंद्रों में कुल 29,875 बच्चे भर्ती हुए थे। इनमें से 26,857 बच्चों की टीबी की जांच सफलताપूर्वक पूरी की गई, जो कुल भर्ती बच्चों का लगभग 89.9 प्रतिशत है।
स्थिति में सुधार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल साल 2026 के शुरुआती महीनों से लेकर जुलाई तक, एनआरसी में भर्ती 3,017 बच्चों में से 2,835 बच्चों यानी पूरे 94 प्रतिशत बच्चों की टीबी जांच की जा चुकी है। यह इस बात का प्रमाण है कि मैदानी स्तर पर स्वास्थ्य अमला कितनी मुस्तैदी से काम कर रहा है।
इलाज के मामलों में आई उल्लेखनीय गिरावट
जांच का दायरा बढ़ने और शुरुआती स्तर पर ही बीमारी का पता चल जाने का सकारात्मक असर इलाज के आंकड़ों पर भी पड़ा है। समय पर बीमारी पकड़ में आने से गंभीर मामलों में कमी दर्ज की गई है:
- वर्ष 2022 के दौरान एनआरसी में भर्ती बच्चों में से 23 बच्चों का टीबी का इलाज शुरू किया गया था।
- यह संख्या घटकर वर्ष 2025 में मात्र 7 रह गई।
- वहीं, चालू वर्ष 2026 में जुलाई तक यह आंकड़ा घटकर केवल 3 बच्चों तक ही सीमित रह गया है।
यह गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और समय पर की जाने वाली स्क्रीनिंग के कारण बच्चों में संक्रमण गंभीर रूप लेने से पहले ही नियंत्रित किया जा रहा है।
अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल और एनआरसी का सशक्तीकरण
बच्चों में टीबी की पहचान को अचूक बनाने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्रों की बुनियादी संरचना में सुधार किया गया है। एनआरसी में भर्ती बच्चों के शारीरिक लक्षणों और उनके परिवार या आसपास किसी टीबी मरीज के संपर्क में आने के इतिहास (Contact History) की बारीकी से जांच की जाती है।
जरूरत पड़ने पर बच्चों के बलगम या अन्य नमूनों का संग्रह किया जाता है। इसके अलावा, आधुनिक तकनीकों जैसे सीबी-नैट (CB-NAAT), ट्रूनेट (Truenat) जांच और छाती के डिजिटल एक्स-रे जैसी उच्चस्तरीय सुविधाओं से बच्चों को जोड़ा जा रहा है। जिन पोषण पुनर्वास केंद्रों में मरीजों की संख्या अधिक है, वहां विशेष रूप से ट्रूनेट और सीबी-नैट मशीनों का विस्तार किया जा रहा है ताकि जांच रिपोर्ट आने में लगने वाला समय न्यूनतम हो सके और इलाज में किसी प्रकार की देरी न हो।
बाल टीबी रोकथाम और प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट पर जोर
केवल उन्हीं बच्चों की जांच नहीं की जा रही जिनमें लक्षण दिख रहे हैं, बल्कि उन बच्चों पर भी विशेष नजर रखी जा रही है जो टीबी मरीजों के संपर्क में आए हैं लेकिन जिनमें फिलहाल कोई लक्षण प्रकट नहीं हुआ है। ऐसे लक्षण-रहित बच्चों को टीबी प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट (TPT) देने के वास्ते घर-घर और एनआरसी स्तर पर संपर्क जांच (Contact Tracing) अभियान को बेहद मजबूत किया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, जटिल मामलों और दवा-प्रतिरोधी (Drug-Resistant) टीबी से जूझ रहे बच्चों के इलाज के लिए एक समर्पित 'बाल टीबी उत्कृष्टता केंद्र' (Paediatric TB Centre of Excellence) स्थापित करने की प्रक्रिया भी तेजी से चल रही है।
निक्षय पोर्टल और पोषण योजनाओं से जुड़ाव
पारदर्शिता और डेटा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए जांच से जुड़ी सभी जानकारियों को केंद्रीय 'निक्षय पोर्टल' (Nikshay Portal) पर ऑनलाइन दर्ज किया जा रहा है। इससे हर एक मरीज की मॉनिटरिंग राष्ट्रीय स्तर पर आसान हो जाती है।
इतना ही नहीं, टीबी से पीड़ित पाए जाने वाले बच्चों को केवल चिकित्सीय मदद ही नहीं दी जा रही, बल्कि उन्हें 'निक्षय पोषण योजना' और 'निक्षय मित्र' पहल के माध्यम से अतिरिक्त पोषण सहायता भी प्रदान की जा रही है ताकि बीमारी से लड़ने के लिए उनके शरीर को पर्याप्त ऊर्जा और पोषक तत्व मिल सकें।
भविष्य की रूपरेखा और विभागों का आपसी समन्वय
प्रशासन का आगामी लक्ष्य राज्य के सभी पोषण पुनर्वास केंद्रों में टीबी जांच के स्तर को 90 प्रतिशत से हमेशा ऊपर बनाए रखना है। जो बच्चे किसी कारणवश अभी तक जांच से छूट गए हैं, उनकी सूची तैयार कर प्रक्रिया पूरी की जा रही है। साथ ही, पात्र बच्चों को समय पर बचाव का इलाज सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के बीच आपसी समन्वय को और अधिक पुख्ता किया जा रहा है ताकि महाराष्ट्र को बाल टीबी मुक्त बनाने के संकल्प को जल्द से जल्द पूरा किया जा सके।