स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलने वाली एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली खबर महाराष्ट्र के नासिक जिले से सामने आ रही है। मालेगांव के प्रतिष्ठित और बड़े 200 बेड वाले सामान्य अस्पताल में इस समय मेडिकल ऑक्सीजन को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुई है। अस्पताल में मरीजों की जान बचाने के लिए सबसे अहम मानी जाने वाली ऑक्सीजन की सप्लाई में लगातार भारी देरी की शिकायतें मिल रही हैं, जिससे वहां भर्ती गंभीर मरीजों और उनके परिजनों की धड़कनें तेज हो गई हैं।
सप्लायर का लाखों का बकाया भुगतान बना संकट की वजह
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक लापरवाही और वित्तीय अड़चनें हैं। ऑक्सीजन गैस की सप्लाई करने वाले वेंडर या सप्लायर का पिछले कई महीनों का लाखों रुपये का बकाया भुगतान अभी तक अस्पताल प्रशासन द्वारा नहीं चुकाया गया है। पैसे न मिलने के कारण सप्लायर ने सप्लाई में या तो भारी कटौती कर दी है या फिर भुगतान मिलने तक हाथ खड़े कर दिए हैं। नतीजा यह है कि अस्पताल के गोदाम में जीवन रक्षक गैस के सिलिंडरों की भारी कमी पैदा हो गई है और तीमारदार दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
अस्पताल के सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, इस 200 बिस्तरों वाले अस्पताल को अपनी सामान्य गतिविधियों और गंभीर मरीजों की देखभाल के लिए रोजाना कम से कम 10 से अधिक ऑक्सीजन सिलिंडरों की सख्त आवश्यकता होती है। लेकिन मौजूदा समय में यह मांग पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा होने की आशंका बनी हुई है।कोरोना काल में लगाए गए ऑक्सीजन प्लांट भी पड़े हैं बंद
इस संकट के बीच एक और बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। कोविड-19 महामारी की विभीषिका के दौरान जब पूरी दुनिया ऑक्सीजन के लिए संघर्ष कर रही थी, तब एहतियात के तौर पर इस अस्पताल में करोड़ों रुपये की लागत से ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट लगाए गए थे ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी आपदा से निपटा जा सके।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि वर्तमान में वे दोनों ही ऑक्सीजन प्लांट ठप पड़े हैं और पूरी तरह से बंद बताए जा रहे हैं। यदि समय रहते इन प्लांट्स की सुध ली गई होती और इन्हें चालू हालत में रखा गया होता, तो आज अस्पताल को बाहरी सप्लायर की मनमानी या बकाये के भुगतान के चक्कर में इस तरह की शर्मनाक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।
मरीजों की जान पर मंडरा रहा है गंभीर खतरा
मालेगांव और आसपास के ग्रामीण इलाकों से गरीब और जरूरतमंद मरीज इलाज के लिए इसी सरकारी अस्पताल पर भरोसा करके आते हैं। ऐसे में ऑक्सीजन जैसी बुनियादी और अति-आवश्यक चिकित्सा सुविधा की किल्लत होना सीधे तौर पर इंसानी जिंदगियों के साथ एक बड़ा खिलवाड़ माना जा रहा है।
- दैनिक जरूरत: अस्पताल को सुचारू रूप से चलाने के लिए रोजाना 10 से ज्यादा सिलिंडरों की जरूरत।
- वित्तीय संकट: ऑक्सीजन सप्लायर का लाखों रुपये का भुगतान अभी भी अटका हुआ है।
- ढांचागत नाकामी: महामारी के दौर में स्थापित ऑक्सीजन प्लांट रखरखाव के अभाव में पड़े हैं बंद।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे तीखे सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों के परिजनों में भारी आक्रोश व्याप्त है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को पहले से ही इस वित्तीय बकाये की जानकारी थी, तो समय रहते इसका समाधान क्यों नहीं निकाला गया? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा था?
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह देखना बेहद अहम होगा कि राज्य का स्वास्थ्य मंत्रालय और जिला प्रशासन इस पर क्या त्वरित कदम उठाता है। क्या सप्लायर का रुका हुआ भुगतान तुरंत जारी कर ऑक्सीजन की नियमित आपूर्ति बहाल की जाएगी, या फिर गरीब मरीजों को भगवान भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा? ताजा हालातों पर हमारी पैनी नजर बनी हुई है और आगे के अपडेट्स जल्द ही साझा किए जाएंगे।