मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लेकर तमाम मेडिकल कॉलेजों में पिछले तीन दिनों से चल रहे घमासान के बाद आखिरकार सरकार ने डॉक्टरों के सामने घुटने टेक दिए हैं। राज्य के इंटर्न डॉक्टरों के सब्र का बांध और उनका उग्र प्रदर्शन रंग लाया है, जिसके बाद सरकार ने उनके मासिक स्टाइपेंड में सात हजार रुपये से ज्यादा की बंपर बढ़ोतरी करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। इस फैसले के बाद अब इन भावी डॉक्टरों को आर्थिक संबल मिलने की उम्मीद जग गई है, जो लंबे समय से अपनी इस जायज मांग को लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे।
ओपीडी बंद होने से बैकफुट पर आई सरकार
हंगामा और गतिरोध तब अपने चरम पर पहुंच गया जब बुधवार को मध्य प्रदेश डॉक्टर महासंघ ने इंटर्न डॉक्टरों के समर्थन में प्रदेश भर के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की ओपीडी (आउट पेशेंट डिपार्टमेंट) पूरी तरह बंद रखने का बड़ा ऐलान कर दिया। इस एक दिन के सांकेतिक लेकिन बेहद प्रभावी बहिष्कार ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की चूलें हिला दीं। दूर-दराज के इलाकों से इलाज की उम्मीद में सरकारी अस्पतालों की दहलीज पर पहुंचे मरीजों को भारी फजीहत और परेशानियों का सामना करना पड़ा। अस्पतालों में लंबी कतारें लगी रहीं और मरीज डॉक्टर को दिखाने के लिए तरस गए। इस आपातकालीन स्थिति ने शासन और प्रशासन पर ऐसा जबर्दस्त मानसिक और राजनीतिक दबाव बनाया कि सरकार को बिना कोई और देर किए तुरंत एक्शन मोड में आना पड़ा।
डिप्टी सीएम से मैराथन बैठक के बाद बनी सहमति
हालात की गंभीरता को भांपते हुए प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने तुरंत मोर्चा संभाला। इंटर्न डॉक्टरों, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन (जुड़ा) और मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन (एमटीए) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल को सीधी बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया। राज्य के स्वास्थ्य महकमे के नुमाइंदों और डॉक्टरों के बीच चली लंबी और दौर-दर-दौर की बैठकों के बाद आखिरकार एक सर्वमान्य समझौते पर मुहर लग गई। हालांकि इंटर्न डॉक्टर अपने पुराने 14,337 रुपये के मासिक स्टाइपेंड को बढ़ाकर सीधे 30,000 रुपये करने की जिद पर अड़े हुए थे, लेकिन सरकार के साथ हुई इस उच्चस्तरीय चर्चा के बाद दोनों पक्षों ने बीच का रास्ता निकालते हुए एक सम्मानजनक आंकड़े पर सहमति जताई।
समझौते के तहत अब इंटर्न डॉक्टरों को संशोधित रूप से₹21,500 का मासिक स्टाइपेंड प्रदान किया जाएगा। भले ही यह मांग पूरी तरह से तीस हजार तक नहीं पहुंच पाई, फिर भी सात हजार रुपये से अधिक की यह एकमुश्त बढ़ोतरी डॉक्टरों के लंबे संघर्ष की एक बड़ी जीत के रूप में देखी जा रही है।
हमीदिया अस्पताल के बाहर हुआ था उग्र प्रदर्शन और लाठीचार्ज
यह पूरा विवाद रातों-रात पैदा नहीं हुआ था। इसके पीछे पिछले तीन दिनों से सुलगती हुई चिंगारी थी। सोमवार को भोपाल के प्रतिष्ठित हमीदिया अस्पताल के मुख्य द्वार पर अपनी मांगों के समर्थन में उतरे सैकड़ों इंटर्न डॉक्टरों ने जोरदार प्रदर्शन किया था। इस दौरान स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी झड़प देखने को मिली। हालात को नियंत्रित करने के नाम पर पुलिस प्रशासन ने बेरहमी दिखाते हुए वाटर कैनन (वज्र वाहन) का इस्तेमाल किया और कथित तौर पर लाठीचार्ज भी कर दिया, जिसमें कई युवा डॉक्टर गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
अस्पताल परिसर में सुरक्षा बलों द्वारा डॉक्टरों पर इस प्रकार की गई कार्रवाई की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गए, जिससे पूरे प्रदेश के मेडिकल बिरादरी में भारी आक्रोश फैल गया। घायल डॉक्टरों के समर्थन में हर कोई खुलकर सामने आने लगा और यह मुद्दा तूल पकड़ता चला गया।
पुलिसिया कार्रवाई पर भी बैठा जांच का बिठाया गया शिकंजा
प्रदर्शन के दौरान डॉक्टरों पर हुए कथित लाठीचार्ज और वाटर कैनन के इस्तेमाल का मामला तूल पकड़ने के बाद शासन स्तर पर इसकी भी प्रशासनिक जांच बैठा दी गई है। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने के बाद पुलिस कमिश्नर संजय कुमार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जोन-2 के डीसीपी विकास सहवाल को इस पूरी घटना का जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया है। प्राथमिक तौर पर अनुशासनहीनता और अत्यधिक बल प्रयोग के मामले में दो पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच भी किया जा चुका है, ताकि नाराज डॉक्टरों के गुस्से को थोड़ा शांत किया जा सके।
प्रमुख बिंदु एक नजर में:
- स्टाइपेंड में बंपर इजाफा: अब इंटर्न डॉक्टरों को प्रति माह 21,500 रुपये दिए जाएंगे।
- लंबे संघर्ष का नतीजा: अपनी मांगों को लेकर पिछले 310 दिनों से लगातार प्रदर्शन कर रहे थे युवा डॉक्टर।
- स्वास्थ्य सेवाओं पर असर: ओपीडी बंद होने से प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों की बढ़ी मुश्किलें।
- उच्चस्तरीय वार्ता: डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल और डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई सफल चर्चा।
- लाठीचार्ज की जांच: हमीदिया अस्पताल के बाहर हुई पुलिसिया कार्रवाई की जांच डीसीपी स्तर के अधिकारी को सौंपी गई।
फिलहाल, सरकार के इस फैसले के बाद प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में चल रहा गतिरोध समाप्त होता नजर आ रहा है। डॉक्टरों ने राहत की सांस ली है और उम्मीद जताई है कि भविष्य में उनकी अकादमिक और आर्थिक जरूरतों को सरकार इसी तरह संवेदनशीलता के साथ पूरा करती रहेगी, ताकि उन्हें अपनी पढ़ाई और मरीजों की सेवा छोड़कर सड़कों पर न उतरना पड़े।