मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में भले ही आसमान से पिछले तीन दिनों से बारिश की बूंदें नहीं गिरी हों, लेकिन प्रकृति का एक अलग ही रूप ग्रामीण इलाकों के लिए आफत बन गया है। नदियां अभी भी उफान पर हैं और उनका बढ़ता जलस्तर लोगों की नींद उड़ाए हुए है। ताजा मामला अंबाह क्षेत्र का है, जहां क्वारी नदी का पानी अचानक रिहायशी इलाकों में घुस आया। इस जलप्रलय जैसे हालात के बीच जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमों ने अदम्य साहस दिखाते हुए एक गर्भवती महिला समेत कुल 112 लोगों की जान बचाई है। आइए जानते हैं इस पूरी घटना की ग्राउंड रिपोर्ट और इससे जुड़े हर एक पहलू को विस्तार से।
अंबाह क्षेत्र में क्वारी नदी बनी आफत
मंगलवार का दिन मुरैना के अंबाह उपखंड के कई गांवों के लिए भारी साबित हुआ। हालांकि रामपुर, कैलारस और मुख्य मुरैना शहर के पास क्वारी नदी का जलस्तर अब कम होता नजर आ रहा है, लेकिन अंबाह इलाके में हालात बिल्कुल विपरीत हो गए। यहां अचानक नदी का पानी तटबंधों को पार करते हुए बस्तियों में जा घुसा। देखते ही देखते तीन बड़े गांव—जिन्ना का पुरा, विपतिपुरा और झरना का पुरा—चारों तरफ से पानी से घिर गए। स्थिति इतनी विकट हो गई कि स्थानीय लोगों के लिए घरों से निकलना असंभव हो गया और वे छतों या ऊंचे स्थानों पर शरण लेने को मजबूर हो गए।
एसडीईआरएफ का साहसिक अभियान: गर्भवती महिला का सुरक्षित रेस्क्यू
जिन्ना का पुरा गांव में पानी भरने की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन हरकत में आ गया। इस गांव में एक गर्भवती महिला के बाढ़ के पानी के बीच फंसे होने की खबर ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी थी। बिना एक पल गंवाए, स्टेट डिजास्टर इमरजेंसी रिस्पांस फोर्स (SDERF) की टीम तुरंत मौके पर पहुंची।
टीम ने तमाम मुश्किलों को पार करते हुए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया और बेहद सावधानी के साथ गर्भवती महिला को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इस सफल रेस्क्यू के बाद टीम का हौसला बढ़ा और उन्होंने आसपास के अन्य प्रभावित इलाकों में भी फंसे लोगों को बाहर निकालने के लिए मोर्चा संभाल लिया।
विपतिपुरा में 71 और झरना का पुरा में 40 लोगों को बचाया
संकट सिर्फ जिन्ना का पुरा तक सीमित नहीं था। विपतिपुरा गांव में हालात यह हो गए थे कि पूरा इलाका किसी टापू में तब्दील हो गया था। मंगलवार की सुबह से लेकर दोपहर तक चले लंबे रेस्क्यू ऑपरेशन में एसडीईआरएफ की टीम ने अथक प्रयास किए। यहां फंसे सभी 71 ग्रामीणों को एक-एक कर सुरक्षित बाहर निकालकर राहत शिविरों या सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया।
वहीं दूसरी ओर, झरना का पुरा गांव में भी क्वारी नदी का पानी तांडव मचा रहा था। गांव के एक बड़े हिस्से में जलभराव के कारण जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया था। कई घरों के चारों तरफ पानी भर जाने के कारण लोग कैद होकर रह गए थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आपदा टीम ने मोटरबोट का सहारा लिया और पानी के तेज बहाव के बीच रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर 40 ग्रामीणों को सुरक्षित रेस्क्यू किया।
किसानों पर टूटा कुदरत का कहर: फसलें हुईं तबाह
बाढ़ और भारी बारिश के पानी ने जहां एक तरफ इंसानी जिंदगियों को खतरे में डाला, वहीं दूसरी तरफ किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। खेतों में खड़े मवेशियों और फसलों का हाल बेहाल है। किसान सभा ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए मंगलवार को कैलारस तहसीलदार सिद्धार्थ गौतम को एक ज्ञापन सौंपा। किसानों ने मांग की है कि सरकार जल्द से जल्द प्रभावित क्षेत्रों में फसलों के नुकसान का विशेष सर्वे करवाए और उन्हें उचित मुआवजा दे।
किसानों का दर्द बयां करते हुए संघ के प्रतिनिधियों ने बताया कि बाजरा, सोयाबीन और तिली जैसी मुख्य फसलें पानी में पूरी तरह डूब चुकी हैं। पानी में डूबे रहने के कारण अब ये फसलें खेतों में ही सड़ने और गलने लगी हैं, जिससे किसानों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
जल निकासी की कमी और खेतों में जमा पानी
प्रभावित किसानों ने प्रशासन के सामने एक और बड़ी समस्या का जिक्र किया है। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में पानी की निकासी (Drainage System) के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यह स्थिति और भी भयावह हो गई है।
- खुमान का पुरा: यहां जल निकासी की व्यवस्था न होने से सैकड़ों बीघा फसल बर्बाद हो गई है।
- अन्य प्रभावित गांव: जयराम पुरा, केंसौपुरा, तोर, बीरमपुर, निरारा, लहचोरा, डोंगरपुर, और बस्तौली रीझौनी जैसे गांवों में खेतों के अंदर पानी भरा हुआ है।
- मांग: किसानों ने प्रशासन से तत्काल प्रभाव से पंप लगाकर पानी निकलवाने और खेतों को खाली करवाने की मांग की है।
मधु मक्खी पालकों को भी भारी आर्थिक नुकसान
इस आपदा की मार सिर्फ पारंपरिक खेती करने वाले किसानों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इससे जुड़े अन्य व्यवसायों को भी भारी क्षति उठानी पड़ी है। मुरैना क्षेत्र में बड़े पैमाने पर किए जाने वाले मधुमक्खी पालन (Beekeeping) को भी बाढ़ ने अपनी चपेट में ले लिया है। कई किसानों और कारोबारियों ने बताया कि बाढ़ के तेज बहाव में उनकी मधुमक्खी पालन की पेटियां बह गईं। इससे उन्हें लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि फसल मुआवजे के साथ-साथ मधुमक्खी पालकों को हुए इस नुकसान को भी राहत सर्वे में शामिल किया जाए ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके।
ग्रामीणों की स्थायी मांग: बनाए जाएं ऊंचे पुल
किसान सभा और स्थानीय नागरिकों ने इस आपदा के बीच एक दीर्घकालिक समाधान की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि हर साल मानसून या नदियों का जलस्तर बढ़ने से कई गांवों का संपर्क मुख्य मार्ग से कट जाता है। आवागमन की इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए कई गांवों में ऊंचे पुलों (High Bridges) के निर्माण की सख्त आवश्यकता है।
ज्ञापन में जिन प्रमुख गांवों के लिए पुल निर्माण की मांग रखी गई है, उनमें ब्रम्हवाजना, मालीवाजना, बिरावली, माधोपुरा, खेड़ा कलां, माधोगढ़, अर्रोदा, सारसवारी का पुरा और बघरोली जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि इन स्थानों पर ऊंचे पुल बन जाएं, तो भविष्य में बाढ़ आने पर इस तरह के रेस्क्यू संकट और जनजीवन ठप होने की नौबत नहीं आएगी।
प्रशासन की सतर्कता और आगे की राह
फिलहाल मुरैना जिला प्रशासन और राहत टीमें राहत एवं बचाव कार्य पूरा होने के बाद नुकसान के आकलन में जुट गई हैं। हालांकि एसडीईआरएफ की मुस्तैदी से एक बड़ा मानवीय संकट टल गया और किसी भी प्रकार की जनहानि की सूचना नहीं है, लेकिन किसानों की टूटी उम्मीदों और बर्बाद हुई फसलों को पटरी पर लाने के लिए प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। देखना यह होगा कि शासन स्तर पर किसानों को कितनी जल्दी और कितना प्रभावी मुआवजा मिल पाता है।