किचन के सबसे जरूरी सामान यानी चीनी की मिठास अब नेपाल के आम नागरिकों के लिए फीकी पड़ती जा रही है। भारत सरकार द्वारा चीनी के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद पड़ोसी देश नेपाल में कीमतों ने ऐसा उछाल मारा है कि आम आदमी की जेब खाली होने लगी है। काठमांडू की सियासत से लेकर बाजारों तक इस बात पर बहस छिड़ गई है कि आखिर पर्याप्त स्टॉक के दावे के बावजूद दाम इतने कैसे बढ़ गए।
संसदीय समिति में गूंजा चीनी का मुद्दा
नेपाल की संसद के उद्योग एवं वाणिज्य तथा श्रम एवं उपभोक्ता हित संसदीय समिति की बैठक में इस मसले पर तीखी चर्चा हुई। समिति के अध्यक्ष रहबर अंसारी ने बाजार में लगातार बढ़ती कीमतों और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा को लेकर गहरी चिंता जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्थिति अब नियंत्रण से बाहर होती जा रही है और इस पर तुरंत कड़े कदम उठाने की जरूरत है।
अंसारी ने बैठक के दौरान अधिकारियों से तीखे सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि कुछ ही महीनों के भीतर चीनी के दामों में इस तरह की बेकाबू तेजी क्यों और कैसे आई? जब पहले यह आधिकारिक आश्वासन दिया गया था कि देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और भारत के निर्यात रोकने के बाद भी कीमतों पर असर नहीं पड़ेगा, तो फिर अचानक यह स्थिति क्यों बन गई?
96 रुपये वाली चीनी पहुंची 130 रुपये प्रति किलो
आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति काफी डरावनी है। नेपाल के बाजारों में आम उपभोक्ताओं को भारी आर्थिक बोझ झेलना पड़ रहा है:
- पुरानी उम्मीद और गणित: पहले यह अनुमान लगाया गया था कि चीनी की कीमत करीब 85 रुपये प्रति किलोग्राम रहेगी और वैट जुड़ने के बाद यह अधिकतम 96 रुपये प्रति किलोग्राम तक पड़ेगी।
- वर्तमान बाजार भाव: हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। आज नेपाल के खुदरा बाजारों में चीनी 105 रुपये से लेकर 130 रुपये प्रति किलोग्राम तक के भाव पर बिक रही है।
- आम जनता पर मार: इतनी कम अवधि में लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने आम परिवारों का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
पर्याप्त स्टॉक के बावजूद दाम क्यों बढ़े?
संसदीय समिति ने इस बात पर सबसे बड़ा सवाल उठाया है कि यदि गोदामों में पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध थी, तो कीमतें आसमान पर क्यों पहुंच गईं? समिति का मानना है कि इसके पीछे केवल भारत का निर्यात प्रतिबंध ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि घरेलू स्तर पर कुप्रबंधन और मुनाफाखोरी का बड़ा हाथ है।
विशेषज्ञों और समिति का मानना है कि समय रहते अन्य वैकल्पिक देशों से चीनी का आयात न किया जाना इस संकट का एक मुख्य कारण है। बाजार के जानकारों का कहना है कि प्रशासनिक सुस्ती और आयातकों की लेट-लतीफी ने स्थिति को और ज्यादा गंभीर बना दिया है।
कार्टेलिंग और कालाबाजारी पर नकेल कसने की मांग
बढ़ती कीमतों के पीछे सिंडिकेट, कार्टेलिंग और जमाखोरी (कालाबाजारी) की आशंकाओं को खारिज नहीं किया जा सकता। संसदीय समिति के अध्यक्ष रहबर अंसारी ने संबंधित मंत्रालयों को आड़े हाथों लेते हुए सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने मांग की है कि:
- उपभोक्ताओं के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए संसद में जल्द से जल्द मजबूत विधेयक और कानून पेश किए जाएं।
- बाजार की निगरानी व्यवस्था (Market Monitoring System) को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखकर उसे बेहद व्यावहारिक और धरातल पर असरदार बनाया जाए।
- महंगे सॉफ्टवेयर की खरीद और सरकारी तंत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए ताकि भ्रष्टाचार की गुंजाइश न बचे।
परिवहन और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं
इस पूरे संकट के बीच कुछ व्यावहारिक और ज़मीनी समस्याओं का भी जिक्र किया गया है। बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण परिवहन लागत (Transportation Cost) काफी बढ़ गई है। नेपाल जैसे पहाड़ी भू-भाग वाले देश में लॉजिस्टिक्स का खर्च हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, और आपूर्ति बाधित होने पर इसका सीधा असर खुदरा कीमतों पर पड़ता है।
आगे की राह और प्रशासनिक चुनौतियां
फिलहाल, नेपाल सरकार और संबंधित महकमों के सामने यह एक बड़ी परीक्षा की घड़ी है। एक तरफ जहां उपभोक्ताओं को राहत पहुंचानी है, वहीं दूसरी तरफ कालाबाजारियों और बिचौलियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की भी दरकार है। यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में त्योहारी सीजन के दौरान आम जनता की मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं। संसदीय समिति की यह चेतावनी यदि सही समय पर रंग लाई, तो उम्मीद की जा सकती है कि बाजारों में स्थिरता लौटेगी और चीनी फिर से आम आदमी की पहुंच के भीतर आ सकेगी।