अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही यह दावा कर रहे हों कि ईरान के साथ चल रहा मौजूदा संघर्ष बहुत जल्द किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंच जाएगा और समाप्त हो जाएगा, लेकिन उनके अपने ही वरिष्ठ सलाहकारों और करीबी सहयोगियों ने उनकी इस उम्मीद पर ठंडा पानी डाल दिया है। अंदरूनी सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार, ट्रंप के रणनीतिक सलाहकारों ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में चेताया है कि ईरान को आसानी से झुकाना नामुमकिन है और यह जंग साल 2029 तक खिंच सकती है।
ट्रंप के दावों से उलट है जमीनी हकीकत
व्हाइट हाउस और पेंटागन के बीच चल रही बैठकों में इस बात पर मंथन तेज हो गया है कि मध्य पूर्व का यह संकट किसी छोटे-मोटे सैन्य अभियान से हल होने वाला नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से अपनी राजनीतिक शैली में त्वरित और बड़े फैसलों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह विश्वास जताया है कि अमेरिकी ताकत के आगे विरोधी ज्यादा टिक नहीं पाते।
हालांकि, उनके रक्षा सलाहकारों और खुफिया एजेंसी के दिग्गजों ने उन्हें जो अद्यतन रिपोर्ट सौंपी है, वह काफी डरावनी है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की रणनीतिक गहराई, उसका मजबूत मिसाइल नेटवर्क और पश्चिम एशिया में फैले उसके प्रॉक्सी नेटवर्क इस बात की पूरी गारंटी देते हैं कि यदि अमेरिका ने पूर्ण पैमाने पर युद्ध छेड़ा, तो यह एक लंबी और कभी न खत्म होने वाली दलदल जैसी स्थिति बन जाएगी।
क्यों 2029 तक खिंच सकता है यह संघर्ष?
1. ईरान की सैन्य और भौगोलिक स्थिति
ईरान का भूगोल ऐसा है कि वहां किसी भी बाहरी सैन्य ताकत के लिए सीधे जमीनी घुसपैठ करना बेहद कठिन है। चारों तरफ से पहाड़ियों और दुर्गम इलाकों से घिरे इस देश ने पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच खुद को एक आत्मनिर्भर रक्षा तंत्र के रूप में विकसित किया है। ईरान के पास भूमिगत मिसाइल ठिकाने हैं, जिन्हें आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकता।
2. प्रॉक्सी नेटवर्क का जाल
तेहरान केवल अपनी सेना के भरोसे नहीं बैठा है। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों में उसके कई वफादार सशस्त्र समूह सक्रिय हैं। अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधी जंग लंबी चलती है, तो ये समूह अमेरिकी सैन्य अड्डों और उसके सहयोगियों (विशेषकर खाड़ी देशों और इजराइल) पर लगातार हमले जारी रख सकते हैं, जिससे युद्ध का दायरा बेकाबू हो जाएगा.
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर मंडराता खतरा
इस संभावित लंबी जंग का असर सिर्फ कूटनीति या सेना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा प्रहार आम आदमी की जेब और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सलाहकारों ने ट्रंप को आगाह किया है कि संघर्ष लंबा खिंचने की स्थिति में:
- कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं: दुनिया का एक बड़ा तेल व्यापार हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिस पर ईरान का सीधा प्रभाव है।
- आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी: समुद्री मार्गों के बंद होने से वैश्विक स्तर पर ईंधन और जरूरी सामानों की भयंकर किल्लत हो सकती है।
- महंगाई में बेतहाशा वृद्धि: अमेरिका समेत पूरी दुनिया में महंगाई रिकॉर्ड तोड़ स्तर पर पहुंच सकती है, जिसका राजनीतिक खामियाजा सत्ता में बैठी पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।
अमेरिकी घरेलू राजनीति और ट्रंप का राजनीतिक भविष्य
डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है, बल्कि उनकी घरेलू राजनीतिक साख का भी सवाल है। अमेरिकी मतदाता अमूमन लंबे विदेशी युद्धों से तंग आ चुके हैं। वियतनाम से लेकर इराक और अफगानिस्तान तक के अनुभवों ने अमेरिकी जनता को यह सिखा दिया है कि अंतहीन लड़ाइयों में देश का धन और जवानों का खून बर्बाद होता है।
यदि यह संघर्ष 2029 तक खिंचता है, तो यह अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा। पेंटागन के भंडार खाली होने लगेंगे और रक्षा बजट पर अत्यधिक बोझ बढ़ेगा। इसके अलावा, विपक्षी दल इस मुद्दे को लपककर ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को उसकी सबसे बड़ी विफलता के रूप में पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
कूटनीति बनाम सैन्य विकल्प: क्या है आगे की राह?
मौजूदा हालात को देखते हुए विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचते हैं—या तो वह कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए बीच का कोई रास्ता निकाले या फिर एक ऐसे युद्ध में कूद पड़े जिसका अंत कब और कैसे होगा, यह खुद अमेरिका को भी नहीं मालूम।
ट्रंप के करीबी सलाहकारों की यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तनाव अपने चरम पर है। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि अमेरिका इस गंभीर सलाह पर कितना गौर करता है और क्या व्हाइट हाउस अपनी आक्रामक रणनीति में कोई बदलाव करता है या नहीं। फिलहाल, दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच यह शीत युद्ध कब खुले संघर्ष में बदलता है या फिर कूटनीति इस आसन्न तबाही को टालने में सफल होती है।