मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में आस्था और परंपरा के नाम पर एक बार फिर से रक्तरंजित खेल खेला गया। हर साल आयोजित होने वाले प्रसिद्ध और विवादित 'गोटमार मेले' ने इस बार भी अपनी क्रूरता से सबको चौंका दिया है। जाम नदी के दोनों किनारों पर आमने-सामने खड़े दो गांवों के बाशिंदों के बीच हुई खूनी पत्थरबाजी में घायलों के आंकड़े ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस खूनी संघर्ष में कुल 1326 लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं, जिन्हें प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की मदद से अस्पतालों में पहुंचाया गया।
खून से लाल हुई जाम नदी: 1326 लोग जख्मी
शुक्रवार को आयोजित हुए इस मेले में पांढुर्णा और सावरगांव के ग्रामीणों के बीच जमकर ईंट-पत्थर चले। सुबह से शुरू हुआ यह खूनी खेल देर शाम तक जारी रहा। स्थिति यह थी कि मेला क्षेत्र किसी युद्ध के मैदान में तब्दील हो चुका था। प्रशासन के तमाम दावों और सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच भयंकर पथराव हुआ। इस हिंसक झड़प में 1300 से अधिक लोग घायल हो गए, जिनके सिर फटे, हाथ-पैर टूटे और शरीर पर गंभीर जख्म आए।
घायलों में कई लोगों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। प्राथमिक उपचार के बाद गंभीर रूप से घायल 8 लोगों को तुरंत बेहतर इलाज के लिए महाराष्ट्र के नागपुर रेफर किया गया है। घायलों में सावरगांव के 33 वर्षीय नितिन भादे और पांढुर्णा के सचिन हाटेकर के पैर टूटने की खबर है। इसके अलावा संजय धारपुरे, प्रीतम योगेश राउत, कैलाश नंदू साहू और जीवन सलामे को भी गंभीर चोटें आई हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इस खूनी खेल में पांच साल का एक मासूम बच्चा योगेश मरावी भी पत्थर की चपेट में आ गया, जिसका सिर फूट गया। वह अपने परिवार के साथ महाराष्ट्र के मोवाड से मेला देखने आया था।
विधायक भी आए नजर, झंडा काटने के दौरान मचा हड़कंप
शाम के वक्त जब पांढुर्णा पक्ष के एक युवक ने कुल्हाड़ी से जाम नदी के बीचों-बीच लगे पलाश के पेड़ का झंडा काटा, तो माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया। झंडा काटने के दौरान तीन युवक टिन शेड के नीचे दब गए और उन पर लगातार पत्थर बरसाए गए। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि कैसे जान जोखिम में डालकर इस परंपरा को अंजाम दिया जा रहा है।
खास बात यह रही कि पांढुर्णा से कांग्रेस विधायक निलेश उईके खुद इस पत्थरबाजी के दौरान मैदान में सक्रिय नजर आए। हालांकि, बाद में उन्होंने बयान देते हुए कहा कि वे पिछले 10 साल से इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं और लोगों को संयम बरतना चाहिए ताकि किसी की जान खतरे में न पड़े।
300 साल पुरानी खूनी प्रेम कहानी से जुड़ा है इतिहास
आखिर क्या है इस खूनी खेल के पीछे की सच्चाई? स्थानीय लोक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, गोटमार मेले की यह क्रूर परंपरा करीब 300 साल पुरानी एक दर्दनाक प्रेम कहानी से जुड़ी है। कहा जाता है कि पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की एक युवती के बीच प्रेम संबंध था। सामाजिक बंदिशों के चलते जब वे दोनों घर से भाग निकले, तो जाम नदी पार करते वक्त दोनों गांवों के लोग आमने-सामने आ गए और उनके बीच भयंकर पत्थरबाजी हुई, जिसमें उन प्रेमियों की मौत हो गई थी।
तभी से इस घटना की याद में या इसे एक शगुन मानकर हर साल जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ और झंडा गाड़ा जाता है। दोनों गांवों के खिलाड़ी इस झंडे को हासिल करने के लिए एक-दूसरे पर पत्थरों की बरसात करते हैं। जो पक्ष झंडा उतारने में कामयाब होता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है।
प्रशासन के कड़े इंतजाम भी पड़े फीके
इस बार मेले में हिंसा को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए 700 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। चप्पे-चप्पे पर नजर रखने के लिए 10 सीसीटीवी कैमरे और 3 ड्रोन कैमरों की मदद ली जा रही थी। जिला कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ और पुलिस अधीक्षक खुद स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए थे।
घायलों के तुरंत इलाज के लिए मेला क्षेत्र में ही 7 अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए थे। स्वास्थ्य विभाग की ओर से 44 डॉक्टरों की स्पेशल टीम और 22 एंबुलेंस चौबीस घंटे तैनात रखी गई थीं। प्रशासन ने गोफन और धारदार हथियारों के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा रखा था, लेकिन इसके बावजूद पारंपरिक जिद और जुनून के आगे एडमिनिस्ट्रेटिव पाबंदियां बेअसर साबित हुईं और खूनखराबा टल नहीं सका।
निष्कर्ष: आस्था और आधुनिकता के बीच सुलगता सवाल
21वीं सदी के इस आधुनिक दौर में भी जब लोग अंतरिक्ष और विज्ञान की बात कर रहे हैं, मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में इंसानी खून से होली खेलने की यह परंपरा कई गंभीर सवाल खड़े करती है। हालांकि स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इसे लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत बताकर बचाव करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस तरह की जानलेवा परंपरा को अब सुधारने या बदलने की जरूरत नहीं है? हर साल सैकड़ों लोगों का घायल होना और अस्पतालों के बिस्तर पर दर्द सेाहना किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।