वैश्विक कूटनीति और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इन दिनों नई दिल्ली में हो रही हलचल ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। भारत की राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित 'भारत मंडपम' परिसर में चल रहे ब्रिक्स बिजनेस समिट 2026 के मंच से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों के प्रमुख आर्थिक समूह 'G7' पर एक तीखा और बड़ा बयान दिया है। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया है, जहां आर्थिक ध्रुवीकरण और वैश्विक सत्ता के समीकरणों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।
ब्रिक्स बिजनेस समिट में पुतिन के तीखे तेवर
समिट को संबोधित करते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की बदलती तस्वीरों का कच्चा चिट्ठा सबके सामने रखा। उन्होंने आंकड़ों के जरिए पश्चिमी देशों के उस अहंकार को करारा जवाब दिया, जो लंबे समय से दुनिया की वित्तीय व्यवस्था पर अपना एकाधिकार समझते आए हैं। पुतिन ने दो टूक शब्दों में कहा कि दुनिया के आर्थिक नक्शे पर अब पश्चिम के दिग्गजों का नहीं, बल्कि उभरते हुए नए देशों के समूहों का सिक्का चल रहा है।
उन्होंने अपने संबोधन में वैश्विक जीडीपी (GDP) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले पांच वर्षों के दौरान दुनिया की कुल जीडीपी में 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान अकेले ब्रिक्स (BRICS) देशों ने दिया है। इसके ठीक विपरीत, दुनिया के सबसे विकसित देशों का संगठन कहे जाने वाले 'G7' (ग्रेट सेवन) का योगदान इस अवधि में सिमटकर मात्र 29 प्रतिशत पर आ गया है। इस आंकड़े ने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक आर्थिक शक्ति का केंद्र अब पश्चिम से शिफ्ट होकर ग्लोबल साउथ और एशिया की तरफ आ रहा है।
आर्थिक वृद्धि में ब्रिक्स का दबदबा
सिर्फ जीडीपी में हिस्सेदारी ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक विकास दर में तेजी लाने के मामले में भी ब्रिक्स देशों ने पश्चिमी देशों को पीछे छोड़ दिया है। पुतिन ने आंकड़ों की बाजीगरी को समझाते हुए बताया कि बीते पांच वर्षों में ग्लोबल इकोनॉमी में जितनी भी कुल वृद्धि दर्ज की गई है, उसका आधा से ज्यादा हिस्सा ब्रिक्स सदस्यों की बदौलत आया है। वहीं दूसरी ओर, G7 देशों का इस पूरी वृद्धि में योगदान महज 18 फीसदी के आसपास ही सिमट कर रह गया है।
इन आंकड़ों के जरिए रूसी राष्ट्रपति ने यह साफ संदेश देने की कोशिश की है कि भविष्य की दुनिया इन उभरते हुए बाजारों के इर्द-गिर्द ही घूमने वाली है। उन्होंने कहा कि यह महज कुछ सालों के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह एक स्थाई बदलाव का संकेत हैं जो यह बताता है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय नीतियां किस दिशा में आगे बढ़ेंगी।
G7 से आगे निकलने की मुख्य वजह क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि पुतिन द्वारा उठाया गया यह सवाल और आंकड़े बेबुनियाद नहीं हैं। इसके पीछे ठोस भौगोलिक और जनसांख्यिकीय कारण हैं। राष्ट्रपति पुतिन ने खुद इस बात का खुलासा किया कि ब्रिक्स समूह की इस अदम्य ताकत के पीछे उनकी विशाल आबादी और बेहद गतिशील घरेलू बाजार हैं।
उन्होंने बताया कि दुनिया की आधी से अधिक आबादी आज ब्रिक्स देशों के भीतर निवास करती है। इतनी बड़ी आबादी होने का सीधा मतलब है कि इन देशों के पास अपना खुद का एक बहुत बड़ा, जीवंत और सक्रिय घरेलू बाजार मौजूद है। जब देश की अपनी जनता उपभोक्ता बनती है और आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं, तो बाहरी झटके या वैश्विक मंदी का असर उस अर्थव्यवस्था पर कम पड़ता है। इसके अलावा, प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन और तीव्र गति से आगे बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक इस समूह को और अधिक मजबूत बना रही है।
भारत मंडपम में पीएम मोदी और पुतिन की अहम बैठक
इस हाई-प्रोफाइल बिजनेस समिट के इतर, कूटनीतिक गलियारों में भारत और रूस के बीच की नजदीकी एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई। भारत मंडपम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच करीब 45 मिनट तक एकांत और बेहद महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बैठक के दौरान दोनों नेताओं के बीच आपसी रणनीतिक साझेदारी को और प्रगाढ़ करने पर लंबी चर्चा हुई।
खास बात यह रही कि बैठक खत्म होने के बाद दोनों वैश्विक नेता प्रोटोकॉल से हटकर एक ही कार में सवार होकर इंडस्ट्रियल एग्जीबिशन का दौरा करने पहुंचे। इस दौरान उनके बीच सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार और रक्षा सहयोग पर ही बात नहीं हुई, बल्कि मौजूदा समय में सुलग रहे मध्य-पूर्व (Middle East) के हालात और वैश्विक शांति के मुद्दों पर भी गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया।
रूस का आमंत्रण और भारत की कूटनीतिक कसमसाहट
इस मुलाकात का एक और सबसे बड़ा आकर्षण रूस की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला आधिकारिक न्योता रहा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पीएम मोदी को आगामी 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन (India-Russia Summit) के लिए रूस आने का औपचारिक आमंत्रण दिया। भारतीय प्रधानमंत्री ने इस निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कर लिया है, जो यह दर्शाता है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और भू-राजनीतिक बदलावों के बावजूद भारत और रूस की दोस्ती समय की कसौटी पर खरी उतर रही है।
ब्रिक्स बिजनेस समिट के इस मंच से जो संदेश निकला है, वह आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दशा और दिशा तय करने के लिए काफी है। एक तरफ जहां पश्चिमी देश अपनी घटती प्रासंगिकता को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, वहीं ब्रिक्स जैसे संगठन दुनिया को एक नया और बहुध्रुवीय (Multiplex) विकल्प देने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहे हैं।