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फोन एडिक्शन से पाना है छुटकारा? एंड्रॉइड और आईफोन में ऐसे ऑन करें फोकस मोड

फोन एडिक्शन से पाना है छुटकारा? एंड्रॉइड और आईफोन में ऐसे ऑन करें फोकस मोड

स्मार्टफोन की लत को नियंत्रित करने के लिए आईफोन और एंड्रॉइड दोनों ऑपरेटिंग सिस्टम में इनबिल्ट 'फोकस मोड' और 'डिजिटल वेलबीइंग' जैसे उपयोगी फीचर्स दिए गए हैं, जिनकी मदद से बार-बार फोन देखने की आदत और अनचाहे नोटिफिकेशन से राहत पाई जा सकती है।

वर्तमान समय में स्मार्टफोन काम, पढ़ाई और सामाजिक संपर्क का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। हालांकि, बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया रील्स और बिना किसी खास वजह के फोन चेक करने की आदत अक्सर जरूरी कार्यों से ध्यान भटका देती है। इन आधुनिक तकनीकी विकर्षणों से निपटने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम स्तर पर कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जो यूजर को स्क्रीन टाइम पर बेहतर नियंत्रण देने का काम करते हैं। इन फीचर्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए फोन को पूरी तरह स्विच ऑफ करने या खुद को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह काटने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि तयशुदा नियमों के तहत डिजिटल दखल को सीमित किया जा सकता है।

आईफोन में फोकस मोड सेट करने की प्रक्रिया

एप्पल के आईओएस (iOS) इकोसिस्टम में 'फोकस' नाम से एक डेडीकेटेड फीचर मिलता है, जिसके जरिए वर्क, पर्सनल और स्लीप जैसे विभिन्न मोड सेट किए जा सकते हैं। इस फीचर को एक्टिवेट करने के लिए सबसे पहले डिवाइस की सेटिंग्स में जाकर 'फोकस' विकल्प को चुनना होता है। यहां यूजर अपनी जरूरत के अनुसार पहले से दिए गए मोड चुन सकता है या अपना कोई नया कस्टम फोकस तैयार कर सकता है। इसके बाद यह तय किया जाता है कि किस खास व्यक्ति के कॉल या मैसेज आने दें और किन चुनिंदा ऐप्स के नोटिफिकेशन स्क्रीन पर दिखाई दें। 'ऐड शेड्यूल' विकल्प के माध्यम से इसे किसी विशिष्ट समय, स्थान या किसी खास ऐप के इस्तेमाल के दौरान स्वतः चालू होने के लिए भी प्रोग्राम किया जा सकता है। इसके अलावा, यदि यूजर के पास अन्य एप्पल डिवाइसेज भी हैं, तो 'शेयर अक्रॉस डिवाइसेज' विकल्प की मदद से इन सेटिंग्स को सभी उपकरणों पर एक साथ सिंक किया जा सकता है।

एंड्रॉइड स्मार्टफोन में ऐसे रोकें ध्यान भटकाने वाली ऐप्स

एंड्रॉइड स्मार्टफोन्स में यह सुविधा 'डिजिटल वेलबीइंग' (Digital Wellbeing) के भीतर 'फोकस मोड' के रूप में उपलब्ध होती है। इसका उपयोग करने के लिए फोन की सेटिंग्स में जाकर डिजिटल वेलबीइंग सेक्शन खोलना होता है, जहां फोकस मोड का विकल्प मिलता है। इसके बाद उन ऐप्स का चयन किया जाता है जिनसे यूजर का ध्यान सबसे ज्यादा भटकता है। इस मोड के चालू होने पर चुनी गई ऐप्स अस्थायी रूप से पॉज हो जाती हैं, जिससे न तो उनका इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही उनके नोटिफिकेशन परेशान करते हैं। इसमें भी 'सेट ए शेड्यूल' का विकल्प मिलता है, जिससे पढ़ाई या दफ्तर के कामकाजी घंटों के मुताबिक इसे स्वतः सक्रिय होने के लिए सेट किया जा सकता है। हालांकि, अलग-अलग स्मार्टफोन ब्रांड्स के यूजर इंटरफेस के आधार पर सेटिंग्स के नामों या मेनू में मामूली अंतर हो सकता है।

ऐप टाइमर और स्क्रीन टाइम सीमा का उपयोग

केवल नोटिफिकेशन बंद करना ही फोन की लत से बचने का एकमात्र उपाय नहीं है। यदि कोई यूजर इंस्टाग्राम, यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अत्यधिक समय बिताता है, तो एंड्रॉइड के डिजिटल वेलबीइंग में मौजूद 'ऐप टाइमर्स' (App Timers) की मदद ले सकता है। इसमें हर ऐप के लिए रोजाना की समय सीमा तय की जा सकती है, और तय सीमा पूरी होने पर वह ऐप उस दिन के लिए बंद हो जाती है तथा उसका आइकन धुंधला यानी ग्रेस्केल हो जाता है। इसी प्रकार, आईफोन पर भी नोटिफिकेशन सीमित करने और गैर-जरूरी ऐप्स को होम स्क्रीन से हटाकर विकर्षण की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, फोकस मोड या डिजिटल वेलबीइंग फीचर्स कोई जादुई समाधान नहीं हैं, बल्कि यह फोन के इस्तेमाल से जुड़ी आदतों को सुधारने की दिशा में एक शुरुआती कदम भर हैं। सोने से पहले फोन को बिस्तर से दूर रखना, गैर-जरूरी ऐप्स के नोटिफिकेशन डिसेबल करना और बिना किसी ठोस वजह के बार-बार स्क्रीन अनलॉक करने की प्रवृत्ति से बचना जैसे छोटे बदलाव लंबी अवधि में स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

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काव्या त्रिपाठी

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Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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