महाकाल की नगरी उज्जैन में इन दिनों विकास कार्यों और प्राचीन आस्था के बीच एक अनोखा तकनीकी और धार्मिक पेंच फंस गया है। साल 2028 में होने वाले महाकुंभ 'सिंहस्थ' की तैयारियों के मद्देनजर शहर में सड़कों के चौड़ीकरण का काम तेजी से चल रहा है। इसी विकास प्रक्रिया के तहत कंठाल चौराहा से छत्री चौक के बीच आड़े आ रहे एक अति प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर को हटाने की कोशिशें पिछले कई दिनों से जारी हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि तमाम आधुनिक क्रेन और भारी-भरकम मशीनों के बावजूद इस प्रतिमा को उसकी जगह से एक इंच भी नहीं हिलाया जा सका है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए और किसी भी तरह की धार्मिक भावनाओं को आहत किए बिना इस समस्या का समाधान निकालने के लिए उज्जैन नगर निगम ने अब देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर की मदद मांगी है। आईआईटी के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम आधुनिक उपकरणों के साथ उज्जैन पहुंच चुकी है और वैज्ञानिक तरीकों से इस प्राचीन रहस्य को सुलझाने में जुटी है।
क्यों नहीं हिल रही है परमार कालीन मूर्ति?
प्राचीन काल की विरासतों और कला-સ્થાપત्य का इतिहास अपने आप में अनूठा रहा है। उज्जैन में स्थित यह 'खड़े हनुमान' की प्रतिमा कोई साधारण मूर्ति नहीं है। यह परमार राजवंश के काल की बताई जाती है, जिसे मालवा क्षेत्र के बेहद मजबूत और भारी बेसाल्ट (Basalt) पत्थर से तराशा गया है। इतिहास और पुरातत्व के जानकारों के अनुसार, परमार वंश के समय में बड़ी और भारी मूर्तियों को स्थापित करने के लिए विशेष तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता था।
अक्सर ऐसी मूर्तियां 'इंटरलॉकिंग' तकनीक या जमीन के काफी नीचे तक मजबूत आधार के साथ जुड़ी होती हैं। यही वजह है कि सतही तौर पर क्रेन या अन्य सामान्य उपकरणों का इस्तेमाल करने पर भी यह टस से मस नहीं हो रही है। पिछले छह दिनों से लगातार जारी असफल प्रयासों के बाद प्रशासन ने यह महसूस किया कि बिना वैज्ञानिक और तकनीकी विश्लेषण के इस प्रतिमा को छूना भी जोखिम भरा हो सकता है।
आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञों की तकनीकी जांच
मंदिर के पुजारी और स्थानीय नागरिकों के विशेष अनुरोध पर नगर निगम ने आईआईटी इंदौर के तकनीकी विशेषज्ञों से संपर्क किया। बुधवार को मौके पर पहुंची विशेषज्ञों की टीम ने अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से मूर्ति की गहराई, उसकी नींव और आसपास की मिट्टी की संरचना का बारीकी से अध्ययन किया।
विशेषज्ञ यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि बेसाल्ट पत्थर से बनी इस विशाल प्रतिमा का बेस जमीन के अंदर किस गहराई तक और किस प्रकार से जुड़ा हुआ है। टीम द्वारा सौंपी जाने वाली रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि मूर्ति को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित रूप से कैसे और किस तारीख को अन्यत्र स्थानांतरित किया जा सकता है।
प्रशासन और पुजारियों के बीच बनी सहमति
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान स्थानीय स्तर पर किसी भी तरह के तनाव या गलतफहमी को रोकने के लिए जिला प्रशासन और मंदिर के पुजारियों के बीच सकारात्मक संवाद देखने को मिला है। मंदिर के मुख्य पुजारी महेश बैरागी ने मीडिया और प्रशासन से बातचीत में स्पष्ट किया कि उन्हें विकास कार्यों से कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते आस्था का पूरा सम्मान किया जाए।
पुजारी महेश बैरागी ने कहा, "मैं चाहता हूं कि आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों की मौजूदगी में पूरी जांच हो और वैज्ञानिक रिपोर्ट आने के बाद ही मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाए।" स्थानीय नागरिकों ने भी कमिश्नर को ज्ञापन सौंपकर इसी प्रकार की मांग रखी थी, जिस पर प्रशासन ने तुरंत सकारात्मक रुख दिखाया।
सिंहस्थ 2028 और सांस्कृतिक विरासत का संतुलन
उज्जैन जिला प्रशासन ने इस मामले में एक आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर साफ कर दिया है कि शहर के विकास और श्रद्धालुओं की भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उज्जैन की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का संरक्षण उतना ही जरूरी है जितना कि आगामी सिंहस्थ 2028 के लिए सड़कों और बुनियादी ढांचे का विकास।
एसडीएम एलएन गर्ग ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा, "प्रशासन शहर के प्रत्येक नागरिक और श्रद्धालु की आस्था का पूर्ण सम्मान करता है। किसी भी धार्मिक स्थल या प्रतिमा को उसकी गरिमा के खिलाफ या बिना आम सहमति के नहीं हटाया जाएगा। आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने के बाद सभी संबंधित पक्षों के साथ बैठकर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।"
भक्तों की उमड़ रही भारी भीड़
जब से इस प्राचीन मूर्ति को हटाने और आईआईटी टीम के आने की खबर शहर में फैली है, तब से कंठाल चौराहा स्थित इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लग गया है। प्रतिदिन सुबह से लेकर देर शाम तक हनुमान भक्तों की लंबी कतारें मंदिर परिसर के बाहर देखी जा सकती हैं। लोग अपनी आस्था प्रकट करने के साथ-साथ इस बात को लेकर भी उत्सुक हैं कि आखिर प्राचीन इंजीनियरिंग का यह नायाब नमूना तकनीक के आगे कैसे रास्ता बदलेगा।
फिलहाल, सभी की निगाहें आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञों की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं जो यह तय करेगी कि आस्था और विज्ञान का यह अनूठा संगम किस तरह से आगे बढ़ता है। उज्जैन प्रशासन का यह कदम यह साबित करता है कि आधुनिक विकास की दौड़ में भी प्राचीन धरोहरों और जन-भावनाओं को सहेजना संभव है।