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35 साल से फरार कातिल गाजियाबाद में गिरफ्तार, जमीन विवाद ने खोली पोल

35 साल से फरार कातिल गाजियाबाद में गिरफ्तार, जमीन विवाद ने खोली पोल

कानून के लंबे हाथ कब और किस रास्ते से अपराधी तक पहुंच जाएं, इसका अंदाजा शायद ही कोई शातिर मु मुजरिम लगा सकता है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक ऐसे ही मामले में सफलता हासिल की है, जिसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। करीब साढ़े तीन दशक यानी 35 साल से कानून की आंखों में धूल झोंककर अपनी पहचान छुपाने वाला हत्या का एक आरोपी आखिरकार पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया। चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस उस तक किसी मुखबिर या अत्याधुनिक सर्विलांस के जरिए नहीं, बल्कि एक सामान्य से जमीन विवाद के मुकदमे के रास्ते पहुंची।

साढ़े तीन दशक का लंबा सफर और छिपने की कहानी

यह मामला उत्तर प्रदेश के अपराध जगत की उन फाइलों में दर्ज था, जिन पर धूल जम चुकी थी। आज से 35 साल पहले एक सनसनीखेज हत्या को अंजाम देने के बाद मुख्य आरोपी रमेश दुबे अचानक गायब हो गया था। पुलिस और अदालत की नजरों में वह एक ऐसा नाम बन चुका था जिसका सुराग पाना वक्त के साथ असंभव होता जा रहा था। समय बीतता गया, जांच अधिकारियों की पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन रमेश दुबे का कोई अता-पता नहीं चला। पुलिस ने कई बार उसकी तलाश में छापेमारी की, लेकिन हर बार हाथ निराशा ही लगी। आखिरकार, रमेश ने मान लिया था कि उसने कानून को हमेशा के लिए चकमा दे दिया है और अब वह एक सुरक्षित जिंदगी जी रहा है।

लेकिन कहते हैं न कि पाप का घड़ा एक न एक दिन भर ही जाता है। रमेश दुबे ने उत्तर प्रदेश से दूर गाजियाबाद में अपनी नई पहचान गढ़ ली थी। उसने न केवल अपना नाम और ठिकाना बदला, बल्कि एक आम नागरिक की तरह अपनी जिंदगी भी पटरी पर ले आया था। उसे इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि उसका अतीत किसी साए की तरह उसका पीछा कर रहा है और एक दिन यही अतीत उसकी बर्बादी का कारण बनेगा।

जमीन विवाद बना पुलिस के लिए टर्निंग पॉइंट

इतने लंबे समय तक पुलिस की रडार से बाहर रहने वाला रमेश दुबे आखिर कैसे पकड़ा गया? यह सवाल हर किसी के मन में है। दरअसल, गाजियाबाद में रहने के दौरान रमेश दुबे का किसी स्थानीय शख्स के साथ जमीन को लेकर एक मामूली विवाद खड़ा हो गया। मामला तूल पकड़ता गया और बात कचहरी तक जा पहुंची। जमीन के इस नए मुकदमे में कानूनी प्रक्रिया के तहत दस्तावेजों की छानबीन शुरू हुई।

यहीं से उत्तर प्रदेश पुलिस की एक विशेष टीम के हाथ अहम सुराग लगे। जमीन विवाद के दस्तावेजों और कानूनी कार्यवाही के दौरान जब पुलिस ने डिजिटल और कागजी रिकॉर्ड खंगालने शुरू किए, तो कुछ ऐसी कड़ियां जुड़ीं जो सीधे 35 साल पुराने उस हत्या के केस से जा मिलती थीं। पुलिस के सतर्क अधिकारियों ने बिना वक्त गंवाए इन कड़ियों को आपस में जोड़ा और शक की सुई सीधे रमेश दुबे की तरफ घूम गई।

गाजियाबाद में दबिश और गिरफ्तारी

जमीन विवाद के मुकदमे से मिले सुराग पुख्ता होने के बाद पुलिस ने बिना देर किए गाजियाबाद में जाल बिछाया। स्थानीय पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त कार्रवाई में आरोपी के छिपने के ठिकाने की पहचान की गई। जब पुलिस टीम ने अचानक उसके घर पर दबिश दी, तो रमेश दुबे को समझने का मौका ही नहीं मिला कि माजरा क्या है। शुरुआती पूछताछ में उसने एक बार फिर अपनी फर्जी पहचान का ढोंग रचने की कोशिश की, लेकिन जब पुलिस ने उसके सामने पुख्ता दस्तावेज और 35 साल पुराने रिकॉर्ड रखे, तो उसके होश उड़ गए।

आखिरकार, रमेश दुबे को अपनी असलियत स्वीकार करनी पड़ी। पुलिस ने उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए उसे संबंधित थाने ले जाया गया। इतने सालों तक कानून की गिरफ्त से दूर रहने वाला आरोपी अब पुलिस की सख्त सुरक्षा के बीच सलाखों के पीछे पहुंच चुका है।

इस बड़ी सफलता के मायने

  • कानून के हाथ लंबे हैं: यह मामला साबित करता है कि गंभीर अपराधों में लिप्त आरोपी चाहे कितनी भी चालाकी से छिप जाएं, कानून अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है।
  • दस्तावेजों की ताकत: आधुनिक पुलिसिंग और पुराने रिकॉर्ड्स का मिलान आज के दौर में अपराधियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।
  • आम विवाद बना सुराग: कभी-कभी एक छोटा सा दीवानी या जमीन का विवाद बड़े अपराधियों को बेनकाब कर देता है, जैसा कि इस मामले में देखने को मिला।

पुलिस अब इस बात की भी गहराई से जांच कर रही है कि इन 35 सालों के दौरान रमेश दुबे ने गाजियाबाद या अन्य जगहों पर कौन-कौन सी संपत्तियां अर्जित की हैं और इस फर्जी पहचान को बनाने में उसकी मदद किसने की थी। इस गिरफ्तारी के बाद से इलाके में हड़कंप मचा हुआ है और पीड़ित परिवार ने भी राहत की सांस ली है।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

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नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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