उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से सड़क सुरक्षा को लेकर एक बेहद गंभीर और विचारणीय मामला सामने आया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-233 (एनएच-233) के क्षेत्र में लगातार हो रहे जानलेवा सड़क हादसों से त्रस्त होकर अब किसानों ने मोर्चा संभाल लिया है। पूर्वांचल किसान संगठन ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस हाईवे के घनी आबादी वाले करीब 16 किलोमीटर के हिस्से में भारी वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक यानी 'नो-एंट्री' लागू करने की मांग की है। इस बाबत प्रशासन को एक ज्ञापन भी सौंपा गया है, जिसमें हादसों के आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है।
एसपी को सौंपा गया ज्ञापन, 24 से अधिक किसान रहे मौजूद
सोमवार को पूर्वांचल किसान संगठन के अध्यक्ष अजीत सिंह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस अधीक्षक (एसपी) को संबोधित ज्ञापन क्षेत्राधिकारी (सीओ) सिटी गोल्डी गुप्ता को सौंपा। इस दौरान 24 से अधिक किसान और संगठन के पदाधिकारी मौजूद रहे। किसानों का साफ कहना है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और यदि समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो और भी कई मासूम जिंदगियां इस लापरवाही की भेंट चढ़ जाएंगी।
संगठन के अध्यक्ष अजीत सिंह ने मीडिया और प्रशासन के सामने बेहद चौंकाने वाले आंकड़े रखे। उन्होंने दावा किया कि एनएच-233 के जौनपुर क्षेत्र में अब तक सड़क हादसों के कारण करीब 500 लोगों कीमती जानें जा चुकी हैं। इतने बड़े पैमाने पर हो रही मौतों के बावजूद भारी वाहनों की बेलगाम रफ्तार पर लगाम न कसा जाना प्रशासनिक तैयारियों पर भी कई सवाल खड़े करता है।
क्यों खतरनाक बन गया है एनएच-233 का यह 16 किमी हिस्सा?
स्थानीय लोगों और किसानों के अनुसार, वाराणसी और आजमगढ़ की ओर से आने वाले भारी वाहन जैसे ट्रक, डंपर और ट्रेलर इस मार्ग से धड़ल्ले से गुजरते हैं। समस्या तब और विकराल हो जाती है जब राजमार्ग का लगभग 16 किलोमीटर का हिस्सा अभी तक पूरी तरह से बनकर तैयार नहीं हुआ है। अधूरा निर्माण कार्य और उस पर भारी वाहनों का बेलगाम दबाव—यह दोनों मिलकर इस रूट को एक 'डेथ ज़ोन' (मृत्यु क्षेत्र) में बदल चुके हैं।
- घनी आबादी वाला क्षेत्र: सड़क का यह 16 किमी का दायरा घनी आबादी से होकर गुजरता है, जहां रोजमर्रा के कामकाज के लिए स्थानीय नागरिकों और स्कूली बच्चों का आना-जाना लगा रहता है।
- अधूरा निर्माण कार्य: हाईवे का काम अधूरा होने की वजह से सड़क के कई हिस्सों पर गड्ढे और संकरे रास्ते हैं, जहां से भारी वाहनों का निकलना हादसों को खुला निमंत्रण देता है।
- अनियंत्रित गति: वाराणसी और आजमगढ़ रूट के भारी वाहन अक्सर तेज रफ्तार में होते हैं, जिन पर ट्रैफिक पुलिस की पकड़ कमजोर साबित हो रही है।
'हमारा उद्देश्य परिवहन रोकना नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी बचाना है'
किसानों ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग का मकसद किसी भी तरह के परिवहन व्यवसाय को बाधित करना या ट्रकों की आवाजाही को ठप करना नहीं है। उनका एकमात्र उद्देश्य आम नागरिकों के जीवन की रक्षा करना और आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में भारी कमी लाना है। किसानों का तर्क है कि सड़क हादसों में केवल एक व्यक्ति की जान नहीं जाती, बल्कि पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से बिखर जाता है।
"जान बचेगी तो परिवार बचेगा, श्रमशक्ति बचेगी और श्रमशक्ति बचेगी तो देश की अर्थव्यवस्था मजबूत रहेगी। सड़क सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम अब इस इलाके की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।" - अजीत सिंह, अध्यक्ष, पूर्वांचल किसान संगठन
आर्थिक और सामाजिक क्षति का बड़ा कारण
संगठन ने प्रशासन को याद दिलाया कि सड़क हादसों से केवल जान-माल का ही नुकसान नहीं होता, बल्कि देश की उत्पादकता और परिवारों की आजीविका पर भी इसका गहरा विपरीत प्रभाव पड़ता है। कमाने वाले सदस्य की दुर्घटना में मौत या विकलांगता पूरे परिवार को सड़क पर ले आती है। देश की श्रमशक्ति को बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस मार्ग पर भारी वाहनों के प्रवेश के समय को विनियमित किया जाए या घनी आबादी वाले इस हिस्से में वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था की जाए।
प्रशासन के सामने चुनौतियां और आगे की राह
सीओ सिटी गोल्डी गुप्ता को ज्ञापन सौंपे जाने के बाद अब स्थानीय लोगों की निगाहें जिला प्रशासन और यातायात विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या प्रशासन इस 16 किलोमीटर के संवेदनशील हिस्से में भारी वाहनों की आवाजाही के लिए कोई नया ट्रैफिक प्लान तैयार करेगा? क्या नो-एंट्री के कड़े नियम लागू किए जाएंगे? ये वे सवाल हैं जिनका जवाब जौनपुर की आम जनता जल्द से जल्द चाहती है।
बहरहाल, किसानों की इस मुखर मांग ने एक बार फिर देश के हाइवे निर्माण और सड़क सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। देखना यह होगा कि प्रशासन इस दिशा में कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है ताकि जौनपुर की सड़कों पर खून-खराबा रुक सके और लोग सुरक्षित सफर कर सकें।