मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक व्यवस्था के दायरे से बाहर जाने पर पुराने लाभ बरकरार नहीं रह सकते।
देश की सर्वोच्च अदालत ने धर्म परिवर्तन से जुड़े आरक्षण के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म के अनुसूचित जाति (SC) या अन्य पिछड़े वर्गों से ताल्लुक रखने वाला कोई व्यक्ति यदि अपना धर्म बदलकर अन्य धर्म अपना लेता है, तो वह मूल आधार पर आरक्षण और सरकारी लाभों का दावा करने का पात्र नहीं रहेगा।
शीर्ष अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती आदेश को पूरी तरह से सही ठहराया है। अदालत के इस निर्णय से उन दावों को खारिज कर दिया गया है जिनमें धर्म परिवर्तन के बाद भी पुरानी श्रेणी के आधार पर आरक्षण का लाभ जारी रखने की मांग की जाती है।
कानूनी और सामाजिक पृष्ठभूमि
भारत के संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों के अनुसार, अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित आरक्षण की व्यवस्था विशिष्ट सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों पर आधारित है, जो मुख्य रूप से भारतीय समाज की जातियों और व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं। न्यायपालिका द्वारा समय-समय पर यह दोहराया गया है कि जब कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाता है, तो उसकी सामाजिक स्थिति और व्यवस्था बदल जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह उस श्रेणी के विशेष संवैधानिक संरक्षण या लाभों का हकदार नहीं रहता जो विशेष रूप से उन समुदायों के लिए बनाए गए हैं जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े माने गए हैं।
मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर मुहर
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय पर अपनी सहमति जताई है जिसमें धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ देने से इंकार किया गया था। उच्च अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यह अहम फैसला सुनाया। इस आदेश के बाद अब यह कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो गई है कि धार्मिक पहचान बदलने के साथ ही सरकारी आरक्षण और उससे जुड़े अन्य सामाजिक कल्याणकारी लाभों का दायरा भी बदल जाता है।