इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष 2011 के पुराने स्थगन आदेश को आधार बनाते हुए झांसी की अदालत ने अभिनेत्री राखी सावंत को बड़ी राहत दी है। फास्ट ट्रैक कोर्ट (एफटीसी) ने उनके खिलाफ हाल ही में जारी गैर जमानती वारंट को निरस्त कर दिया है।
अभिनेत्री राखी सावंत को वर्ष 2010 के एक पुराने मामले में झांसी की अदालत से यह राहत मिली है। अदालत ने बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद यह आदेश पारित किया। इससे पहले झांसी की एफटीसी अदालत ने 16 अक्टूबर 2026 को उनके खिलाफ वारंट जारी किया था, जिसके तहत उन्हें गिरफ्तार कर एक दिसंबर को अदालत में पेश करने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट के आदेश से मिली राहत
सुनवाई के दौरान राखी सावंत की ओर से अधिवक्ता आशू सिंह और कृष्णा यादव ने अदालत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने न्यायालय को बताया कि संबंधित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही स्थगन आदेश पारित कर चुका है। अधिवक्ताओं ने सात दिसंबर 2011 के हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति न्यायालय में प्रस्तुत की और गैर जमानती वारंट को निरस्त करने का आग्रह किया। दस्तावेजों की जांच के बाद अदालत ने वारंट को खारिज कर दिया, जिससे अभिनेत्री को फिलहाल गिरफ्तारी से बड़ी राहत मिल गई है। अधिवक्ता आशू सिंह के अनुसार, इस आदेश के बाद एक दिसंबर को तय की गई सुनवाई की अगली तारीख अब प्रभावी नहीं रह गई है। इस मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थगन आदेश की स्थिति के आधार पर ही तय होगी।
‘राखी का इन्साफ’ कार्यक्रम से जुड़ा है पूरा विवाद
यह कानूनी विवाद वर्ष 2010 में टेलीविजन पर प्रसारित हुए चर्चित रियलिटी कार्यक्रम ‘राखी का इन्साफ’ से जुड़ा हुआ है। झांसी के प्रेमनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हंसारी इलाके की रहने वाली सावित्री देवी ने इस मामले में प्रेमनगर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने अभिनेत्री राखी सावंत और इस कार्यक्रम से जुड़े अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।
शिकायतकर्ता सावित्री देवी का आरोप था कि कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान उनके बेटे लक्ष्मण अहिरवार को अपमानित किया गया था, और बाद में लक्ष्मण की मृत्यु हो गई थी। उनकी मां ने आरोप लगाया था कि कार्यक्रम में राखी सावंत द्वारा कथित तौर पर कहे गए अपमानजनक शब्दों और टिप्पणियों की वजह से उनके बेटे को मानसिक ठेस पहुंची, जिसे उन्होंने बेटे की मौत से जोड़ा था। हालांकि, ये सभी आरोप उस समय शिकायतकर्ता की ओर से दर्ज कराए गए थे।
लंबे समय से लंबित है मामला
दर्ज प्राथमिकी और पुलिस द्वारा दाखिल आरोप पत्र को चुनौती देते हुए आरोपियों की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इसके बाद सात दिसंबर 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए स्थगन आदेश पारित किया था और निचली अदालत की आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट का यह स्टे पिछले कई वर्षों से प्रभावी था, लेकिन हाल ही में प्रक्रियागत कारणों से झांसी की एफटीसी अदालत से वारंट जारी हो गया था, जिसे अब पुराने स्टे ऑर्डर के आधार पर निरस्त कर दिया गया है।