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एआई वीडियो वॉर: सपा ने 'याद रखेगा यूपी' अकाउंट के खिलाफ खटखट अदालत का दरवाजा

एआई वीडियो वॉर: सपा ने 'याद रखेगा यूपी' अकाउंट के खिलाफ खटखट अदालत का दरवाजा

राजनीति और तकनीक का मिलन इन दिनों किस हद तक खतरनाक रूप ले चुका है, इसकी बानगी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में साफ देखी जा सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) का दौर जहां एक तरफ सकारात्मक बदलाव ला रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसका दुरुपयोग राजनीतिक मोर्चे पर सनसनी फैलाने के लिए तेजी से हो रहा है। इसी कड़ी में, उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (SP) ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए 'याद रखेगा यूपी' नामक सोशल मीडिया अकाउंट के खिलाफ सीधे अदालत का रुख किया है। पार्टी का आरोप है कि इस विशेष हैंडल से उनकी छवि को धूमिल करने के लिए सुनियोजित तरीके से एआई जनरेटेड वीडियो का इस्तेमाल किया जा रहा है।

अदालत की चौखट पर पहुंचा मामला: क्या है पूरा विवाद?

डिजिटल युग में प्रोपेगेंडा और फेक नैरेटिव गढ़ने के खेल नया नहीं हैं, लेकिन डीपफेक और एआई वीडियो ने इसमें एक नया और खतरनाक आयाम जोड़ दिया है। समाजवादी पार्टी के कानूनी प्रकोष्ठ और सोशल मीडिया सेल ने मिलकर इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी की ओर से कोर्ट में दाखिल की गई याचिका में यह दावा किया गया है कि 'याद रखेगा यूपी' नाम से ऑपरेट हो रहे सोशल मीडिया अकाउंट पर लगभग एक हजार ऐसे वीडियो अपलोड किए गए हैं, जो पूरी तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किए गए हैं।

इन वीडियो का मुख्य उद्देश्य कथित तौर पर समाजवादी पार्टी, उसके शीर्ष नेतृत्व और नीतियों के खिलाफ जनता के मन में भ्रम पैदा करना और नकारात्मकता फैलाना है। पार्टी का तर्क है कि इस तरह के मॉर्फ्ड और एआई-संचालित कंटेंट न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा लांघते हैं, बल्कि सीधे तौर पर चुनावी मैदान में निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देते हैं।

हजारों एआई वीडियो का गंभीर दावा

किसी एक सोशल मीडिया अकाउंट के खिलाफ एक या दो नहीं, बल्कि एक हजार एआई वीडियो बनाने और प्रसारित करने का दावा अपने आप में बेहद चौंकाने वाला है। आज के समय में वीडियो एडिटिंग और जेनरेटिव एआई टूल्स इतने एडवांस्ड हो चुके हैं कि किसी भी नेता की आवाज, उनके हाव-भाव और बयानों को आसानी से तोड़-मरोड़कर पेश किया जा सकता है।

समाजवादी पार्टी के प्रतिनिधियों का कहना है कि उन्होंने इन तमाम वीडियो के डिजिटल फुटप्रिंट और सबूतों को इकट्ठा कर लिया है। अदालत के समक्ष पेश किए गए दस्तावेजों में इन वीडियो के लिंक, स्क्रीनशॉट और उनके प्रभाव का पूरा ब्योरा दिया गया है। पार्टी का मानना है कि यदि इस तरह की डिजिटल अराजकता पर समय रहते लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श का स्तर पूरी तरह से गिर जाएगा और सच व झूठ का फर्क करना आम जनता के लिए नामुमकिन हो जाएगा।

डिजिटल कैंपेनिंग बनाम डिजिटल मैनिपुलेशन

आज की तारीख में हर राजनीतिक दल अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है। मीम्स, रील्स, और शॉर्ट वीडियोज राजनीतिक मार्केटिंग का अहम हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, जब बात एआई के जरिए किसी की इमेज खराब करने या डीपफेक तकनीक के दुरुपयोग की आती है, तो रेखाएं धुंधली होने लगती हैं।

  • डीपफेक का खतरा: एआई टूल्स के जरिए नेताओं के चेहरे और आवाज को ऐसे प्रोजेक्ट किया जाता है जो उन्होंने कभी कहा या किया ही न हो।
  • जनमानस पर प्रभाव: सोशल मीडिया की तेज रफ्तार दुनिया में बिना फैक्ट-चेक किए लोग ऐसी सामग्री पर भरोसा कर लेते हैं, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
  • कानूनी शिकंजा: आईटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के तहत ऐसे मामलों में अब राजनीतिक दल कड़े कदम उठाने लगे हैं।

भविष्य की राजनीति और साइबर कानूनों की परीक्षा

सपा द्वारा उठाया गया यह कदम भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह इस बात का प्रमाण है कि अब राजनीतिक दल केवल जुबानी जंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे डिजिटल स्पेस में अपने अधिकारों और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अदालत का यह देखना दिलचस्प होगा कि वह एआई जनरेटेड कंटेंट और फ्री स्पीच के बीच की बारीक रेखा को कैसे परिभाषित करती है। साथ ही, इस तरह के मामलों से निपटने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने पर भी बहस तेज हो गई है।

निष्कर्ष: तकनीक का सही इस्तेमाल बनाम दुरुपयोग

'याद रखेगा यूपी' अकाउंट के खिलाफ समाजवादी पार्टी की यह कानूनी लड़ाई इस बात की चेतावनी है कि इंटरनेट की दुनिया अब कानून के दायरे से बाहर नहीं है। जैसे-जैसे तकनीक उन्नत हो रही है, वैसे-वैसे इसके नियमन और सुरक्षा के उपायों को भी मजबूत करना अनिवार्य हो गया है। अब सभी की निगाहें अदालत की आगामी सुनवाई और इस पर आने वाले फैसले पर टिकी हैं कि न्यायपालिका इस आधुनिक डिजिटल चुनौती पर क्या रुख अपनाती है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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