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जन्माष्टमी की झांकी में दिखा बदलता बनारस, रोपवे और वंदे भारत का अनूठा संगम

जन्माष्टमी की झांकी में दिखा बदलता बनारस, रोपवे और वंदे भारत का अनूठा संगम

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का पावन पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर धार्मिक नगरी काशी (बनारस) का रूप और भी अधिक मनमोहक नजर आ रहा है। कान्हा के जन्मोत्सव पर सजी झांकियों में इस बार परंपरा के साथ-साथ आधुनिकता का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मेल

सनातन संस्कृति के केंद्र काशी में जन्माष्टमी की झांकियां हमेशा से ही अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध रही हैं। लेकिन, साल 2026 के इस पावन पर्व पर स्थानीय कलाकारों और भक्तों ने अपनी रचनात्मकता से कुछ ऐसा पेश किया है, जो बदलते बनारस की असल तस्वीर बयां कर रहा है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और गोकुल के दृश्यों के बीच इस बार शहर की आधुनिक विकास गाथा को भी सजीव रूप दिया गया है।

पारंपरिक रूप से सजाए जाने वाले मंदिरों और घरों की झांकियों में इस बार काशी के नए स्वरूप की झलक साफ दिखाई दे रही है। इन झांकियों में न सिर्फ भगवान के दर्शन हो रहे हैं, बल्कि विकास की नई ऊंचाइयों को छूते बनारस का जीवंत मॉडल भी प्रदर्शित किया गया है।

झांकी में छाए वंदे भारत और रोपवे के मॉडल

इस बार की झांकियों का मुख्य आकर्षण काशी की नई पहचान बन चुके प्रोजेक्ट्स रहे हैं। कलाकारों ने बेहद बारीकी से वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन और निर्माणाधीन रोपवे प्रोजेक्ट के लघु रूप (मिनिएचर मॉडल) को झांकियों में शामिल किया है।

  • वंदे भारत ट्रेन: आधुनिकता का प्रतीक बन चुकी वंदे भारत ट्रेन को झांकी की पृष्ठभूमि में दौड़ते हुए दिखाया गया है, जो देखने में बेहद आकर्षक लग रहा है।
  • काशी रोपवे प्रोजेक्ट: शहर की परिवहन व्यवस्था को सुगम बनाने वाले बहुप्रतीक्षित रोपवे के डिब्बों को हवा में चलते हुए दर्शाया गया है।
  • संस्कृति का संगम: इन आधुनिक मॉडलों के साथ पारंपरिक घाटों, गंगा आरती और बाबा विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप को भी करीने से उकेरा गया है।

दर्शकों में भारी उत्साह

बदलते बनारस की थीम पर आधारित इन झांकियों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंच रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में इन झांकियों को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यह पहली बार है जब आस्था के इस पर्व पर आधुनिक विकास को इतने खूबसूरत तरीके से जोड़ा गया है।

एक स्थानीय दर्शक ने बताया, 'हमने हमेशा से कान्हा की बाल लीलाओं वाली झांकियां देखी हैं, लेकिन इस बार हमारे शहर की तरक्की को इन झांकियों में देखना एक बेहद सुखद अनुभव है। यह दिखाता है कि काशी अपनी प्राचीन संस्कृति को सहेजे हुए भविष्य की ओर कितनी तेजी से कदम बढ़ा रही है।'

कलाकारों की मेहनत रंग लाई

इन झांकियों को तैयार करने वाले कलाकारों ने महीनों की कड़ी मेहनत के बाद इसे अंतिम रूप दिया है। थर्मोकोल, गत्ते, प्राकृतिक रंगों और लाइटिंग का बेहतरीन इस्तेमाल कर इन मॉडलों को जीवंत बनाया गया है। रात के समय जब इन पर रंग-बिरंगी रोशनी पड़ती है, तो नजारा देखने लायक होता है।

जन्माष्टमी का यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह काशी के सामाजिक और आर्थिक बदलाव की एक ऐसी कहानी बन गया है, जो आने वाले समय में भी लोगों को याद रहेगी। बदलता बनारस अब न केवल कागजों और सड़कों पर दिखता है, बल्कि अब यह जन-आस्था के महापर्व पर सजी झांकियों के जरिए भी अपनी नई कहानी कह रहा है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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