सनातन संस्कृति की आध्यात्मिक राजधानी वाराणसी में इन दिनों देवाधिदेव महादेव के एक अलग ही स्वरूप के विवाहोत्सव की धूम मची हुई है। बाबा लाट भैरव के दरबार में इन दिनों उत्सव जैसा माहौल है और चारों तरफ गूंजते मंगलगीत इस बात की गवाही दे रहे हैं कि काशी अपनी पुरानी लोक परंपराओं को कितनी जिंदादिली से निभाती है। गुरुवार को इसी विवाहोत्सव की श्रृंखला में वह रस्म पूरी की गई, जिसका हर सुहागिन और नवयुवती को बेसब्री से इंतजार रहता है—जी हां, यह थी बाबा लाट भैरव को हल्दी चढ़ाने की बेहद खूबसूरत और पारंपरिक रस्म।
पीले परिधानों में सजी काशी, गूंजे पारंपरिक लोकगीत
श्री कपाल भैरव अथवा लाट भैरव प्रबंधक समिति के नेतृत्व में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में सुबह से ही भक्तों का तांता लगा रहा। इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें शामिल होने वाली महिलाओं और युवतियों ने विशेष रूप से पीले रंग के वस्त्र धारण किए थे। पूरा दरबार परिसर मानों पीले फूलों और वस्त्रों की चादर में लिपटा हुआ नजर आ रहा था। ढोलक की थाप, मंजीरों की झंकार और हारमोनियम की मधुर धुनों के बीच जब महिलाओं ने पारंपरिक सोहर और मंगलगीत गाने शुरू किए, तो पूरा वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय और ऊर्जा से भर गया।
कार्यक्रम की शुरुआत बेहद पवित्र अंदाज में हुई। लोकगीत गायन टोली ने सबसे पहले गणेश वंदना गाकर सभी विघ्नहर्ता का आह्वान किया। इसके बाद एक के बाद एक पारंपरिक लोकगीतों का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ जो देर रात तक बिना रुके चलता रहा। संगीत की इन लहरों पर खुद को रोक न पाने वाली महिलाओं ने बाबा के दरबार में जमकर नृत्य किया और अपनी अगाध श्रद्धा व उल्लास का इजहार किया।
युवतियों ने मांगा मनचाहा वर, सुहागिनों ने मांगा अखंड सौभाग्य
लोक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, भगवान शिव और उनके स्वरूपों के विवाहोत्सव में भाग लेना और अनुष्ठान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। हल्दी उत्सव के दौरान भी यही गहरी आस्था देखने को मिली। एक तरफ जहां कुंवारी नवयुवतियों ने बाबा लाट भैरव से अपनी मनोकामना पूरी होने और मनवांछित वर मिलने की प्रार्थना की, वहीं दूसरी तरफ सुहागिन महिलाओं ने अपने परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगा।
रस्म के मुख्य चरण में महिलाओं ने पूरी श्रद्धा के साथ बाबा लाट भैरव के विग्रह पर हल्दी का लेपन किया। इसके बाद इस पवित्र हल्दी को महाप्रसाद के रूप में वहां मौजूद सैकड़ों श्रद्धालुओं के बीच वितरित किया गया। भक्तों का ऐसा मानना था कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी कष्ट दूर होते हैं।
काशी की संस्कृति और धार्मिकता का अनूठा संगम
आयोजकों का कहना है कि इस तरह के आयोजन केवल एक रस्म भर नहीं हैं, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति, लोक परंपराओं और भाईचारे को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम हैं। काशी में सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को आधुनिक दौर में भी उसी निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है, जो इसे दुनिया के बाकी शहरों से बिल्कुल अलग बनाता है। इस भव्य आयोजन में महिलाओं की रिकॉर्ड तोड़ भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि आज की पीढ़ी भी अपनी जड़ों से कितनी मजबूती से जुड़ी हुई है।
कार्यक्रम में इनकी रही विशेष उपस्थिति
इस धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान को सफल बनाने में शहर की तमाम गणमान्य महिलाओं ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। हल्दी उत्सव के इस पावन अवसर पर तारा जायसवाल, बीना जायसवाल, ज्योति देवी, सृष्टि वर्मा, अरोमा जायसवाल, प्रियंका जायसवाल, पूनम सिंह, माला यादव, शिखा सिंह, सीमा सिंह, साधना गुप्ता, बबीता कुशवाहा, मनाली कुशवाहा, मंजू देवी और शालिनी जायसवाल समेत भारी संख्या में स्थानीय महिलाएं और भक्तगण उपस्थित रहे। सभी ने मिलकर इस उत्सव को ऐतिहासिक बना दिया।
अब आगे क्या है खास? मेहंदी रस्म की तैयारी
हल्दी की रस्म के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद अब भक्तों की निगाहें अगले कार्यक्रमों पर टिक गई हैं। समिति से जुड़े पदाधिकारियों ने जानकारी दी है कि विवाहोत्सव की अगली कड़ी के रूप में शुक्रवार को बाबा लाट भैरव के दरबार में मेहंदी की रस्म का आयोजन किया जाएगा। इसे लेकर भी तैयारियां अभी से शुरू कर दी गई हैं। माना जा रहा है कि मेहंदी के इस कार्यक्रम में भी भारी संख्या में महिलाएं और श्रद्धालु जुटेंगे और बाबा के इस अनूठे विवाह में अपनी हाजिरी लगाएंगे।
काशी की गलियों से उठने वाली यह भक्ति की लहर अब धीरे-धीरे पूरे शहर में अपनी छटा बिखेर रही है। बाबा लाट भैरव का यह विवाहोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उल्लास, संस्कृति और सामूहिक आनंद का एक ऐसा उत्सव बन चुका है, जिसका गवाह बनने के लिए दूर-दूर से लोग इस प्राचीन नगरी की ओर खिंचे चले आ रहे हैं।