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ईरान और अमेरिका में सीधी जंग! लारक द्वीप पर तबाही के बाद जॉर्डन में अमेरिकी बेस पर हमला

ईरान और अमेरिका में सीधी जंग! लारक द्वीप पर तबाही के बाद जॉर्डन में अमेरिकी बेस पर हमला

मध्य पूर्व (Middle East) में भू-राजनीतिक तनाव अब एक बेहद खतरनाक और विस्फोटक मोड़ पर पहुंच चुका है। फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के मुहाने पर स्थित रणनीतिक रूप से बेहद अहम लारक द्वीप (Larak Island) पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के तुरंत बाद, तेहरान ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए इसका कड़ा और तात्कालिक जवाब दिया है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान समर्थित ताकतों या ईरानी सैन्य तंत्र ने जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपने हमलों का निशाना बनाया है, जिससे वैश्विक राजनीति में हड़कंप मच गया है।

इस ताजा घटनाक्रम ने साल 2026 की गर्मियों को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और युद्ध के लिहाज से सबसे संवेदनशील बना दिया है। दुनिया भर की निगाहें एक बार फिर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर टिक गई हैं, जहां वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यह संघर्ष और अधिक व्यापक रूप लेता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा और गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है।

लारक द्वीप पर अमेरिकी स्ट्राइक: क्या थी पृष्ठभूमि?

यह पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब अमेरिकी सेना ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लारक द्वीप के पास आक्रामक सैन्य गतिविधियां तेज कर दीं। पेंटागन की ओर से दी गई शुरुआती जानकारियों के अनुसार, अमेरिकी नौसेना और रणनीतिक बलों ने क्षेत्र में ईरानी गतिविधियों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के नाम पर यह कार्रवाई की थी। अमेरिकी पक्ष का दावा था कि ईरान इस जलडमरूमध्य को बंद करने या वहां समुद्री खदानें (Naval Mines) बिछाने की गुप्त योजना बना रहा था, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार जहाजों की आवाजाही को भारी खतरा पैदा हो सकता था।

समुद्री खदानों की इस तैनाती और अमेरिकी स्ट्राइक ने ईरान को सीधे तौर पर भड़का दिया। ईरानी रक्षा मंत्रालय और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस अमेरिकी कार्रवाई को अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला करार दिया और इसके गंभीर परिणाम भुगतने की खुली चेतावनी दी थी। तेहरान ने साफ कर दिया था कि वे फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य आक्रामकता को किसी भी कीमत पर सहन नहीं करेंगे।

जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य शिविरों पर पलटवार

अमेरिकी हमले के कुछ ही घंटों बाद, मिडिल ईस्ट के एक अन्य संवेदनशील हिस्से यानी जॉर्डन से बड़ी खबर सामने आई। रिपोर्ट्स के अनुसार, जॉर्डन की सीमा के पास स्थित अमेरिकी सैन्य बलों के ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलों से जोरदार हमले किए गए। हालांकि इन हमलों में जान-माल के नुकसान का पूरा आकलन अभी सामने आना बाकी है, लेकिन इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि वाशिंगटन के सामरिक हितों को इस हमले से करारा झटका लगा है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जॉर्डन में अमेरिकी बेस पर हुआ यह हमला इस बात का पुख्ता संकेत है कि ईरान अब केवल अपने घरेलू क्षेत्र की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वह क्षेत्रीय स्तर पर फैले अमेरिकी और पश्चिमी नेटवर्क को निशाना बनाने की पूरी क्षमता रखता है। इस जवाबी कार्रवाई ने अमेरिकी सुरक्षा तंत्र को भी सकते में डाल दिया है और क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं कई गुना बढ़ गई हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन खतरे में

इस पूरे संघर्ष का सबसे डरावना पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऑयल चोकपॉइंट (Oil Chokepoint) है। फारस की खाड़ी से निकलने वाला दुनिया का एक तिहाई से अधिक एलएनजी (LNG) और पेट्रोलियम इसी तंग समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह संघर्ष आगे भी जारी रहता है या इसमें और तेजी आती है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद किया जा सकता है।

  • कच्चे तेल की कीमतें: इस मार्ग के बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में बेतहाशा उछाल आने की आशंका है।
  • आपूर्ति श्रृंखला पर असर: एशिया से लेकर यूरोप तक की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
  • वैश्विक महंगाई: तेल महंगा होने का सीधा असर भारत समेत तमाम विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं और कूटनीतिक प्रयास

लारक द्वीप और जॉर्डन की इन घटनाओं के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया के अन्य प्रमुख देशों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। यूरोपीय संघ और एशियाई देशों के कूटनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर मंथन शुरू हो गया है कि इस तनाव को युद्ध के मैदान में तब्दील होने से कैसे रोका जाए। हालांकि, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों ही पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।

अमेरिका जहां अपने सामरिक प्रभुत्व और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध दिख रहा है, वहीं ईरान अपनी क्षेत्रीय ताकत और राष्ट्रीय गौरव को बचाने के लिए हर संभव जवाबी कदम उठाने के लिए तैयार बैठा है। अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन और पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारियों की आपात बैठकों का दौर जारी है, और आने वाले कुछ घंटे इस बात तय करेंगे कि अमेरिका इस पलटवार का क्या सैन्य जवाब देता है।

आगे क्या हो सकता है? (निष्कर्ष)

मौजूदा हालात इस ओर इशारा कर रहे हैं कि मध्य पूर्व एक बार फिर से एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। लारक द्वीप की चिंगारी अब जॉर्डन तक पहुंच चुकी है और यदि समय रहते कूटनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह आग पूरे खाड़ी देशों को अपनी चपेट में ले सकती है। भारत और अन्य एशियाई देशों के लिए भी यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और वहां काम कर रहे करोड़ों प्रवासियों पर पड़ता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वाशिंगटन और तेहरान संयम बरतेंगे या यह संघर्ष एक अनियंत्रित महायुद्ध का रूप ले लेगा।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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