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रूसी तेल पर टैरिफ लगाने से खुद अमेरिका को होगा नुकसान, जेपी मॉर्गन के CEO की बड़ी चेतावनी

रूसी तेल पर टैरिफ लगाने से खुद अमेरिका को होगा नुकसान, जेपी मॉर्गन के CEO की बड़ी चेतावनी

वैश्विक आर्थिक गलियारों में इस समय एक बड़ा बयान चर्चा का विषय बना हुआ है। दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों में शुमार जेपी मॉर्गन (JPMorgan Chase) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) जेमी डाइमन ने अमेरिकी प्रशासन को एक तीखी और स्पष्ट चेतावनी दी है। डाइमन का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिमी देशों और अमेरिका के भीतर रूस से तेल आयात करने वाले देशों, विशेषकर भारत पर भारी-भरकम टैरिफ लगाने को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। जेपी मॉर्गन प्रमुख का यह रुख पारंपरिक अमेरिकी नीतियों से अलग है और इसने वैश्विक ऊर्जा बाजारों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

क्या थी अमेरिकी नीति और क्यों उठे सवाल?

यूक्रेन संघर्ष के शुरू होने के बाद से ही पश्चिमी देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए उसके तेल और गैस निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए थे। हालांकि, भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए रियायत दरों पर रूसी कच्चे तेल (Crude Oil) की खरीद जारी रखी। अमेरिका के कुछ नीति निर्माताओं का यह मानना रहा है कि जो देश रूस से तेल खरीदकर उसकी युद्ध की तिजोरी को भर रहे हैं, उन पर द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) या भारी टैरिफ लगाए जाने चाहिए।

इस बीच, अमेरिकी राजनीतिक हलकों में यह सुझाव भी दिया गया कि यदि कोई देश (जैसे भारत) रूसी तेल खरीदता है, तो उस पर 100 प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क थोप दिया जाना चाहिए। इसी प्रस्ताव पर अब जेपी मॉर्गन के सीईओ ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है और इसके दूरगामी परिणामों से आगाह किया है।

'भारत को नहीं, बल्कि खुद अमेरिका को मिलेगी सजा'

जेमी डाइमन ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को आईना दिखाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि रूसी तेल पर अत्यधिक टैरिफ लगाने का विचार भ्रामक और खतरनाक साबित हो सकता है। उनके अनुसार, इस तरह के कदमों से भारत या अन्य खरीदार देशों को तो शायद तात्कालिक परेशानी हो, लेकिन इसका सबसे बुरा असर खुद अमेरिकी उपभोक्ताओं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

डाइमन का तर्क है कि ऊर्जा बाजार एक वैश्विक तंत्र से जुड़ा हुआ है। यदि आप बाजार से रूस जैसे बड़े उत्पादक के तेल को पूरी तरह बाहर करने या उस पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की कोशिश करेंगे, तो इसके परिणामस्वरूप पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

उन्होंने वैश्विक वित्तीय मंचों पर चर्चा के दौरान कहा, 'जब आप ऐसे प्रतिबंध या टैरिफ लगाते हैं, तो आप सोचते हैं कि आप किसी दूसरे देश को सजा दे रहे हैं। लेकिन हकीकत इसके उलट होती है। इससे अंततः वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ती है, ईंधन के दाम बढ़ते हैं और इसका सबसे बड़ा बोझ अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ता है।'

वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

भारत सरकार ने पश्चिमी देशों के तमाम दबावों के बावजूद हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह से राष्ट्रीय हितों और अपने 140 करोड़ से अधिक नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा पर आधारित है। भारत ने कभी भी वैश्विक नियमों का उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उसने पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे में रहते हुए ही रियायी दरों पर तेल का आयात किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत जैसे देश रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना बंद कर देते हैं, तो वे मध्य पूर्व (Middle East) के पारंपरिक और महंगे विकल्पों की ओर रुख करेंगे। इससे ओपेक (OPEC) देशों पर दबाव बढ़ेगा और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की मांग और आपूर्ति का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा। परिणामस्वरूप, दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल के दाम इस स्तर पर पहुंच जाएंगे कि कई विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी चरमरा सकती हैं।

जेमी डाइमन के बयान के मुख्य बिंदु:

  • महंगाई का खतरा: अत्यधिक टैरिफ लगाने से वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे महंगाई बेकाबू हो सकती है।
  • उल्टी पड़ी नीतियां: इस तरह के वित्तीय प्रतिबंध अक्सर उस देश को कम और लागू करने वाले देश के नागरिकों को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
  • आपूर्ति श्रृंखला पर असर: ऊर्जा बाजार बेहद संवेदनशील है, और इसमें किसी भी कृत्रिम बाधा से पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होती है।

बाजार विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं

वॉल स्ट्रीट के दिग्गजों और कमोडिटी मार्केट के विश्लेषकों ने जेमी डाइमन के इस बयान को यथार्थवादी (Pragmatic) बताया है। उनका कहना है कि भू-राजनीतिक तनावों के बीच ऊर्जा प्रवाह को बाधित करना किसी भी अर्थव्यवस्था के हित में नहीं है। आज के समय में जब दुनिया पहले से ही मंदी की आहट, भू-राजनीतिक अस्थिरता और सप्लाई चेन के संकट से जूझ रही है, तब तेल पर भारी टैरिफ लगाना आग में घी डालने जैसा साबित हो सकता है।

भारत ने जिस तरह से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीति के जरिए अपनी ऊर्जा जरूरतों को साधा है, उसकी तारीफ अब वैश्विक वित्तीय संस्थानों के शीर्ष अधिकारी भी करने लगे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का आर्थिक और रणनीतिक कद अब वैश्विक मंच पर कितना मजबूत हो चुका है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी महाशक्ति के लिए संभव नहीं है।

निष्कर्ष

जेपी मॉर्गन के सीईओ की यह चेतावनी अमेरिका और पश्चिमी देशों के नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी सीख है। यह साफ हो चुका है कि केवल राजनीतिक दबाव या एकतरफा फैसलों के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस आर्थिक सलाह को कितना गंभीरता से लेता है और क्या वह भारत के साथ अपने व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्तों में इस यथार्थवाद को जगह देता है या नहीं।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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