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मलेशिया का बड़ा कदम: म्यांमार से होगी बात, 5 हजार रोहिंग्याओं की वापसी का रास्ता साफ

मलेशिया का बड़ा कदम: म्यांमार से होगी बात, 5 हजार रोहिंग्याओं की वापसी का रास्ता साफ

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की प्रयोगशाला में इन दिनों दक्षिण-पूर्व एशिया से एक बेहद दिलचस्प और व्यावहारिक मोड़ सामने आ रहा है। शरणार्थी संकट के मोर्चे पर कड़ा रुख अपनाने वाले मलेशिया ने अब एक ऐसा दांव चला है, जो आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति की दिशा बदल सकता है। मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने म्यांमार के सैन्य शासन के शीर्ष नेतृत्व के साथ सीधी बातचीत का रास्ता चुना है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य केंद्र बिंदु म्यांमार से आए हजारों रोहिंग्या शरणार्थियों की उनके वतन वापसी है, जिस पर अब ठोस चर्चा होने की उम्मीद बंध गई है।

कुआलालंपुर की नई कूटनीति: विरोध से संवाद तक का सफर

मलेशिया की यह पहल इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि कुआलालंपुर लंबे समय से म्यांमार की सैन्य सरकार का मुखर आलोचक रहा है। साल 2021 में हुए तख्तापलट के बाद से ही मलेशिया ने म्यांमार में मानवाधिकारों के हनन और संघर्ष को लेकर कड़ी आपत्ति जताई थी। हालांकि, यथार्थवादी राजनीति (Realpolitik) का तकाजा यह कहता है कि केवल सैद्धांतिक विरोध से जमीन पर जमी समस्याएं हल नहीं होतीं। प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इसी यथार्थ को समझते हुए कूटनीति के बंद दरवाजों को खोलने का फैसला किया है।

कुआलालंपुर का यह रुख साफ करता है कि भले ही मलेशिया अभी भी म्यांमार की सैन्य सरकार को औपचारिक मान्यता देने के मूड में नहीं है, लेकिन मानवीय और प्रशासनिक संकट से निपटने के लिए संवाद अनिवार्य है। अनवर इब्राहिम के अनुसार, केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आलोचना करने से रोहिंग्या शरणार्थियों का भविष्य नहीं सुधरेगा। इसके लिए म्यांमार की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से सीधे टेबल पर बैठकर बात करनी होगी।

करीब 5 हजार शरणार्थियों की वापसी पर बनी सहमति

इस पूरी कूटनीति का सबसे बड़ा ठोस परिणाम यह सामने आया है कि म्यांमार ने लगभग 5,000 रोहिंग्या शरणार्थियों की देश वापसी की मंजूरी दे दी है। इस घोषणा के बाद से मानवाधिकार गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मलेशिया सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन शरणार्थियों की सुरक्षित और सम्मानजनक वापसी का सारा वित्तीय खर्च कुआलालंपुर खुद उठाएगा।

इस दिशा में पहले से ही प्रशासनिक तैयारियां चल रही थीं। इससे पहले मलेशिया ने स्वैच्छिक वापसी कार्यक्रम के तहत सितंबर महीने में लगभग 1,500 म्यांमार नागरिकों को वापस भेजने की अपनी योजना का खाका खींचा था। अब जब शुरुआती चरण के लिए 5,000 का आंकड़ा तय हुआ है, तो मलेशियाई प्रशासन को उम्मीद है कि इस प्रक्रिया के सफल होने पर आने वाले दिनों में और अधिक शरणार्थियों को चरणबद्ध तरीके से उनके घर भेजा जा सकेगा।

सुरक्षा को लेकर संयुक्त राष्ट्र की चिंताएं

एक तरफ जहां मलेशियाई सरकार इस कदम को एक बड़ी कूटनीतिक और मानवीय सफलता मान रही है, वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के सुर अलग हैं। यूएनएचसीआर का मानना है कि म्यांमार के मौजूदा हालात रोहिंग्याओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। वर्ष 2021 के तख्तापलट के बाद से म्यांमार के भीतर जो गृहयुद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, वहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक बड़ा सवालिया निशान है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का तर्क है कि जल्दबाजी में की गई वापसी शरणार्थियों को एक बार फिर से हिंसा और उत्पीड़न के मुहाने पर खड़ा कर सकती है। यही वजह है कि मलेशियाई प्रधानमंत्री के सामने यह चुनौती भी है कि वह म्यांमार सरकार से इस बात की पुख्ता गारंटी लें कि लौटने वाले रोहिंग्याओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव या अत्याचार नहीं होगा।

मिन आंग ह्लाइंग की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता की कोशिश

म्यांमार के सैन्य शासन प्रमुख से राष्ट्रपति बने मिन आंग ह्लाइंग के लिए यह कूटनीतिक दौर बेहद महत्वपूर्ण है। अप्रैल में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद से ही वह अपनी सरकार के लिए वैश्विक स्तर पर मान्यता हासिल करने की जुगत में लगे हैं। इस कड़ी में वह लाओस, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम के साथ-साथ चीन, भारत और रूस की यात्राएं भी कर चुके हैं।

यदि मिन आंग ह्लाइंग मलेशिया का दौरा करते हैं, तो वह आसियान (ASEAN) के 11 सदस्य देशों में से पांचवें ऐसे देश का दौरा करेंगे जो इस सैन्य शासक की यात्रा की मेजबानी करेगा। आसियान समूह के भीतर म्यांमार के संकट को लेकर हमेशा से मतभेद रहे हैं। ऐसे में मलेशियाई प्रधानमंत्री द्वारा उन्हें आधिकारिक यात्रा का निमंत्रण देना क्षेत्रीय कूटनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

स्थायी समाधान की तलाश: मलेशिया की जमीनी हकीकत

रोहिंग्या समुदाय दुनिया के सबसे उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों में शुमार है। म्यांमार से अपनी जान बचाकर भागने वाले इन लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ले रखी है। बांग्लादेश के कॉक्स बाजार स्थित शिविरों में जहां एक मिलियन (दस लाख) से अधिक रोहिंग्या रह रहे हैं, वहीं मलेशिया में भी इनकी एक बड़ी आबादी शरणार्थी के तौर पर मौजूद है।

मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इस सच्चाई को स्वीकार किया है कि उनका देश अनिश्चितकाल तक इन शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता। मलेशिया की अपनी आर्थिक और सामाजिक सीमाएं हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि मलेशिया इन लोगों को स्थायी नागरिकता या घर नहीं दे सकता। इसलिए, समस्या का एकमात्र और अंतिम समाधान यही है कि इन्हें पूरी सुरक्षा और गरिमा के साथ उनके अपने देश वापस भेजा जाए।

संवाद बनाम दबाव: कूटनीतिक रुख में बदलाव

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि मलेशिया का यह नया दृष्टिकोण दक्षिण-पूर्व एशिया में एक नया ट्रेंड सेट कर रहा है। दशकों तक पश्चिमी देशों का तरीका यह रहा है कि वे तानाशाही या सैन्य सरकारों पर कड़े प्रतिबंध लगाते हैं और उन्हें अलग-थलग कर देते हैं। लेकिन म्यांमार के मामले में यह रणनीति पूरी तरह कारगर साबित नहीं हुई है।

अनवर इब्राहिम का यह मानना कि "दबाव के बजाय संवाद अधिक व्यावहारिक है", आधुनिक कूटनीति का एक नया पाठ पढ़ाता है। जब तक आप किसी समस्या के मूल स्रोत (यानी म्यांमार की सरकार) से बात नहीं करेंगे, तब तक शरणार्थियों के संकट का कोई मानवीय हल निकल पाना असंभव है।

भविष्य की राह और चुनौतियां

आने वाले सप्ताह इस बात की तस्दीक करेंगे कि मलेशिया और म्यांमार के बीच होने वाली ये बैठकें जमीन पर कितना असर दिखा पाती हैं। क्या वास्तव में 5 हजार रोहिंग्याओं की वापसी सुरक्षित तरीके से हो पाएगी? क्या म्यांमार सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हुए इन नागरिकों को उनके पैतृक अधिकार देने को तैयार होगी? इन तमाम सवालों के जवाब भले ही अभी भविष्य के गर्भ में हों, लेकिन मलेशिया की इस पहल ने रुकी हुई गाड़ी को एक बार फिर से गति दे दी है।

दक्षिण-एशियाई कूटनीति के मंच पर यह घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि राजनीति में कभी-कभी दुश्मन देशों को भी बातचीत की टेबल पर लाना पड़ता है ताकि मानवता की रक्षा की जा सके। पूरी दुनिया की नजरें अब कुआलालंपुर और नेप्यीडॉ के बीच होने वाली इस आगामी उच्चस्तरीय बैठक पर टिकी हैं।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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