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नेपाल में प्रलय: लापता हाइड्रोपावर कर्मियों को खोजने के लिए पहाड़ियों में ब्लास्ट, अब तक 939 मौतें

नेपाल में प्रलय: लापता हाइड्रोपावर कर्मियों को खोजने के लिए पहाड़ियों में ब्लास्ट, अब तक 939 मौतें

हिमालय की गोद में बसे पड़ोसी देश नेपाल में इस समय कुदरत का ऐसा कहर बरपा है कि हर तरफ चीख-पुकार और मातम का माहौल है। लगातार हो रही भारी बारिश, भयंकर बाढ़ और उसके बाद आए विनाशकारी भूस्खलन (Landslides) ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 939 तक पहुंच गई है। हालात इतने भयानक हैं कि राहत और बचाव कार्यों (Rescue Operations) में जुटे कर्मियों को अपनी जान जोखिम में डालकर एक-एक जिंदगियों को बचाने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

पहाड़ों को उड़ाने के लिए डायनामाइट का सहारा

आपदा के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती उन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के कर्मचारियों को ढूंढना है, जो मलबे और चट्टानों के बीच फंस गए हैं। बचाव दलों को मलबे के उस पार पहुंचने के लिए अब मजबूरन विस्फ़ोटकों (Explosives) का सहारा लेना पड़ रहा है। जिस जगह पर सुरंगें या काम करने की साइट्स धंस गई हैं, वहां भारी चट्टानों को हटाने के लिए नियंत्रित विस्फोट (Controlled Blasts) किए जा रहे हैं।

प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सामान्य मशीनरी और उपकरणों के जरिए इन विशाल चट्टानों को हटाना नामुमकिन साबित हो रहा था। यही वजह है कि सेना और विशेषज्ञ रेस्क्यू टीमों ने पहाड़ियों के एक हिस्से को उड़ाने का खतरनाक निर्णय लिया ताकि अंदर दबे लोगों तक तेजी से पहुंचा जा सके।

अंधेरे में डूबी उम्मीदें, अपनों का इंतजार करतीं बेबस आंखें

घटनास्थल के आसपास और राहत शिविरों में हालात बेहद भावुक कर देने वाले हैं। अपने लापता परिजनों की तलाश में दर-दर भटक रहे परिवारिक सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है। पिछले कई घंटों से अपनों की एक झलक पाने की उम्मीद में बैठी इन आंखों से अब आंसू सूख चुके हैं और उनकी जगह सिर्फ गुस्सा और लाचारी ने ले ली है।

"हम पिछले तीन दिनों से यहां बैठे हैं। हमें सिर्फ इतना जानना है कि हमारे भाई सुरक्षित हैं या नहीं। प्रशासन अपनी पूरी कोशिश कर रहा है, लेकिन इंतजार का यह समय हर पल हमारी सांसें रोक रहा है।" - एक पीड़ित परिवार के सदस्य की दर्दभरी दास्तान।

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बने मौत का कुआं

नेपाल में तेजी से विकसित हो रहे जलविद्युत (Hydropower) सेक्टर के लिए यह आपदा एक बहुत बड़ा झटका साबित हुई है। नदियां अपने पूरे उफान पर हैं और उनके तेज बहाव ने कई पावर प्रोजेक्ट्स को अपनी चपेट में ले लिया है। पानी के अचानक आए सैलाब के कारण कई अंडरग्राउंड टनल और साइट्स में काम कर रहे मजदूर बाहर नहीं निकल पाए और वहीं फंस गए।

  • बचाव कार्य में मुख्य बाधाएं: लगातार बारिश, कीचड़ से भरे रास्ते और ढहते हुए पहाड़।
  • सेना की तैनाती: नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय नागरिक मिलकर चला रहे हैं मेगा रेस्क्यू ऑपरेशन।
  • आर्थिक और ढांचागत नुकसान: देश के बुनियादी ढांचे, सड़कों और बिजली संयंत्रों को अरबों रुपये का नुकसान।

अंतरराष्ट्रीय मदद और आगे की चुनौतियां

इस विकट परिस्थिति से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सहयोग की अपील की है। पड़ोसी देशों और वैश्विक संगठनों से राहत सामग्रियां और आधुनिक रेस्क्यू उपकरण मंगाए जा रहे हैं। हालांकि, मौसम खराब होने के कारण हेलीकॉप्टर्स और हवाई जहाजों की आवाजाही में भारी बाधा आ रही है, जिससे दूर-दराज के इलाकों में राहत पहुंचाना लगभग असंभव हो गया है।

मौसम विभाग ने आने वाले कुछ और दिनों तक भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है, जिससे बचाव दल और स्थानीय प्रशासन की चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं। यदि बारिश का यह दौर नहीं थमता, तो राहत कार्यों को बीच में ही रोकना पड़ सकता है, जो कि फंसे हुए लोगों के लिए बेहद घातक साबित हो सकता है।

निष्कर्ष

नेपाल की यह त्रासदी इंसानी इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक बनती जा रही है। 939 जिंदगियों का असमय चले जाना और अनगिनत लोगों का अभी भी लापता होना इस बात की गवाही देता है कि प्रकृति के प्रकोप के आगे इंसान कितना लाचार है। इस समय पूरी दुनिया की निगाहें नेपाल के इन रेस्क्यू ऑपरेशंस पर टिकी हैं, और हर कोई बस यही प्रार्थना कर रहा है कि मलबे के नीचे फंसे लोग किसी तरह सुरक्षित बाहर आ सकें।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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