कुदरत का जब तांडव होता है, तो वह किसी की भी सामाजिक प्रतिष्ठा, मर्यादा और निजी जरूरतों का लिहाज नहीं करती। नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने तबाही का जो मंजर छोड़ा है, उसने एक बार फिर आपदा प्रबंधन के उन पहलुओं को उजागर कर दिया है, जिन पर अक्सर राहत कार्यों के दौरान सबसे अंत में ध्यान जाता है। पानी के उतरने के बाद शुरू हुई असली जंग अब राहत शिविरों में लड़ी जा रही है, और इस जंग के सबसे बड़े मोर्चे पर खड़ी हैं देश की महिलाएं और किशोरियां।
बाढ़ के तेज बहाव में घर-गृहस्थी के सामान के साथ-साथ कपड़े, बिस्तर और रोजमर्रा की जरूरत का हर सामान बह गया। जो महिलाएं किसी तरह अपनी जान बचाकर राहत शिविरों तक पहुंचने में कामयाब रहीं, वे अपने साथ कोई अतिरिक्त सामान नहीं ला पाईं। अब इन कैंपों में रह रही महिलाओं के सामने एक ऐसा संकट खड़ा हो गया है, जिसके बारे में खुलकर बात करने से समाज आज भी कतराता है, लेकिन यह संकट उनकी बुनियादी गरिमा और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।
राहत सामग्री में पैड तो हैं, पर इनरवेयर का नामोनिशान नहीं
राहत शिविरों में पहुंच रही मदद का जायजा लेने पर एक बेहद संवेदनशील और गंभीर सच सामने आया है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और प्रशासन द्वारा बांटी जा रही राहत सामग्री के पैकेटों में सैनिटरी नैपकिन (पैड) तो किसी-न-किसी रूप में पहुंच रहे हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल के लिए जरूरी अंडरवियर या अन्य अंतरंग वस्त्र (Undergarments) पूरी तरह गायब हैं।
शिविरों में शरण ली हुई कई महिलाओं ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि उन्हें पैड तो मिल रहे हैं, लेकिन बिना इनरवेयर के उनका उपयोग करना असंभव है। एक पीड़ित महिला ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, 'बाढ़ के समय हम सिर्फ अपने तन के कपड़ों में घर से निकले थे। अब कैंप में चावल, दाल और कंबल मिल रहे हैं। पैड भी दे दिए जाते हैं, लेकिन बिना इनरवेयर के हम उनका उपयोग कैसे करें? क्या कोई इस बात को समझता है कि महिलाओं की अपनी कुछ शारीरिक और निजी जरूरतें भी होती हैं?'
शर्म और संकोच के साए में कट रहे हैं दिन
पारंपरिक सामाजिक ढांचे और संकोच के कारण महिलाएं अपनी इस समस्या को खुलकर अधिकारियों या राहत कार्य में जुटे स्वयंसेवकों के सामने रख भी नहीं पा रही हैं। राहत शिविरों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव और सैकड़ों लोगों के बीच एक ही छत के नीचे या तंबुओं में रहना इन महिलाओं के मानसिक तनाव को कई गुना बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आपदा प्रबंधन की कार्ययोजनाओं में अक्सर महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता (Menstrual Hygiene) से जुड़े उत्पादों को प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे रखा जाता है। भोजन और पेयजल के बाद दवाइयों की बात होती है, लेकिन महिलाओं के पर्सनल हाइजीन प्रोडक्ट्स को 'अतिरिक्त' या 'कम जरूरी' मान लिया जाता है, जो कि संकट के समय में एक बड़ी भूल साबित होती है।
स्वास्थ्य पर मंडरा रहा है गंभीर संक्रमण का खतरा
पीरियड्स के दौरान स्वच्छता का ध्यान न रख पाने और पर्याप्त कपड़े या पैड न मिलने के कारण महिलाओं में वजाइनल इन्फेक्शन, यूटीआई (Urinary Tract Infection) और अन्य गंभीर गुप्त रोगों का खतरा खतरनाक रूप से बढ़ गया है। राहत शिविरों में साफ पानी की पहले से ही किल्लत है, ऐसे में महिलाएं अपने पुराने या गीले कपड़ों को ही बार-बार इस्तेमाल करने को मजबूर हैं, जो स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद खतरनाक है।
- स्वच्छता की कमी: राहत शिविरों में नहाने और कपड़े धोने के लिए प्रर्याप्त निजी जगह का अभाव।
- संक्रमण का डर: गंदे पानी और बिना बदले लंबे समय तक एक ही कपड़े के इस्तेमाल से बीमारियां फैलने का अंदेशा।
- मानसिक आघात: बाढ़ का डर और ऊपर से अपनी बुनियादी निजता (Privacy) के छिन जाने का मानसिक तनाव।
प्रशासन और मदद करने वालों के लिए एक बड़ी सीख
- नेपाल की इस आपदा ने राहत और बचाव कार्यों से जुड़े लोगों के लिए एक गंभीर सबक छोड़ा है। जब भी किसी बाढ़ या भूकंप प्रभावित क्षेत्र में राहत सामग्री भेजी जाए, तो उसमें सिर्फ राशन और कंबल तक ही सीमित न रहा जाए। महिलाओं और किशोरियों की गरिमा और स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए 'डिग्निटी किट्स' (Dignity Kits) बांटना बेहद जरूरी है, जिसमें सैनिटरी पैड के साथ-साथ साफ इनरवेयर और अन्य जरूरी पर्सनल हाइजीन के सामान शामिल हों।
- फिलहाल, नेपाल के इन राहत शिविरों में रह रही महिलाएं सिर्फ अपने टूटे हुए घरों को दोबारा बसाने का सपना ही नहीं देख रही हैं, बल्कि वे हर दिन एक ऐसी अदृश्य लड़ाई भी लड़ रही हैं, जो उनकी सेहत और आत्मसम्मान से जुड़ी है। जरूरत इस बात की है कि राहत कार्यों की निगरानी कर रहे अधिकारी और समाज के संभ्रांत लोग इस मौन दर्द को समझें और तुरंत प्रभाव से इस जरूरी जरूरत को पूरा करें।