वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारत के बढ़ते कद और उसकी ग्लोबल स्वीकार्यता का एक और बड़ा उदाहरण संयुक्त राष्ट्र से सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के एक उच्च-स्तरीय सत्र के दौरान रूस ने एक बार फिर खुलकर भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का पुरजोर समर्थन किया है। रूस के इस रुख से वैश्विक राजनीति के गलियारों में एक बार फिर नए समीकरणों पर चर्चा तेज हो गई है, खासकर तब जब दुनिया बहुध्रुवीय (Multiplex World) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का कड़ा और स्पष्ट रुख
संयुक्त राष्ट्र के मंच पर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बेबाकी से अपनी बात रखते हुए कहा कि वैश्विक मंचों और संस्थाओं में सुधार की प्रक्रिया के नाम पर मौजूदा स्थायी सदस्यों के अधिकारों या शक्तियों को कम करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। लावरोव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब यूएनएससी में सुधार और वीटो पावर के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से वैश्विक बहस छिड़ी हुई है।
रूसी विदेश मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार या सुधार का यह कतई मतलब नहीं होना चाहिए कि मौजूदा ढांचा कमजोर हो जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि सुरक्षा परिषद में नए सदस्यों को जोड़ा जाता है, तो किसी भी मौजूदा स्थायी सदस्य के विशेषाधिकारों (Veto Power and Rights) में कोई कटौती नहीं की जानी चाहिए।
पश्चिमी देशों के प्रभुत्व पर सीधा सवाल
अपने संबोधन में सर्गेई लावरोव ने पश्चिमी देशों की नीतियों और यूएनएससी में उनके भारी प्रतिनिधित्व पर भी खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा परिषद में अतिरिक्त स्थायी सीटें केवल पश्चिमी देशों की झोली में नहीं जानी चाहिए। उनका तर्क था कि इस अहम वैश्विक संस्था में पहले से ही पश्चिमी देशों का प्रभाव और प्रतिनिधित्व काफी अधिक है।
लावरोव ने अपने भाषण के दौरान जापान और जर्मनी का विशेष तौर पर जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन देशों के रवैये में कई बार सैन्यवाद और पुरानी बातों या बदले की भावना की झलक मिलती है, जिस पर वैश्विक शांति के हित में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को मिलना चाहिए उचित प्रतिनिधित्व
रूस का हमेशा से यह स्टैंड रहा है कि संयुक्त राष्ट्र के सबसे शक्तिशाली अंगों में ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज को मजबूत किया जाना चाहिए। सर्गेई लावरोव ने इस बात पर जोर दिया कि यूएनएससी के भीतर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे बड़े क्षेत्रों का वर्चस्व और प्रतिनिधित्व बढ़ना निहायत जरूरी है। आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं को यदि नजरअंदाज किया गया, तो संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठना लाजिमी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का यह बयान कूटनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि यह सीधे तौर पर भारत के उस तर्क को बल देता है, जिसमें लंबे समय से यह कहा जा रहा है कि दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देश को मुख्य टेबल से बाहर रखना वैश्विक लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक
इसी सत्र के दौरान रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकात भी हुई। दोनों दिग्गजों के बीच यह मुलाकात बेहद गर्मजोशी भरे माहौल में संपन्न हुई। कूटनीतिक हलकों में इस मुलाकात को दोनों देशों के बीच गहरी रणनीतिक साझेदारी और आपसी भरोसे का प्रतीक माना जा रहा है। हालांकि इस बैठक में किन-किन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई, इस पर आधिकारिक बयान आने बाकी हैं, लेकिन भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा इस बातचीत के केंद्र में जरूर रहा होगा।
यूएनएससी में भारत की लंबी और निरंतर मांग
आइए जानते हैं कि भारत और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बीच इस पूरे सफर का इतिहास क्या रहा है। वर्तमान में UNSC के पास कुल 15 सदस्य देश हैं। इनमें से 5 देश स्थायी सदस्य हैं, जिन्हें दुनिया की महाशक्तियां कहा जाता है- चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका। इन पांचों देशों के पास 'वीटो पावर' यानी किसी भी प्रस्ताव को अकेले खारिज करने की विशेष शक्ति होती है।
इन 5 स्थायी सदस्यों के अलावा सुरक्षा परिषद में 10 अस्थायी सदस्य देश भी होते हैं, जिनका कार्यकाल महज 2 साल का होता है। भारत कई बार अस्थायी सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभा चुका है और अपनी कुशल कूटनीति का लोहा मनवा चुका है, लेकिन भारत की असली और बड़ी मांग हमेशा से 'स्थायी सदस्यता' (Permanent Membership) हासिल करने की रही है।
जी-4 समूह और दशकों पुरानी कूटनीति
भारत 1990 के दशक से ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए लगातार और मजबूती से अपनी दावेदारी पेश कर रहा है। साल 2008 में यूएन में सुरक्षा परिषद के सुधारों को लेकर औपचारिक बातचीत शुरू हुई थी। इसके बाद, साल 2010 में भारत ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर 'G4' समूह का गठन किया।
इस G4 ग्रुप के माध्यम से इन चारों देशों ने संयुक्त राष्ट्र में सामूहिक रूप से स्थायी सीटों के लिए अपनी दावेदारी को और अधिक आक्रामक और संगठित तरीके से आगे बढ़ाया। हालांकि, आज भी यह मुद्दा अनसुलझा है क्योंकि UNSC के मौजूदा सदस्य देशों के बीच नए स्ट्रक्चर, वीटो पावर के विस्तार और भौगोलिक प्रतिनिधित्व के फार्मूले को लेकर अब तक पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है।
आगे की राह: क्या भारत को मिलेगी परमानेंट सीट?
भले ही संयुक्त राष्ट्र में आम सहमति बनने की प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल हो, लेकिन रूस जैसे स्थापित और स्थायी सदस्य देश द्वारा बार-बार और सार्वजनिक रूप से भारत का समर्थन किया जाना एक बड़ा कूटनीतिक मील का पत्थर है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ ग्लोबल पीसकीपिंग मिशन (UN Peacekeeping) में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है।
रूस के इस ताज़ा समर्थन के बाद एक बार फिर यह बहस छिड़ गई है कि क्या वैश्विक महाशक्तियां अब संयुक्त राष्ट्र के पुराने ढांचे को बदलकर 21वीं सदी की सच्चाइयों को स्वीकार करने के लिए तैयार हो रही हैं? आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि पश्चिमी देश और अन्य स्थायी सदस्य रूस के इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और भारत की इस न्यायसंगत मांग को वैश्विक मंच पर कितनी गति मिलती है।