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यमन के हूती: एक साधारण पहाड़ी मिलिशिया से ग्लोबल सुपरपावर की सिरदर्द बनने तक की खौफनाक दास्तान

यमन के हूती: एक साधारण पहाड़ी मिलिशिया से ग्लोबल सुपरपावर की सिरदर्द बनने तक की खौफनाक दास्तान

रेत और पहाड़ों के बीच से उठने वाला एक ऐसा तूफान, जिसने आज दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।

दिसंबर 2026 के इस दौर में जब पूरी दुनिया जियो-पॉलिटिकल उथल-पुथल से गुजर रही है, तब मध्य-पूर्व (Middle East) का एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है—हूती (Houthis)। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उत्तरी यमन की दुर्गम पहाड़ियों में लाठियों और पुरानी राइफलों के साथ लड़ने वाला एक छोटा सा स्थानीय विद्रोही समूह, आज कैसे आधुनिक मिसाइलों और ड्रोनों के जरिए ग्लोबल ट्रेड रूट को हिला रहा है?

यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन यह पिछले कुछ दशकों में मिडिल ईस्ट के बदलते राजनीतिक समीकरणों की एक बेहद कड़वी और सनसनीखेज सच्चाई है। आइए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर कैसे हाशिए पर मौजूद हूती आंदोलन ने दुनिया के सबसे खतरनाक क्षेत्रीय खतरों में से एक का रूप ले लिया।

शुरुआत: ज़ैदी शिया समुदाय और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

नब्बे के दशक की शुरुआत में हूती आंदोलन की नींव पड़ी थी। उस समय इसे 'बाबुल यूथ' (Believing Youth) के रूप में जाना जाता था। इसके संस्थापक हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती (Hussein Badreddin al-Houthi) थे। शुरुआत में इसका मकसद यमन के सुदूर उत्तर में रहने वाले ज़ैदी शिया समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाना था।

  • धार्मिक पहचान: ज़ैदी, शिया इस्लाम की एक अलग शाखा है, जो यमन की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं।
  • सांस्कृतिक चिंताएं: संस्थापकों को डर था कि यमन की केंद्रीय सरकार और सऊदी अरब समर्थित सुन्नी वहाबी विचारधारा उनके पारंपरिक धार्मिक ताने-बाने को नष्ट कर रही है।
  • शुरुआती संघर्ष: शुरुआत में यह संगठन पूरी तरह से शांतिपूर्ण शैक्षिक गतिविधियों और सांस्कृतिक शिविरों तक सीमित था।

लेकिन राजनीति और सत्ता की महत्वाकांक्षाएं अक्सर धार्मिक आंदोलनों का रुख मोड़ देती हैं। साल 2003 में अमेरिकी नेतृत्व में इराक पर हुए आक्रमण और यमन सरकार के अमेरिकी नीतियों के प्रति नरम रुख ने इस स्थानीय समूह के तेवर पूरी तरह बदल दिए।

मोड़: जब विद्रोही और सरकार आमने-सामने आ गए

साल 2004 का वह दौर जब यमन के तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह ने हूती नेतृत्व को गिरफ्तार करने या दबाने का आदेश दिया। यहीं से इस संगठन का सशस्त्र संघर्ष (Armed Insurgency) शुरू हुआ। सेना के साथ एक मुठभेड़ में संस्थापक हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती मारे गए।

लेकिन हुसैन की मौत इस आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत साबित हुई। उनके परिवार और करीबी कमांडरों ने संगठन की कमान संभाली और इसे और अधिक आक्रामक बना दिया। उनके नाम पर ही इस समूह को 'हूती' कहा जाने लगा। यमन सरकार के साथ इनके संघर्ष के कई दौर चले, जिन्हें 'सादह युद्ध' (Sa'dah Wars) के नाम से जाना जाता है। इन लड़ाइयों में हूतियों ने पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर अपनी छापामार युद्ध (Guerrilla Warfare) की कला को इतना मजबूत कर लिया कि यमन की आधिकारिक सेना भी उनके सामने पस्त होने लगी।

साल 2011 की अरब क्रांति और सत्ता का समीकरण पलटना

वर्ष 2011 में जब 'अरब स्प्रिंग' (Arab Spring) की आंधी ने मध्य-पूर्व को अपनी चपेट में लिया, तो यमन भी अछूता नहीं रहा। दशकों से सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस राजनीतिक शून्यता (Political Vacuum) का सबसे बड़ा फायदा हूतियों ने उठाया। उन्होंने उत्तर के अपने गढ़ से निकलकर देश की राजधानी सना (Sana'a) की ओर कूच किया। साल 2014 के अंत तक हूतियों ने राजधानी पर कब्जा जमा लिया। यह उनके इतिहास का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था। एक साधारण पहाड़ी मिलिशिया अब लगभग पूरे देश की सत्ता के केंद्र में आ चुकी थी।

क्षेत्रीय महाशक्ति से सीधी टक्कर और सऊदी गठबंधन

यमन की राजधानी पर हूतियों के कब्जे से पड़ोसी देश सऊदी अरब की नींद उड़ गई। रियाद को यह डर सताने लगा कि उसकी दक्षिणी सीमा पर ईरान समर्थक एक कट्टरपंथी शिया मिलिशिया का मजबूत होना उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक भारी-भरकम अरब गठबंधन (Arab Coalition) ने हूतियों के खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप शुरू कर दिया। दुनिया को लगा कि कुछ ही हफ्तों में यह छोटा विद्रोही समूह अत्याधुनिक हथियारों और लड़ाकू विमानों के आगे घुटने टेक देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

"सालों की भीषण बमबारी और मानवीय संकट के बावजूद हूतियों ने न केवल अपने इलाकों को बचाए रखा, बल्कि तकनीक के मामले में खुद को अपग्रेड भी किया।"

लोकल से ग्लोबल थ्रेट बनने की असली कहानी

पिछले कुछ वर्षों में हूतियों ने अपनी सैन्य क्षमताओं में अभूतपूर्व विस्तार किया है। अब वे केवल यमन के भीतर लड़ने वाली ताकत नहीं रह गए थे। उन्होंने ईरान के कथित तकनीकी समर्थन से आधुनिक ड्रोन, कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें और क्रूज मिसाइलें विकसित कर लीं।

उन्होंने इसका ट्रेलर समय-समय पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के तेल ठिकानों और हवाई अड्डों पर हमले करके दिखाया। लेकिन साल 2023 के अंत और 2024 के बाद से उन्होंने अपनी पहुंच को वैश्विक स्तर पर साबित कर दिया।

लाल सागर (Red Sea) संकट और वैश्विक व्यापार पर असर

जब गाजा संघर्ष शुरू हुआ, तो हूतियों ने फिलिस्तीनियों के समर्थन का ऐलान किया और लाल सागर से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। विश्व का एक बड़ा व्यापारिक मार्ग बाबल-मंदेब जलडमरूमध्य (Bab el-Mandeb strait) उनकी जद में आ गया।

  • शिपिंग रूट बदलना: दुनिया की बड़ी शिपिंग कंपनियों को अपने जहाज अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से भेजने पड़े।
  • महंगाई का बढ़ना: ईंधन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ा।
  • पश्चिमी देशों की नाकामी: अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर हूती ठिकानों पर कई हवाई हमले किए, लेकिन वे इस समूह की मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करने की क्षमता को पूरी तरह नष्ट करने में नाकामयाब रहे।

भविष्य की अनिश्चितताएं

आज हूती सिर्फ एक मिलिशिया नहीं हैं, बल्कि वे यमन के एक बड़े भू-भाग पर डी-फैक्टो सरकार चला रहे हैं। उनके पास अपने प्रशासनिक संस्थान, अपनी कर प्रणाली और एक लाख से अधिक अनुशासित लड़ाकों की फौज है।

एक छोटे से पहाड़ी आंदोलन से शुरू हुआ यह सफर इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक अस्थिरता, बाहरी हस्तक्षेप और स्थानीय कूटनीति मिलकर किसी मामूली समूह को ग्लोबल सुपरपावर के लिए भी एक बड़ी चुनौती बना सकती है। आने वाले समय में यमन की यह शक्ति संतुलन की राजनीति मध्य-पूर्व के भविष्य को किस दिशा में ले जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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