छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा कहे जाने वाले रायपुर-बिलासपुर नेशनल हाईवे-130 पर सफर करना अब किसी जोखिम भरे खेल से कम नहीं रह गया है। करीब 1500 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार किया गया यह 6-लेन हाईवे आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। हाल ही में सामने आई एक जमीनी हकीकत ने इस सड़क निर्माण की पोल खोलकर रख दी है, जहां महज 90 किलोमीटर के सफर में 500 से अधिक जानलेवा गड्ढे चालकों का इंतजार कर रहे हैं।
90 किलोमीटर का सफर और हर कदम पर मौत का खतरा
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को सांस्कृतिक और औद्योगिक नगरी बिलासपुर से जोड़ने वाला यह मार्ग कभी सुगम और तेज रफ्तार सफर के लिए जाना जाता था। लेकिन वर्तमान में इसकी हालत किसी खस्ताहाल ग्रामीण रास्ते से भी बदतर हो चुकी है। रायपुर से सिमगा और फिर सिमगा से बिलासपुर तक के 90 किलोमीटर के सफर में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी हैं।
सड़क पर जगह-जगह इतने गहरे गड्ढे हो चुके हैं कि वाहन चालकों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता। कई स्थानों पर डामर पूरी तरह उखड़ चुका है और सड़क आधा से एक फीट तक धंस गई है। स्थिति यह है कि तेज रफ्तार गाड़ियां अचानक इन गड्ढों में धंस जाती हैं, जिससे सस्पेंशन टूटने से लेकर गंभीर सड़क हादसों तक की आशंका हर पल बनी रहती है.
इन बड़ी खामियों ने बढ़ाई मुसाफिरों की मुसीबत
करोड़ों की लागत वाले इस आधुनिक हाईवे की इस दुर्दशा के पीछे कई गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक खामियां नजर आती हैं:
- घटिया पेंचवर्क: कुछ समय पहले ही खानापूर्ति के लिए किए गए पेंचवर्क उखड़ चुके हैं। स्थिति यह है कि फ्लाईओवर के लोहे के सरिए तक बाहर झांकने लगे हैं, जो टायर फटने का मुख्य कारण बन रहे हैं।
- 90 फीसदी स्ट्रीट लाइटें बंद: रात के समय इस मार्ग पर सफर करना और भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। हाईवे की करीब 90 प्रतिशत स्ट्रीट लाइटें महीनों से बंद पड़ी हैं, जिसके चलते अंधेरे में गड्ढे दिखाई नहीं देते और वाहन सीधे उनमें जा गिरते हैं।
- डेंजर जोन बने प्रमुख इलाके: रायपुर-सिलतरा, रायपुर-धरसींवा फ्लाईओवर, तरपोंगी, सिमगा और सड्डू जैसे इलाके इस हाईवे पर सबसे खतरनाक डेंजर जोन में तब्दील हो चुके हैं।
रोजाना 45 से 50 हजार वाहन चालकों की जान जोखिम में
यह मार्ग केवल एक साधारण सड़क नहीं, बल्कि एक व्यस्त औद्योगिक गलियारा भी है। यहाँ से रोजाना 45,000 से 50,000 छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। इनमें भारी कमर्शियल गाड़ियां, मालवाहक ट्रक, यात्री बसें, और रोजमर्रा दफ्तर आने-जाने वाले लोगों की कारें और दोपहिया वाहन शामिल हैं। इन गड्ढों से बचने के चक्कर में वाहन चालक अचानक अपनी लेन बदलने को मजबूर होते हैं, जिसके कारण आए दिन आमने-सामने की भिड़ंत और दुर्घटनाएं हो रही हैं।
अमूमन दो घंटे में तय होने वाला यह 90 किलोमीटर का सफर अब ट्रैफिक जाम और गड्ढों के कारण 3 से 4 घंटे का समय ले रहा है। खासकर भारी वाहनों की आवाजाही के कारण यहाँ हर वक्त जाम और अनहोनी का डर बना रहता है।
रायपुर-बिलासपुर 6-लेन हाईवे एक नजर में
- कुल लागत: 1500 करोड़ रुपये से अधिक
- सड़क का प्रकार: 6-लेन नेशनल हाईवे
- निर्माण कार्य पूरा होने का वर्ष: 2018
- जिम्मेदार विभाग: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई)
- दैनिक यातायात: 45,000 से 50,000 वाहन
अधिकारियों का क्या है कहना?
इस पूरे मामले पर जब एनएचएआई के बिलासपुर पीआईयू के प्रोजेक्ट डायरेक्टर मुकेश कुमार परगनिहा से बात की गई, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि सिमगा से बिलासपुर के बीच का कुछ हिस्सा रायपुर पीआईयू के अंतर्गत आता है। हालांकि, खराब सड़कों की मरम्मत का कार्य तेजी से शुरू कर दिया गया है और संबंधित कंस्ट्रक्शन एजेंसी को सख्त दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों की लागत से बने इस हाईवे की गारंटी अभी बाकी है, तो जनता को अपनी जान जोखिम में डालकर सफर क्यों करना पड़ रहा है? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब छत्तीसगढ़ के हर आम नागरिक की जुबान पर है।