बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर की 300 साल पुरानी पारंपरिक मिठाई झरुआ की दीपावली और छठ पर भारी मांग रहती है। जानिए इसकी खासियत और कारोबार के बारे में।
आधुनिक मिठाइयों के दौर में भी बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर की पारंपरिक मिठाई 'झरुआ' ने अपनी तीन सदियों पुरानी पहचान और मिठास को बरकरार रखा है। दीपावली से लेकर छठ पूजा तक के त्योहारी सीजन में इस पारंपरिक व्यंजन की मांग कई गुना बढ़ जाती है।
शाहपुर की पहचान केवल अपनी मिट्टी और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की लगभग तीन सौ साल पुरानी खास मिठाई 'झरुआ' भी इसकी संस्कृति का अहम हिस्सा है। बाजार में आधुनिक और रंग-बिरंगी मिठाइयों की भरमार होने के बावजूद इस पारंपरिक स्वाद की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। त्योहारों के मौसम में करीब एक सप्ताह के दौरान शाहपुर में 70 से 80 क्विंटल तक झरुआ की बिक्री दर्ज की जाती है, जिससे लाखों रुपये का कारोबार होता है और सैकड़ों स्थानीय परिवारों को आजीविका मिलती है।
त्योहारों के दिनों में चरम पर पहुंचती है मांग
धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज और छठ जैसे बड़े पर्व झरुआ बनाने वाले कारीगरों और कारोबारियों के लिए सबसे व्यस्त और खास समय होते हैं। त्योहार नजदीक आते ही इसके निर्माण की रफ्तार काफी तेज हो जाती है और मांग पूरी करने के लिए कारीगर दिन-रात मेहनत करते हैं। अकेले गोवर्धन पूजा और भैया दूज के दौरान ही लगभग 30 से 40 क्विंटल झरुआ बिक जाता है। इसके बाद दीपावली और छठ के प्रसाद तक इसकी खरीदारी का सिलसिला लगातार जारी रहता है।
गुड़ और बेसन से तैयार होती है देसी मिठास
झरुआ की सबसे बड़ी विशेषता इसका ठेठ देसी स्वाद और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया है। इसे चने के बेसन से तैयार की जाने वाली बेहद बारीक बूंदियों से बनाया जाता है। इन बूंदियों को घी या डालडा में सुनहरे होने तक तला जाता है और फिर देसी गुड़ के पाग में मिलाया जाता है। गुड़ की प्राकृतिक मिठास और बेसन का अनूठा मेल इसे बाजार की अन्य आधुनिक मिठाइयों से बिल्कुल अलग पहचान देता है।
लंबी शेल्फ लाइफ और धार्मिक आयोजनों में महत्व
यह मिठाई केवल स्वाद के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि लंबे समय तक सुरक्षित रहने के कारण भी लोग इसे पर्व-त्योहारों पर पहले से खरीदकर अपने घरों में रख लेते हैं। दीपावली की पूजा से लेकर गोवर्धन पूजा और चार दिवसीय छठ महापर्व के प्रसाद तक में इसकी विशेष मांग रहती है। इसके अलावा, मेहमानों और रिश्तेदारों का मुंह मीठा कराने के लिए भी स्थानीय लोग इसे प्राथमिकता देते हैं।
तीन सदियों पुरानी पारिवारिक विरासत
स्थानीय कारोबारियों के मुताबिक, शाहपुर में झरुआ बनाने की यह परंपरा तीन सौ से अधिक वर्षों से चली आ रही है। वर्तमान में लगभग आधा दर्जन परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। संतोष साह, तुला साह और श्रीभगवान साह के परिवार इस कला को लंबे समय से सहेजे हुए हैं। ये परिवार सालभर झरुआ तैयार करते हैं, लेकिन त्योहारी सीजन में उत्पादन कई गुना बढ़ा दिया जाता है।
त्योहारों के दौरान मांग इतनी अधिक होती है कि एक परिवार प्रतिदिन लगभग तीन से चार क्विंटल तक झरुआ का उत्पादन करता है। शाहपुर के स्थानीय बाजारों के अलावा इसे आसपास के ग्रामीण और शहरी इलाकों में भी भेजा जाता है। वर्तमान में बाजार में झरुआ की सामान्य कीमत 120 से 130 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है, जबकि विशेष गुणवत्ता वाले झरुआ की मांग भी बनी रहती है।
सैकड़ों परिवारों के लिए आजीविका का बड़ा जरिया
झरुआ का कारोबार केवल इसे बनाने वाले कुछ परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े सैकड़ों दुकानदार और छोटे व्यापारी भी लाभान्वित होते हैं। त्योहारों के समय मांग बढ़ने से कारीगरों और दुकानदारों को अतिरिक्त रोजगार मिलता है, जिससे यह पारंपरिक मिठाई स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है।
दिग्गज राजनेताओं और धार्मिक अनुष्ठानों तक पहुंची लोकप्रियता
शाहपुर के झरुआ का स्वाद आम लोगों के साथ-साथ कई चर्चित हस्तियों को भी भाया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, शिवानंद तिवारी और प्रोफेसर केके तिवारी जैसे दिग्गज राजनेता भी इस मिठाई के मुदिर रहे हैं। इसके अलावा, धार्मिक आयोजनों में भी इसकी विशेष पूछपरख रही है। लक्ष्मी प्रपन्न जियर स्वामी के सानिध्य में आयोजित होने वाले महायज्ञ और ज्ञान यज्ञ जैसे बड़े आयोजनों में भी झरुआ को प्रसाद के रूप में वितरित किए जाने की परंपरा रही है।
आधुनिकता की दौड़ में जहां कई पुरानी चीजें विलुप्त हो रही हैं, वहीं शाहपुर का झरुआ अपनी माटी की खुशबू और परंपरा को संजोए हुए नई पीढ़ी तक अपनी मिठास पहुंचा रहा है।