कोलकाता के किराए के मकान से लेकर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर में कनीय विज्ञानी बनने तक का सफर। जानिए डॉ. सुदेशना की प्रेरणादायक सफलता की कहानी।
कोलकाता के किराए के छोटे से मकान से निकलकर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर में कनीय विज्ञानी के पद तक पहुंचने वाली डॉ. सुदेशना की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए एक मिसाल है, जो विपरीत परिस्थितियों के आगे हार मान जाते हैं। कम उम्र में पिता का साया उठने और गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद मां के फौलादी संकल्प और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने यह मुकाम हासिल किया है।
मूल रूप से पश्चिम बंगाल के कोलकाता की रहने वाली डॉ. सुदेशना जब महज पांचवीं कक्षा में पढ़ रही थीं, तभी उनके पिता संदीप दास का असामयिक निधन हो गया था। इस अचानक हुई ट्रेजेडी से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा और उनकी पहले से ही सीमित आर्थिक स्थिति और अधिक बदतर हो गई। उस समय भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता छा गई थी, लेकिन परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
किराए के मकान में रहकर मां ने संभाली जिम्मेदारी
इस विकट घड़ी में उनकी मां गोपा दास ने परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी बेटी की तकदीर संवारने का जिम्मा उठाया। उन्होंने जीवन भर किराए के एक छोटे से मकान में रहकर संघर्ष किया और एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट की नौकरी करके परिवार का खर्च चलाया। अपनी सीमित आमदनी से एक-एक पैसा बचाकर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सुदेशना की पढ़ाई-लिखाई में किसी प्रकार की कोई बाधा न आए।
मां के इस मौन त्याग और संघर्ष ने सुदेशना को हर चुनौती का डटकर मुकाबला करने की आंतरिक शक्ति दी। उन्होंने अभावों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय आगे बढ़ने की सीढ़ी बनाया। उनकी शैक्षणिक मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी 11वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी तरह से मेधा छात्रवृत्ति के बल पर पूरी की।
मेडिकल का सपना छूटा तो कृषि विज्ञान में चुनी नई राह
शुरुआत में सुदेशना का सपना एक डॉक्टर बनकर इंसानों की सेवा करने का था। हालांकि, परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति मेडिकल की पढ़ाई के भारी-भरकम खर्च को उठाने की अनुमति नहीं दे रही थी। कठिन समय में उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया और अपनी दिशा बदलकर कृषि विज्ञान को चुना। उन्होंने इस नए क्षेत्र में दिन-रात एक करके पढ़ाई की और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की।
उनकी इस मेहनत का परिणाम तब सामने आया जब उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में ऑल इंडिया 18वीं रैंक हासिल की। इस शानदार सफलता के बाद उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में शुमार गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (पंतनगर) से छात्रवृत्ति के सहारे ही एमएससी और डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में वे बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर में कनीय विज्ञानी के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं।
मां को एक पक्का घर देना ही अब सबसे बड़ी ख्वाहिश
जीवन में सफलता के इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी डॉ. सुदेशना के मन में एक बड़ी और भावनात्मक हसरत बाकी है। जिस मां ने अपनी पूरी जवानी और खुशियां किराए के कमरों में गुजार दीं, अब वह अपनी उसी मां को एक स्थायी छत और अपना मकान उपहार में देना चाहती हैं।
डॉ. सुदेशना बताती हैं कि उनका बस एक ही सपना है कि वे अपनी मां को उनका अपना घर दे सकें। उनकी यह सादगी भरी इच्छा मां के प्रति उनकी असीम कृतज्ञता और वर्षों के संघर्ष के सम्मान को दर्शाती है। उनका संदेश स्पष्ट है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि मन में धैर्य, स्वावलंबन और खुद पर अटूट विश्वास हो, तो बंद रास्ते भी अपने आप खुल जाते हैं।