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बाढ़ के पानी में हवाई चप्पल और सिर पर मूरेठा: कटिहार डीएम का यह अंदाज जीत रहा है दिल

बाढ़ के पानी में हवाई चप्पल और सिर पर मूरेठा: कटिहार डीएम का यह अंदाज जीत रहा है दिल

बिहार के कई इलाके इन दिनों प्रकृति के भयंकर प्रकोप यानी विनाशकारी बाढ़ की चपेट में हैं। हर तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा है और लोगों की जिंदगी थम सी गई है। इस प्राकृतिक आपदा के बीच सियासत अपनी जगह गर्म है, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग का दौर भी जोरों पर है। नेता आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हैं, लेकिन इन सबके बीच प्रशासनिक महकमे से कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो सियासत के शोर से कोसों दूर इंसानी जज्बे और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की एक नई और अनूठी दास्तां बयां कर रही हैं। हम बात कर रहे हैं कटिहार जिले की, जहां बाढ़ की विभीषिका के बीच जिला प्रशासन की सक्रियता और विशेष तौर पर जिलाधिकारी का काम करने का अनूठा तरीका इस समय हर किसी की जुबान पर है।

सात लाख से अधिक आबादी प्रभावित, युद्धस्तर पर चल रहा है राहत अभियान

आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो स्थिति काफी गंभीर है। कटिहार जिले के लगभग 6 प्रखंडों की 7 लाख से अधिक आबादी इस बाढ़ की चपेट में आकर बुरी तरह प्रभावित हुई है। नदियां उफान पर हैं और पानी रिहायशी इलाकों से लेकर खेतों और सड़कों तक फैल चुका है। ऐसे में जनजीवन को सामान्य रखने और राहत सामग्री को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी है। सुदूर और पानी से पूरी तरह घिरे इलाकों में आवागमन सुचारू रखने के लिए बड़े पैमाने पर नावों का परिचालन किया जा रहा है।

प्रभावित इलाकों में राहत कार्यों के तहत प्रशासन की तरफ से कई मोर्चों पर काम किया जा रहा है:

  • बाढ़ पीड़ितों के सिर पर छत बनी रहे इसके लिए बड़े पैमाने पर पॉलिथीन शीट का वितरण किया जा रहा है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त रखने के लिए जगह-जगह मेडिकल कैंप लगाए गए हैं ताकि बीमारियों के फैलने से रोका जा सके।
  • मवेशियों के चारे की व्यवस्था के लिए पशु चारा उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • भूखे और बेसहारा लोगों के लिए कम्युनिटी किचन (सामुदायिक रसोई) के जरिए भोजन की पुख्ता व्यवस्था की गई है।

हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर जब राहत और बचाव कार्य चलते हैं, तो व्यवस्था में कुछ कमियां सामने आना स्वाभाविक है। कई जगहों से असंतोष और शिकायतों की बातें भी उठी हैं। लेकिन सबसे सकारात्मक बात यह है कि इन शिकायतों को दरकिनार करने के बजाय जिलाधिकारी खुद इनकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं और मौके पर ही सुधार के कड़े निर्देश दे रहे हैं। हाल ही में आपदा प्रबंधन मंत्री रत्नेश सादा ने भी कटिहार के प्रभावित इलाकों का दौरा किया था और जिला प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे राहत कार्यों पर अपनी पूरी संतोष जाहिर किया है।

हवाई चप्पल और सिर पर मूरेठा: दुर्गम गोबराही दियारा पहुंचे डीएम

राहत सामग्रियों के कागजी वितरण से कहीं आगे बढ़कर, कटिहार के जिलाधिकारी ने ज़मीन पर उतरकर जो कार्यशैली दिखाई है, वह प्रशासनिक इतिहास में एक मिसाल बनती जा रही है। बाढ़ की स्थिति का जमीनी और सटीक जायजा लेने के लिए वह एसी कमरों में बैठकर आदेश देने वाले अधिकारियों से बिल्कुल अलग नजर आते हैं। वे कभी साधारण हवाई चप्पल पहनकर जलमग्न रास्तों पर उतर जाते हैं, तो कभी अति-दुर्गम गोबराही दियारा जैसे बीहड़ इलाके का रुख कर लेते हैं।

गोबराही दियारा एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जहां सामान्य दिनों में भी प्रशासनिक अधिकारियों और सरकारी अमले की आवाजाही नाममात्र की ही होती है। ऐसे दुर्गम इलाके में, जहां चारों तरफ पानी का साम्राज्य हो और कड़ाके की धूप या उमस हो, वहां सिर पर सफेद मूरेठा (गमछा) बांधकर जिलाधिकारी का पहुंचना अपने आप में एक बड़ा संदेश है। इस दृश्य को देखकर वहां के ग्रामीणों को पहली बार यह गहरा अहसास हुआ कि इस आपदा और संकट की घड़ी में शासन और प्रशासन उनके साथ मजबूती से खड़ा है।

जमीन पर बैठकर खाया खाना, बच्चों को लगाया गले

एक अधिकारी और जनता के बीच की दूरी को पाटने का काम इस दौरे के दौरान बखूबी देखने को मिला। जिलाधिकारी ने सिर्फ अधिकारियों को निर्देश नहीं दिए, बल्कि पीड़ितों के साथ आत्मीय रिश्ता कायम किया। कभी वे बाढ़ पीड़ित मासूम बच्चों को अपनी गोद में उठाकर दुलारते नजर आए, तो कभी कम्युनिटी किचन में आम ग्रामीणों के साथ जमीन पर पालथी मारकर पंगत में बैठ गए और उनके साथ भोजन किया।

बाढ़ पीड़ितों के साथ इस तरह बैठकर भोजन करने के पीछे एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक संदेश छिपा है। इसका मकसद यह जांचना और दिखाना था कि जो भोजन राहत शिविरों और कम्युनिटी किचन के जरिए आम जनता को परोसा जा रहा है, उसकी गुणवत्ता कैसी है। क्या वह खाने योग्य है भी या नहीं? इस दौरान यदि भोजन की क्वालिटी या व्यवस्था में जरा सी भी कमी नजर आई, तो उन्होंने मौके पर मौजूद अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई और तुरंत सुधार के निर्देश दिए। यह इस बात का प्रमाण है कि वीआईपी कल्चर से दूर यह प्रशासन जनता की वास्तविक तकलीफों को महसूस कर रहा है।

आलोचनाओं के बीच उम्मीद की एक किरण और गूंजी तालियां

यह बात सच है कि हमारे समाज में हर कदम पर आलोचना करने वालों की कोई कमी नहीं होती। कई लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि सिर्फ हवाई चप्पल पहन लेने, सिर पर गमछा बांध लेने या पीड़ितों के साथ जमीन पर बैठकर खाना खा लेने से बाढ़ की विभीषिका या लोगों का दर्द रातों-रात खत्म नहीं हो जाएगा। यह तर्क अपनी जगह सही भी हो सकता है, क्योंकि आपदा का दायरा बहुत बड़ा है और चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।

लेकिन इसके साथ ही इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि आपदा के ऐसे भयावह समय में जब अधिकारी कागजी कुर्सियों को छोड़कर खुद जमीन पर उतरते हैं, तो उनका यह अनूठा अंदाज उन सुदूर और उपेक्षित इलाकों तक पहुंच जाता है जहां आम तौर पर सरकारी मदद पहुंचने में हफ्तों लग जाते हैं। यही कारण है कि जब जिलाधिकारी गोबराही दियारा के बीहड़ और बाढ़ से घिरे इलाके में पहुंचे, तो वहां के त्रस्त ग्रामीणों ने किसी नेता की तरह नहीं, बल्कि अपने ही किसी करीबी की तरह तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया।

त्रासदी के इस स्याह दौर में ग्रामीणों के चेहरों पर आई वह मुस्कान और गूंजती हुई तालियां ही जिला प्रशासन के लिए इस संकट काल में सबसे बड़ा और अनमोल सम्मान है। कटिहार की यह घटना साबित करती है कि यदि नीयत साफ हो और प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो आपदा के पहाड़ जैसे संकट को भी संवेदनाओं के सहारे थोड़ा हल्का किया जा सकता है।

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नसीम अहमद

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नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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