जीविका समूह के ऋण ने संवारा भविष्य, नेशनल हाईवे के किनारे शुरू किया कारोबार
बिहार के किशनगंज जिले के बहादुरगंज प्रखंड की रहने वाली जैनब खातून अपनी कड़ी मेहनत और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक नया स्रोत बन गई हैं। कभी आर्थिक तंगी के चलते छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाली जैनब आज अपनी खुद की दुकान के जरिए आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं। बिहार सरकार की 'जीविका' (बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति) योजना से जुड़ने के बाद उनके जीवन में एक सकारात्मक बदलाव आया है।
जैनब खातून बहादुरगंज प्रखंड की बनगामा पंचायत की निवासी हैं और स्थानीय 'संध्या स्वयं सहायता समूह' तथा 'महक ग्राम संगठन' की सक्रिय सदस्य के रूप में जुड़ी हुई हैं। समूह की बैठकों में नियमित रूप से हिस्सा लेने और अन्य महिलाओं के अनुभवों से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने का बीड़ा उठाया था।
50 हजार के ऋण से खुली स्वरोजगार की राह
एक समय ऐसा था जब जैनब के परिवार के पास आय का कोई निश्चित साधन नहीं था, जिसके कारण रोजमर्रा का घर चलाना भी काफी चुनौतीपूर्ण होता था। इस कठिन समय में उन्होंने जीविका स्वयं सहायता समूह के माध्यम से 50 हजार रुपये का आसान ऋण प्राप्त किया। इस शुरुआती पूंजी का सदुपयोग करते हुए उन्होंने नेशनल हाईवे के समीप चाय-नाश्ते की एक छोटी सी दुकान और साथ में एक जनरल स्टोर की शुरुआत की।
सड़क किनारे स्थित होने और हाईवे पर वाहनों की अच्छी आवाजाही के कारण उनकी दुकान पर ग्राहकों की आवाजाही बढ़ने लगी। इसके अलावा जैनब का मिलनसार स्वभाव और ग्राहकों के प्रति ईमानदारी उनके व्यवसाय की सफलता में अहम साबित हुई। आज उनकी यह दुकान अच्छी तरह चल रही है और इन दोनों व्यवसायों से उन्हें हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक की शुद्ध आमदनी हो रही है, जिससे उनकी सालाना आय अब दो लाख रुपये के आंकड़े को पार कर चुकी है।
बढ़ा सामाजिक मान-सम्मान और पारिवारिक सहभागिता
आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनने के बाद जैनब के जीवन में केवल आमदनी ही नहीं बढ़ी, बल्कि समाज में उनका मान-सम्मान भी काफी बढ़ गया है। उनका कहना है कि जीविका समूह से जुड़ने के बाद उनके आत्मविश्वास में भारी बढ़ोतरी हुई है। अब वे अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा-दीक्षा पर पूरा ध्यान दे पा रही हैं और भविष्य के लिए बचत योजनाओं पर भी काम कर रही हैं। परिवार के आर्थिक मामलों और महत्वपूर्ण निर्णयों में अब उनकी सीधी भागीदारी रहती है।
जैनब खातून अपने बदलाव के सफर को याद करते हुए बताती हैं, “पहले छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था। जीविका समूह से मिले 50 हजार रुपये के ऋण ने मेरी जिंदगी बदल दी। आज खुद की दुकान से हर महीने 20-25 हजार रुपये कमाकर परिवार को बेहतर जीवन दे पा रही हूँ।” उनकी यह सफलता आसपास की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही है।