मराठवाड़ा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के लिए हुए चुनाव में इस बार पिछले चुनावों की तुलना में मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है। संभाग के विभिन्न जिलों से मिले आंकड़ों के अनुसार, इस बार औसत मतदान करीब 59.48% रहा, जबकि वर्ष 2020 में यह लगभग 64.8% था। इस प्रकार पिछले चुनाव की तुलना में इस बार मतदान में करीब पांच प्रतिशत अंकों की कमी आई है। चुनाव मैदान में कुल 41 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिनकी राजनीतिक किस्मत का फैसला 27 अक्टूबर को होने वाली मतगणना के बाद तय होगा।
शुक्रवार को संपन्न हुए इस चुनाव में संभाग के आठ जिलों के मतदाताओं ने हिस्सा लिया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, धाराशिव जिले में सबसे अधिक 62.53% मतदान दर्ज किया गया। इसके अलावा परभणी में 61.81% और हिंगोली में 61.58% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। वहीं दूसरी ओर, छत्रपति संभाजीनगर जिले में सबसे कम 55.73% मतदान रिकॉर्ड किया गया। लातूर जिले में भी मतदान का प्रतिशत कम रहते हुए 56.45% पर दर्ज हुआ। अन्य जिलों की बात करें तो जालना और नांदेड दोनों में समान रूप से 59.81%, जबकि बीड में 59.67% मतदान हुआ। जिलावार आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सभी क्षेत्रों में मतदाताओं की भागीदारी एक समान नहीं रही और कुछ जिलों में यह आंकड़ा साठ प्रतिशत से नीचे रहा।
वर्ष 2020 की तुलना में तुलनात्मक स्थिति
वर्ष 2020 में हुए मराठवाड़ा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के पिछले चुनाव के दौरान कुल 3,73,166 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें से 2,41,908 लोगों ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। उस समय कुल मतदान प्रतिशत लगभग 64.83% दर्ज किया गया था। इस बार औसत मतदान घटकर 59.48% पर आ जाने से राजनीतिक विश्लेषकों और दलों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। हालांकि, केवल कम या ज्यादा मतदान के आधार पर किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार का निश्चित अनुमान लगाना संभव नहीं होता है, क्योंकि अंतिम चुनावी रुख मतदाताओं के वास्तविक रुझान पर निर्भर करता है।
प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ीं, मतगणना पर टिकी नजरें
स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनावों में पढ़े-लिखे मतदाताओं की भूमिका और उनकी भागीदारी को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बार कुल 41 उम्मीदवार चुनावी मैदान में डटे हुए हैं। मतदान प्रतिशत में आई इस गिरावट और अलग-अलग जिलों में रहे भिन्न मतदान रुझानों के बाद सभी राजनीतिक दलों, निर्दलीय उम्मीदवारों और समर्थकों की निगाहें अब पूरी तरह से 27 अक्टूबर को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। मतों की गिनती पूरी होने के बाद ही यह तस्वीर साफ हो पाएगी कि इस घटे हुए मतदान का सीधा लाभ किसे मिला है और किस प्रत्याशी को इसका नुकसान उठाना पड़ा है।