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पश्चिम एशिया में भीषण जंग से उबला क्रूड ऑयल, 100 डॉलर के पार पहुंची कीमतें

पश्चिम एशिया में भीषण जंग से उबला क्रूड ऑयल, 100 डॉलर के पार पहुंची कीमतें

पश्चिम एशिया में सुलग रही जंग की आग अब सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में लेने लगी है। अमेरिका और ईरान के बीच मचे घमासान और सैन्य संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भूचाल आ गया है। इस भूचाल के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें 24 जुलाई के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुकी हैं। इस भारी उछाल ने दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में खलबली मचा दी है, और इसका सबसे बड़ा और सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता दिख रहा है।

कच्चे तेल की कीमतों में अचानक क्यों आया इतना बड़ा उछाल?

हालिया घटनाक्रमों पर गौर करें तो अमेरिका ने ईरान पर एक अमेरिकी युद्धपोत पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला करने का गंभीर आरोप लगाया था। इसके जवाब में अमेरिका ने कार्रवाई करते हुए ईरान के पांच बड़े ऑयल टैंकर्स को निशाना बनाकर तबाह कर दिया। इस आक्रामक अमेरिकी कार्रवाई के बाद संघर्ष और अधिक गहरा गया। ईरान ने भी जवाबी तेवर अपनाते हुए जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य बेस को अपने हमलों का निशाना बनाया।

स्थिति तब और भी ज्यादा खतरनाक हो गई जब ईरान ने फारस की खाड़ी (Persian Gulf) से गुजरने वाले अन्य देशों के जहाजों के लिए भी सीधी चेतावनी जारी कर दी। ईरान का साफ कहना है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों को कभी भी निशाना बनाया जा सकता है, इसलिए चालक दल (Crew Members) के सदस्यों को तुरंत जहाज छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर निकल जाना चाहिए। इस धमकी के बाद मध्य पूर्व से होने वाली कच्चे तेल की सप्लाई पूरी तरह से ठप होने या बाधित होने का गंभीर संकट पैदा हो गया है, जिसने मार्केट में हाहाकार मचा दिया है।

बाजार में कच्चे तेल का ताजा हाल और आंकड़े

कारोबार की शुरुआत के साथ ही ब्रेंट क्रूड ने जबरदस्त तेजी दर्ज की। यह 1.53 डॉलर की उछाल के साथ 99.45 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर खुला और कुछ ही पलों में 100 डॉलर की सीमा को लांघते हुए 100.98 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंचा। भारतीय समयानुसार शाम के वक्त ब्रेंट क्रूड लगभग 2.84 प्रतिशत की तेजी के साथ 100.70 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड कर रहा था।

यही नहीं, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का हाल भी इससे जुदा नहीं रहा। डब्ल्यूटीआई क्रूड 1.56 डॉलर की बढ़त के साथ 94.59 डॉलर पर खुला और देखते ही देखते 95.96 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गया। शाम के सत्र में यह लगभग 3.03 प्रतिशत की जोरदार तेजी के साथ 95.85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता नजर आया।

साप्ताहिक आधार पर पिछले एक सप्ताह के भीतर ही क्रूड ऑयल की कीमतों में 4 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। वहीं, अगर मासिक आंकड़ों की बात करें तो कच्चे तेल के दाम 14 प्रतिशत तक चढ़ चुके हैं। अगर साल 2026 की शुरुआत से अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो जनवरी में जो कच्चा तेल लगभग 62 डॉलर प्रति बैरल पर मिल रहा था, वह अब उछलकर 101 डॉलर के करीब पहुंच चुका है। यानी वर्ष के पहले सवा आठ महीनों में ही क्रूड ऑयल के दामों में 39 डॉलर प्रति बैरल यानी लगभग 64 प्रतिशत की भारी-भरकम तेजी आ चुकी है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा गंभीर असर?

विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में आई यह 64 प्रतिशत की बेकाबू तेजी भारत जैसे बड़े ऑयल इंपोर्टर देश के लिए खतरे की घंटी है। भारत अपनी कुल ऊर्जा और तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। हमारी जरूरत के इस आयातित तेल का एक बहुत बड़ा हिस्सा सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील 'होर्मुज स्ट्रेट' (Strait of Hormuz) के रास्ते भारत पहुंचता है।

मौजूदा अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण इसी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते होने वाली कच्चे तेल की सप्लाई पर सीधा ग्रहण लग गया है। इस रास्ते के बंद होने या बाधित होने के खतरे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम आसमान पर पहुंचा दिए हैं।

आम जनता की जेब पर पड़ेगा सीधा बोझ

वित्तीय मामलों के जानकारों का मानना है कि महंगा कच्चा तेल खरीदने से भारत का कुल आयात बिल (Import Bill) कई गुना बढ़ जाएगा। इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ से निपटने और भारी नुकसान से बचने के लिए देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों के खुदरे मूल्यों में बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। यदि ऐसा होता है, तो इसका सीधा और कड़ा असर आम आदमी की रसोई और बजट पर पड़ेगा, जिससे देश में महंगाई एक बार फिर विकराल रूप ले सकती है।

कच्चे तेल की आग का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहने वाला है:

  • एविएशन सेक्टर: एयर टरबाइन फ्यूल (ATF) के महंगे होने से विमान कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर हवाई यात्रा के किराए में वृद्धि के रूप में यात्रियों पर पड़ेगा।
  • औद्योगिक वस्तुएं: पेट्रोलियम उत्पादों के महंगे होने से प्लास्टिक, पेंट, टायर और कई अन्य निर्माण सामग्री की लागत में भी उछाल आएगा।
  • राजकोषीय घाटा और मुद्रा: लंबे समय तक क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें रहने से भारत का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया भी कमजोर हो सकता है, जिससे देश से विदेशी पूंजी की निकासी (Foreign Capital Outflow) तेज हो सकती है।

सरकार के सामने खड़ी होंगी बड़ी चुनौतियां

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चल रहे इस भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बेलगाम कीमतों ने नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। सरकार को अब सब्सिडी के प्रबंधन, ब्याज दरों (Interest Rates) के निर्धारण और रुपया-डॉलर के एक्सचेंज रेट को संभालने के लिए बेहद कड़े और दूरगामी फैसले लेने पड़ सकते हैं। यदि पश्चिम एशिया का यह सुलगता हुआ संघर्ष जल्द ही शांत नहीं हुआ, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारतीय बाजारों को भी लंबे समय तक इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

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काव्या त्रिपाठी

काव्या त्रिपाठी

Senior Editor

काव्या त्रिपाठी बिजनेस और टेक्नोलॉजी की जटिल दुनिया को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं। वे आर्थिक बदलाव, स्टार्टअप इकोसिस्...

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