चीन के मछुआरों का अनोखा कारनामा: खुद के पैसों से बना डाला पहला प्राइवेट रिसर्च जहाज
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चीन के मछुआरों का अनोखा कारनामा: खुद के पैसों से बना डाला पहला प्राइवेट रिसर्च जहाज

चीन के मछुआरों का अनोखा कारनामा: खुद के पैसों से बना डाला पहला प्राइवेट रिसर्च जहाज

समुद्र की थाह पाना और उसके रहस्यों को दुनिया के सामने लाना हमेशा से बड़े देशों और उनकी सरकारी एजेंसियों का काम माना जाता रहा है। लेकिन, जब सरकारी संसाधनों में कमी आई, तो ड्रैगन यानी चीन के आम नागरिकों ने मोर्चा संभाल लिया। जी हां, चीन में समुद्री रिसर्च के लिए जहाजों की भारी कमी खल रही थी, जिसके समाधान के लिए वहां के आम मछुआरों ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। झेजियांग प्रांत के कुछ साधारण मछुआरों ने मिलकर एक ऐसा प्राइवेट रिसर्च जहाज तैयार कर डाला है, जो न केवल खुले समुद्र बल्कि ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) में भी वैज्ञानिक खोजबीन करने में पूरी तरह सक्षम है।

मछुआरों की अनूठी पहल से बना 'हाईयिंग जियाके'

चीन के इस पहले पूरी तरह से निजी तौर पर फंड किए गए वैज्ञानिक रिसर्च जहाज ने अपने समुद्री ट्रायल (Sea Trials) की शुरुआत कर दी है। इस अनूठे जहाज का नाम 'हाईयिंग जियाके' (Haiying Jiake) रखा गया है। इसका नाम समुद्र के ऊपर उड़ान भरने वाले शिकारी पक्षी समुद्री बाज यानी 'सी ईगल' के नाम पर रखा गया है, जो इसकी फुर्ती और मारक क्षमता को दर्शाता है। पूर्वी चीन के झेजियांग प्रांत के वेनलिंग शहर में इस जहाज ने अपनी पहली सफल परीक्षण यात्रा शुरू कर दी है, जिसे तकनीकी दुनिया में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे बनाने के लिए किसी सरकारी खजाने का इस्तेमाल नहीं किया गया है। वेनलिंग के 37 स्थानीय मछुआरों ने आपस में हाथ मिलाया और क्राउडफंडिंग के जरिए कुल 150 मिलियन युआन यानी भारतीय करेंसी के हिसाब से करीब 2.14 बिलियन रुपये (लगभग 22.4 मिलियन डॉलर) की भारी-भरकम राशि जुटाई। साल की शुरुआत में जब इस प्रोजेक्ट का बीज बोया गया था, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि यह साधारण मछुआरों का समूह एक दिन इतिहास रच देगा।

कैसे शुरू हुई इस मेगा प्रोजेक्ट की कहानी?

इस अनोखी गाथा की नींव साल के शुरुआती महीनों में पड़ी थी। वेनलिंग के एक स्थानीय मछुआरे और एक शिपिंग कंपनी के प्रमुख काई युनजी (Cai Yunji) को जब यह बात महसूस हुई कि देश में वैज्ञानिक रिसर्च जहाजों की भारी किल्लत है, और यह कमी गहरे समुद्र के अंदर होने वाली खोजों में बड़ी बाधा बन रही है, तो उन्होंने खुद कुछ करने की ठानी। उन्होंने अपने इस विजन को अपने साथियों के सामने रखा।

काई युनजी के इस आह्वान पर वेनलिंग के 36 अन्य स्थानीय मछुआरे तुरंत आगे आए। सभी ने मिलकर अपने निजी संसाधन और पूंजी एक जगह झोंक दी। इस तरह से देखते ही देखते करोड़ों रुपये का फंड इकट्ठा हो गया। स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ यह प्रयास अब एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है, क्योंकि दुनिया भर के एक्सपर्ट्स इस बात से हैरान हैं कि मछुआरों का एक छोटा समूह इतने बड़े वैज्ञानिक इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे खड़ा कर सकता है।

अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है 'हाईयिंग जियाके'

भले ही इस जहाज को मछुआरों ने फंड किया हो, लेकिन इसके निर्माण और डिजाइन में अंतरराष्ट्रीय मानकों का पूरा ख्याल रखा गया है। 'हाईयिंग जियाके' के तकनीकी आंकड़े इसकी विशालता और ताकत की गवाही देते हैं:

  • लंबाई: यह जहाज 82 मीटर लंबा है।
  • चौड़ाई: इसकी चौड़ाई 15.2 मीटर है।
  • वजन: पूरी क्षमता के साथ इस जहाज का कुल वजन 3,500 मीट्रिक टन तक पहुंच जाता है।
  • गति और रेंज: जहाज की अधिकतम रफ्तार 14 नॉट है और यह एक बार में 10,000 नॉटिकल मील की लंबी दूरी तय करने की क्षमता रखता है।
  • समुद्र में टिकने की क्षमता: यह जहाज बिना किसी रुकावट के 60 दिनों से अधिक समय तक खुले समुद्र में गुजार सकता है।

इस जहाज की सबसे बड़ी यूनीक खासियत इसका ध्रुवीय इलाकों (Polar Regions) में काम करने की क्षमता है। इसे मुख्य रूप से खुले समुद्र और बर्फ से ढके ठंडे इलाकों में समुद्री रिसर्च के लिए तैयार किया गया है। यह पानी पर जमी पतली बर्फ को भी आसानी से चीरते हुए आगे निकल सकता है, जो इसे बेहद खास बनाता है।

निर्माण से लेकर समुद्र में उतरने तक का सफर

इस महत्वाकांक्षी जहाज का निर्माण कार्य पिछले साल मार्च में शुरू हुआ था। मरीन इंजीनियरिंग की तमाम आधुनिक चुनौतियों को पार करते हुए कड़ी मेहनत के बाद, इस साल मई महीने में इस विशालकाय जहाज को पहली बार पानी में उतारा गया। वर्तमान में इसके सभी सिस्टम्स का कड़ा परीक्षण किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसके सभी समुद्री परीक्षण सफल रहते हैं, तो इसी साल अक्टूबर के मध्य तक इसे आधिकारिक रूप से संचालन प्रमाणपत्र (Operational Certificate) मिल जाएगा। सर्टिफिकेट मिलते ही यह पूरी तरह से कमर्शियल और रिसर्च ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाएगा।

रिसर्च के साथ-साथ कमाई का भी जरिया

'हाईयिंग जियाके' केवल वैज्ञानिक खोजों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक बिजनेस मॉडल के रूप में भी देखा जा रहा है। परीक्षण पूरे होने के बाद इसे देश-विदेश के विश्वविद्यालयों, मरीन साइंस यूनिवर्सिटीज और प्रमुख रिसर्च संस्थानों को किराए पर उपलब्ध कराया जाएगा।

इस जहाज का मुख्य उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जाएगा:

  • समुद्री संसाधनों का व्यापक सर्वे करना।
  • समुद्र की गहराई का सटीक नक्शा (Mapping) तैयार करना।
  • समुद्री जीवों और उनकी पारिस्थितिकी (Marine Ecosystem) का गहराई से अध्ययन करना।
  • ऑफ़शोर विंड फार्म (Offshore Wind Farms) के निर्माण में मदद करना।

समुद्र के भीतर चलने वाले अन्य भारी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स को तकनीकी सहायता देना।यह पहल साबित करती है कि जब आम लोग किसी बड़ी समस्या के समाधान के लिए एकजुट होते हैं, तो वे बड़े-बड़े सरकारी तंत्रों को भी एक नई दिशा दिखा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह जहाज समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में क्या नए खुलासे करता है, इस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor (विदेश खबरें)

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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