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जामिया मिलिया इस्लामिया में 20 साल बाद छात्र संघ चुनाव की जगी उम्मीद

जामिया मिलिया इस्लामिया में 20 साल बाद छात्र संघ चुनाव की जगी उम्मीद

जामिया मिलिया इस्लामिया में दो दशकों से बंद पड़े छात्र संघ चुनावों की बहाली को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक हलचल और छात्रों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। वर्ष 2006 में तत्कालीन छात्र संघ को भंग किए जाने के बाद से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में लगातार बीस वर्षों तक छात्र चुनावों पर रोक लगी रही है। हाल ही में छात्रों के तीखे विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने नया संविधान तैयार होने के पंद्रह दिनों के भीतर चुनाव आयोजित करने का आश्वासन दिया है, जिससे लंबे समय से चली आ रही इस मांग को एक नया मोड़ मिला है।

दो दशकों का लंबा अंतराल और छात्र संघर्ष

नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर छात्र लंबे समय से संघर्षरत रहे हैं। वर्ष 2006 के बाद से विश्वविद्यालय परिसर में औपचारिक छात्र संघ का अस्तित्व समाप्त हो गया था, जिससे विद्यार्थियों को अपनी अकादमिक और प्रशासनिक समस्याओं को प्रभावी ढंग से रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता रहा है। हाल ही के दिनों में इस मांग को लेकर छात्रों का असंतोष फूट पड़ा और उन्होंने छात्र संघ की बहाली के लिए भूख हड़ताल तथा मुख्य द्वार पर जोरदार विरोध प्रदर्शन का मार्ग अपनाया। इस दबाव के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्थिति को संभालते हुए ठोस कदम उठाने की शुरुआत की है।

प्रशासनिक कदम और नई समितियों का गठन

छात्रों के कड़े रुख और प्रदर्शनों को देखते हुए जामिया प्रशासन ने 21 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए छात्र संघ का नया संविधान तैयार करने के वास्ते एक विशेष समिति का गठन किया। इसके बाद 26 अक्टूबर को विश्वविद्यालय की ओर से घोषणा की गई कि जैसे ही यह नया संविधान पूरी तरह तैयार होकर स्वीकृत हो जाएगा, उसके ठीक पंद्रह दिनों के भीतर चुनाव प्रक्रिया संपन्न करा ली जाएगी। प्रशासनिक स्तर पर इसे एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, क्योंकि पिछले बीस वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है जब चुनाव कराने को लेकर कोई औपचारिक समयसीमा सामने आई है।

छात्रों की चिंताएं और पक्की तारीख का इंतजार

भले ही प्रशासन ने नया संविधान बनने के बाद चुनाव कराने का भरोसा दे दिया है, लेकिन आम छात्रों और छात्र नेताओं के मन में अभी भी कई आशंकाएं बनी हुई हैं। छात्रों की मुख्य चिंता यह है कि इस नए संविधान को अंतिम रूप से प्रशासनिक और कानूनी मंजूरी मिलने में कितना समय लगेगा और चुनाव की कोई निश्चित व पक्की तारीख कब घोषित की जाएगी। इसी असमंजस के चलते हाल ही में परिसर में तनाव का माहौल भी देखा गया, जिसके परिणामस्वरूप एहतियातन कक्षाओं को कुछ समय के लिए ऑनलाइन माध्यम पर चलाने का भी निर्णय लिया गया। छात्र स्पष्ट और समयबद्ध कार्यक्रम की मांग कर रहे हैं ताकि दो दशक के अंतराल के बाद चुनाव प्रक्रिया बिना किसी अनिश्चितता के पूरी हो सके।

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नसीम अहमद

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नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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