देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर (SIR) से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को लेकर दाखिल की गई महत्वपूर्ण याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में कल यानी मंगलवार को सुनवाई होने जा रही है। इस मामले ने देश के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व और उसकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाओं में क्या की गई हैं मुख्य मांगें?
शीर्ष अदालत में दाखिल की गई इन याचिकाओं में कई ऐसे कड़े कदम उठाने की मांग की गई है, जो भारतीय चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व हैं। याचिकाकर्ताओं का मुख्य जोर इस बात पर है कि चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए।
- असंवैधानिक घोषित करने की मांग: एसआईआर से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों, दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को पूरी तरह से असंवैधानिक घोषित करने की अपील की गई है।
- कानूनी कार्रवाई की मांग: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने की बात कही गई है।
- एसआईटी जांच और फॉरेंसिक ऑडिट: एसआईआर प्रक्रिया के दौरान लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया है। इसकी निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एसआईटी (SIT) या न्यायिक जांच और ECINet-ERONet के फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की गई है।
- सामूहिक शक्ति का आधार: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि उन्होंने आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल किस कानूनी आधार के तहत किया है।
- मूल रिकॉर्ड तलब करने की अपील: चुनाव आयोग (ECI) के मूल रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग और बैठकों के मिनट्स ऑफ मीटिंग को अदालत में पेश करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
- कार्य करने पर रोक: सबसे अहम मांग यह है कि जब तक इस मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने से रोका जाए।
13 करोड़ नाम हटाने का गंभीर विवाद
इस पूरे विवाद का केंद्र बिंदु वह आंकड़ा है जिसके तहत एसआईआर प्रक्रिया के दौरान देश भर से करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर नामों का हटना किसी साधारण तकनीकी गड़बड़ी का परिणाम नहीं हो सकता, बल्कि इसके पीछे सोची-समझी नीति या सॉफ्टवेयर में किए गए बदलाव हो सकते हैं। इस गंभीर आरोप के बाद से लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर जनता के बीच भी बहस छिड़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत इस मामले में कड़े रुख अपनाती है, तो यह देश की चुनावी व्यवस्था में सुधार के लिहाज से एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था के मुखिया पर इस तरह के आरोप लगना और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर सुनवाई करना लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती और न्यायपालिका की सक्रियता दोनों को दर्शाता है।
कल की सुनवाई पर टिकी पूरे देश की नजरें
कल होने वाली सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत क्या रुख अपनाती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। क्या अदालत इन याचिकाओं पर तुरंत कोई अंतरिम आदेश जारी करती है या चुनाव आयोग को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया जाता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह मामला आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक नया अध्याय जोड़ सकता है।
फिलहाल, कल सुबह जब अदालत बैठेगी, तो देश भर के राजनीतिक दलों, कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों की नजरें सुप्रीम कोर्ट के courtroom पर होंगी, जहां इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई की जाएगी।