जब हौसले बुलंद हों और इरादे चट्टान जैसे मजबूत, तो रास्ते की हर रुकावट अपने आप धूल बन जाती है। जापान में इन दिनों चल रहे एशियाई खेलों (Asian Games) के महाकुंभ से एक ऐसी ही प्रेरणादायक और दिल को छू लेने वाली कहानी सामने आई है, जिसने पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। हरियाणा के एक छोटे से गांव सिवानका के रहने वाले युवा तीरंदाज कुशल दलाल ने पुरुष कंपाउंड टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक (Gold Medal) पर अपना कब्जा जमा लिया है। खास बात यह है कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने जिन कठिनाइयों का सामना किया, वे किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं।
फाइनल में चीन को दी मात, रचा इतिहास
एशियाई खेलों के बेहद रोमांचक और सांस रोक देने वाले फाइनल मुकाबले में भारत के कुशल दलाल, साहिल जाधव और गणेश मणि रत्नम थिरुमुरु की तिकड़ी ने शानदार प्रदर्शन किया। इन्होंने चीन की मजबूत टीम को बेहद करीबी अंतर से मात देते हुए पोडियम पर सबसे ऊपर जगह बनाई और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। जैसे ही यह खबर देश में पहुंची, हरियाणा के गोहाना के पास स्थित उनके पैतृक गांव सिवानका में दीवाली जैसा माहौल बन गया। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाया और एक-दूसरे को मिठाई खिलाई।
कोरोना काल में जब ठहर गई थी दुनिया, तब खेत में गड़े तीर
हर खिलाड़ी के जीवन में एक ऐसा दौर आता है, जो उसकी परीक्षा लेता है। कुशल दलाल के लिए वह दौर साल 2020 का कोरोना काल था। मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन के चलते खेल परिसर, स्टेडियम और ट्रेनिंग सेंटर पूरी तरह बंद कर दिए गए थे। खेल जगत मानों थम सा गया था। ऐसे में एक उभरते हुए तीरंदाज के लिए अभ्यास जारी रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।
लेकिन कुशल के माता-पिता ने हार नहीं मानी। जब स्टेडियम के दरवाजे बंद हुए, तो परिवार ने अपने खेत के एक हिस्से को ही आर्चरी रेंज में तब्दील कर दिया। मिट्टी की उस जमीन पर खड़े होकर कुशल ने घंटों पसीना बहाया। खेत में बनाए गए उसी अस्थायी अभ्यास केंद्र पर उन्होंने अपने निशाने को पैना किया। सीमित संसाधनों के बीच बिना रुके, बिना थके की गई वह मेहनत आज रंग लाई है और खेत की मिट्टी से निकला यह हीरा एशियाई खेलों का चैंपियन बन गया है।
बॉक्सर बनना था, लेकिन अहिंसा के रास्ते ने बदली राह
कुशल का खेल का सफर बचपन में कुश्ती से शुरू हुआ था। सातवीं कक्षा में जब उनकी मां गीता दलाल उन्हें खेल की ट्रेनिंग के लिए रोहतक लेकर गईं, तो उनकी मंशा बेटे को बॉक्सिंग का प्रशिक्षण दिलाने की थी। लेकिन कुशल का स्वभाव और सोच बिल्कुल अलग थी। स्टेडियम में कोच और माहौल को देखने के बाद मासूम कुशल ने अपनी मां से कहा था कि वह किसी दूसरे इंसान पर अपने हाथ से प्रहार नहीं कर सकता।
बॉक्सिंग से कदम पीछे खींचने के बाद उनकी नजर तीरंदाजी पर पड़ी। तीर-कमान के इस खेल ने उन्हें ऐसा आकर्षित किया कि उन्होंने इसे ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। रोहतक के राजीव गांधी स्टेडियम में कोच संजय सुहाग के मार्गदर्शन में उन्होंने इस कला की बारीकियां सीखीं।
माता-पिता का त्याग और अटूट संघर्ष
एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी तैयार करने में परिवार ने जिस त्याग का परिचय दिया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल है। कुशल की मां गीता दलाल, जो हरियाणा राज्य कृषि विपणन बोर्ड में खरखौदा में लेखाकार के पद पर कार्यरत हैं, अपने बेटे की पढ़ाई और ट्रेनिंग के लिए रोहतक में साथ रहीं। वह नौकरी और मां की जिम्मेदारी के बीच लगातार संतुलन बनाती रहीं।
दूसरी ओर, उनके पिता संदीप दलाल ने गांव सिवानका में रहकर पुश्तैनी खेती की पूरी जिम्मेदारी संभाली। परिवार भले ही दो अलग-अलग जगहों पर बंटा हुआ था, लेकिन सबका दिल और सपना एक ही था—कुशल को देश के लिए खेलना और जीतना देखना। पिता अक्सर रोहतक जाकर बेटे की पीठ थपथपाते और उसका हौसला बढ़ाते थे।
2018 के पहले मेडल से लेकर ग्लोबल मंच तक का सफर
कुशल दलाल की सफलता रातों-रात नहीं मिली। इसके पीछे वर्षों की तपस्या छिपी है। उन्होंने साल 2018 में आंध्र प्रदेश में आयोजित अंडर-14 नेशनल प्रतियोगिता में अपने करियर का पहला पदक जीता था। इसके बाद उनका चयन प्रतिष्ठित 'खेलो इंडिया' योजना के तहत हुआ। वर्ष 2021 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वह भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) सेंटर से जुड़ गए।
- विश्व युवा चैंपियनशिप (2021): कैडेट वर्ग की पुरुष टीम और मिश्रित टीम स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय फलक पर अपनी धाक जमाई।
- एशिया कप और विश्व खेल: विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में निरंतर पदक अपने नाम किए।
- विश्व रिकॉर्ड: बैंकॉक में हुए एशिया कप के अंडर-21 वर्ग में उनके नाम विश्व रिकॉर्ड भी दर्ज रहा है।
दादी की आंखें हुईं नम, अब अगला लक्ष्य ओलंपिक
पोते के गले में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक देखकर परिवार की बुजुर्गों की आंखें खुशी से छलक उठीं। उनकी दादी ओमी और रिश्ते की दादी रोशनी देवी ने अपने पोते को आशीर्वाद देते हुए कहा कि उसने पूरे देश का सिर ऊंचा कर दिया है। परिवार का कहना है कि यह तो अभी एक पड़ाव है, असली मंजिल देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतना है और कुशल इस दिशा में पूरी मेहनत से आगे बढ़ रहा है।
कुशल दलाल की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, परिवार का अटूट साथ हो और कड़ी मेहनत करने का जज्बा हो, तो अभाव की जमीन पर भी सफलता के फूल खिल सकते हैं। आज यह युवा देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।