नौकरशाही की दुनिया में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जो प्रशासनिक व्यवस्था की साख पर बड़े सवाल खड़े कर देते हैं। ताजा मामला हरियाणा से जुड़ा है, जहां भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक वरिष्ठ अधिकारी के फैसलों ने राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आर्थिक तौर पर हिलाकर रख दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दाखिल किए गए आरोपपत्र (Chargesheet) में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिनसे यह साफ होता है कि किस तरह नियमों को ताक पर रखकर एक खास बैंक को फायदा पहुंचाया गया। इस पूरे खेल में हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) को कुल 1,59,85,95,089 रुपये का भारी-भरकम नुकसान उठाना पड़ा है।
फंड निवेश में नियमों की अनदेखी और वित्तीय अनियमितताएं
यह पूरा मामला बोर्ड के पास मौजूद भारी-भरकम फंड को विभिन्न बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में निवेश करने से जुड़ा हुआ है। तत्कालीन सदस्य सचिव के रूप में कार्य कर रहे आईएएस प्रदीप कुमार डागर के कार्यकाल के दौरान लिए गए निर्णयों की फाइलों को जब खंगाला गया, तो गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं। सीबीआई की जांच रिपोर्ट बताती है कि निवेश के अलग-अलग चरणों में नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं और पारदर्शिता के दाوों को दरकिनार कर दिया गया।
दस्तावेजों से यह बात सामने आई है कि आईएएस अधिकारी ने महज औपचारिकता पूरी करने के बजाय खुद ही तुलनात्मक रेट चार्ट (Comparative Rate Charts) तैयार किए थे। इन चार्ट्स को तैयार करने के पीछे क्या मंशा थी, यह सीबीआई की चार्जशीट के बाद अब स्पष्ट हो चुका है। इन तरकीबों का मुख्य उद्देश्य एक चुनिंदा निजी बैंक, यानी आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) को ज्यादा से ज्यादा निवेश हासिल करने का अवसर उपलब्ध कराना था।
वित्त विभाग के नियमों और 50 करोड़ की सीमा का उल्लंघन
किसी भी सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थान के वित्त प्रबंधन के लिए सरकार के स्पष्ट और कड़े निर्देश होते हैं। हरियाणा सरकार के वित्त विभाग द्वारा 12 जुलाई को जारी किए गए दिशा-निर्देशों में पहली बार यह साफ तौर पर तय किया गया था कि पैनल में शामिल किसी भी एक बैंक में 50 करोड़ रुपये से अधिक की राशि निवेश नहीं की जाएगी। यह नियम इसलिए बनाया गया था ताकि जोखिम को बांटा जा सके और किसी एक वित्तीय संस्थान पर निर्भरता न रहे।
जांच में यह बात भी सामने आई है कि आईएएस प्रदीप डागर ने निवेश के बिल्कुल शुरुआती चरण में ही इस नियम और सीमा को बाकायदा नोट किया था। उन्होंने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में 50 करोड़ रुपये लगाने की सिफारिश भी इसी शर्त के दायरे में की थी। इससे यह साबित होता है कि उन्हें बैंक की निर्धारित सीमा की पूरी और स्पष्ट जानकारी थी। इसके बावजूद, बाद के चरणों में इसी सीमा को बार-बार और बड़े पैमाने पर लांघा गया, जिससे बोर्ड की वित्तीय सुरक्षा खतरे में पड़ गई।
ब्याज दरों से छेड़छाड़ और जना स्मॉल फाइनेंस बैंक की अनदेखी
सीबीआई के आरोपपत्र में मार्च के निवेश चरण को बेहद संदिग्ध और महत्वपूर्ण माना गया है। इस दौरान वित्तीय पारदर्शिता के नियमों की किस हद तक अनदेखी की गई, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक अन्य बैंक द्वारा दी गई बेहतर ब्याज दर को दस्तावेजों में कम करके दिखाया गया।
- जना स्मॉल फाइनेंस बैंक की पेशकश: इस बैंक ने 3 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि पर 8.45 प्रतिशत की आकर्षक ब्याज दर देने की पेशकश की थी।
- चार्ट में फेरबदल: हालांकि, आईएएस प्रदीप डागर द्वारा तैयार किए गए तुलनात्मक चार्ट में इस दर को 8.45 प्रतिशत के बजाय घटाकर 8.25 प्रतिशत दर्शा दिया गया।
- नुकसान और भाई-भतीजावाद का अंदेशा: यदि सही और वास्तविक दर (8.45%) को रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता, तो जना स्मॉल फाइनेंस बैंक सबसे ऊंची दर देने वाला बैंक साबित होता। ऐसे में नियमों के तहत आईडीएफसी फर्स्ट बैंक पर विचार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इसके बावजूद, नियमों को मोड़ते हुए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में लगभग 17.90 करोड़ रुपये निवेश करने की संस्तुति दे दी गई।
तय सीमा पार होने के बाद भी धड़ल्ले से निवेश
मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। जुलाई के एक अन्य निवेश चरण में वित्तीय अनुशासनहीनता की एक और दास्तां सामने आई। आरोपपत्र के मुताबिक, आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की तरफ से 25 जून की एक ऐसी कोटेशन पर विचार किया गया, जिस पर बैंक के किसी भी अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर तक मौजूद नहीं थे। बिना हस्ताक्षर के कागजातों के आधार पर सरकारी धन को दांव पर लगा देना अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक सवाल है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी समयावधि में इंडसइंड बैंक (IndusInd Bank) ने भी ठीक उतनी ही यानी 7.10 प्रतिशत की समान ब्याज दर की पेशकश की थी। नियमों के मुताबिक, जब दो बैंक समान ब्याज दर ऑफर कर रहे हों, तो निवेश की जाने वाली रकम को दोनों बैंकों में बराबर-बराबर बांटा जाना चाहिए। लेकिन इस नियम को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया और लगभग 37.78 करोड़ रुपये अकेले आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में झोंक दिए गए। इस एक फैसले के बाद उस बैंक में कुल निवेश का आंकड़ा बढ़कर 105.68 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो तय सीमा से बहुत ज्यादा था।
बचत खाते और एफडी पुनर्निवेश पर भी खड़े हुए सवाल
अक्टूबर के दौरान बोर्ड के फंड के प्रबंधन में एक और अजीबोगरीब निर्णय लिया गया। बोर्ड की 8 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के सामान्य बचत खाते (Savings Account) में 7.25 प्रतिशत की दर पर रखने की सिफारिश की गई। जबकि उस दौरान बाजार में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर मिलने वाली सबसे ऊंची वास्तविक दर 7.02 प्रतिशत थी। बचत खाते में इस तरह से पैसे रखना और उस पर दिए गए निर्णय जांच एजेंसियों के राडार पर आ गए।
इसके अलावा, हरको बैंक (Harco Bank) में पहले से मौजूद 140.87 करोड़ रुपये की दो बड़ी एफडी को बिना किसी ठोस या वाजिब कारण के रिन्यू यानी पुनर्निवेशित नहीं किया गया। समय पर एफडी का पुनर्निवेश न होने के कारण बोर्ड को ब्याज के रूप में भारी वित्तीय घाटा उठाना पड़ा। इन सभी प्राथमिक और द्वितीयक अनियमितताओं को जोड़कर कुल नुकसान का आंकड़ा 159.85 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा, जिसमें अकेले ब्याज के नुकसान के रूप में 43,80,962 रुपये शामिल हैं।
प्रशासनिक हलकों में मचा हड़कंप
इस बहुचर्चित मामले में केंद्रीय जांच एजेंसी द्वारा चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद हरियाणा के प्रशासनिक गलियारों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बोर्डों के फंड्स के प्रबंधन में इस तरह की मनमानी और पारदर्शिता की कमी भविष्य के लिए एक बड़ा सबक है। यह मामला यह भी सिखाता है कि किस प्रकार व्यक्तिगत निर्णय और नियमों की अनदेखी से राज्य के खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान और कौन-कौन से नए तथ्य सामने आते हैं और इस वित्तीय सेंधमारी में शामिल अन्य पक्षों पर किस तरह की कानूनी कार्रवाई की जाती है।