वैश्विक कूटनीति और व्यापार के गलियारों में इन दिनों एक बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि क्या दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौता पटरी से उतर रहा है?
इस बीच भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर नए सिरे से विचार करने पर मजबूर कर दिया है।
ट्रेड डील पर वित्त मंत्री का कड़ा रुख
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत और अमेरिका के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) या ट्रेड डील को लेकर बातचीत अब एक ऐसे नाजुक मोड़ पर आ गई है, जहां से किसी भी पक्ष के लिए नई रियायतें देना या स्वीकार करना बेहद कठिन होता जा रहा है।
उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही बैठकों और वार्ताओं के बावजूद कुछ बुनियादी मुद्दों पर सहमति बन पाना लगभग असंभव सा प्रतीत हो रहा है।
किन मुद्दों पर फंसा है पेंच?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक मतभेदों की फेरहिस्ट काफी लंबी है, लेकिन कुछ अहम बिंदु इस डील के रास्ते में सबसे बड़े रोड़े बने हुए हैं:
- टैरिफ और आयात शुल्क: अमेरिका लगातार भारतीय उत्पादों पर शुल्क कम करने और अपने कृषि तथा डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार तक आसान पहुंच की मांग कर रहा है।
- घरेलू उद्योगों का संरक्षण: भारत सरकार अपने छोटे किसानों, स्थानीय उद्योगों और डेयरी सेक्टर के हितों से समझौता करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है।
- बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR): फार्मा सेक्टर और पेटेंट के नियमों को लेकर दोनों देशों के बीच वैचारिक और कानूनी स्तर पर लंबे समय से मतभेद चले आ रहे हैं।
- बाजार पहुंच (Market Access): अमेरिका अपने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए भारतीय बाजार में और अधिक रियायतें चाहता है, जबकि भारत संतुलित और पारस्परिक लाभ आधारित समझौते पर जोर दे रहा है।
रियायतों का दौर हुआ समाप्त
वित्त मंत्री ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि बातचीत अब एक ऐसे पड़ाव पर पहुंच चुकी है, जहां दोनों ही देश अपने राष्ट्रीय हितों से आगे बढ़कर झुकने की स्थिति में नहीं हैं।
अमेरिका की अपनी घरेलू राजनीतिक और आर्थिक मजबूरियां हैं, तो वहीं भारत के पास भी अपनी एक बड़ी आबादी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा का दायित्व है।
विशेषज्ञों की क्या है राय?
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयान कूटनीतिक वार्ताओं का एक सामान्य हिस्सा होते हैं, जहां दबाव की राजनीति (Bargaining Tactic) का इस्तेमाल किया जाता है।
हालांकि, यह भी सच है कि दोनों देशों के व्यापारिक प्रतिनिधि अब अपनी सीमाओं को भली-भांति समझ चुके हैं। यदि अमेरिका कोई बड़ी और लचीली पहल नहीं करता है, तो निकट भविष्य में किसी बड़े ट्रेड समझौते की उम्मीद करना बेमानी होगा。
आगे की राह क्या होगी?
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह साफ है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापक ट्रेड डील शायद तुरंत संभव न हो पाए। इसके बजाय, दोनों देश छोटे-छोटे और लक्षित सेक्टर-वार समझौतों (Sector-specific agreements) पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं ताकि दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को बिना किसी बड़े झटके के लाभ मिल सके।
बहरहाल, वित्त मंत्री का यह बयान इस बात का पुख्ता सबूत है कि भारत अपने आर्थिक हितों की रक्षा के मामले में किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।