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एन्क्रिप्टेड ऐप और VPN के इस्तेमाल मात्र से निवारक हिरासत नहीं: J&K हाईकोर्ट

एन्क्रिप्टेड ऐप और VPN के इस्तेमाल मात्र से निवारक हिरासत नहीं: J&K हाईकोर्ट
अपडेटेड: Wed, 04 Nov 2026 06:58 AM
📌 बड़ी बातें (Key Highlights)

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जन सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत पुलवामा के एक युवक की हिरासत रद्द करते हुए कहा कि एन्क्रिप्टेड ऐप और वीपीएन का उपयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने का पर्याप्त आधार नहीं है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल एन्क्रिप्टेड एप्लीकेशन या वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) का उपयोग करने और संदिग्ध व्यक्तियों के संपर्क में रहने के आधार पर किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

न्यायालय ने पुलवामा के 26 वर्षीय एजाज अहमद सेह के खिलाफ जन सुरक्षा अधिनियम (PSA) के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति वसीम सादिक नर्गल की पीठ ने स्पष्ट किया कि बिना पुख्ता विवरण और सहायक सामग्री के केवल ऐसी धारणाओं के आधार पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता।

पुलिस डोजियर और लगाए गए आरोप

पुलवामा निवासी एजाज अहमद सेह को 28 जुलाई 2025 को एक पुलिस डोजियर के आधार पर हिरासत में लिया गया था। पुलिस ने आरोप लगाया था कि वह टेलीफोन और सुरक्षित वीपीएन के जरिए एक्सेस किए जाने वाले एन्क्रिप्टेड एप्लीकेशन 'जैंगी' के माध्यम से पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के संचालकों के संपर्क में था।

डोजियर में यह भी आरोप लगाया गया था कि वह ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) के रूप में काम कर रहा था और उसने सक्रिय आतंकवादियों को भोजन, आश्रय, कपड़े, परिवहन के साथ-साथ सुरक्षा बलों की गतिविधियों की जानकारी मुहैया कराई। जिन आतंकवादियों के संपर्क में होने का दावा किया गया उनमें राइजपोरा पुलवामा के काचीपोरा निवासी हारिस नजीर और जैश कमांडर आशिक अहमद नेंगरू शामिल हैं। आशिक नेंगरू को 2024 में पुलवामा की एनआईए अदालत द्वारा व्यक्तिगत आतंकवादी घोषित किया जा चुका है।

अदालत की टिप्पणियां और कानूनी प्रक्रिया

30 अक्टूबर को दिए गए अपने आदेश में न्यायमूर्ति नर्गल ने कहा कि यदि ये आरोप ठोस सामग्री से समर्थित हों तो निस्संदेह गंभीर हैं और कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की मांग करते हैं। हालांकि, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि हिरासत के आधार के रूप में पेश किए गए दस्तावेजों में कथित संवाद या गतिविधियों का कोई पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया था।

आदेश में इस बात पर भी गौर किया गया कि कथित बातचीत की विशिष्ट तिथियों या सूचना की प्रकृति और सार का कोई स्पष्ट संकेत नहीं था। अदालत ने कहा कि यदि जांच एजेंसी के पास यह दिखाने वाली सामग्री थी कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ने आतंकवादी गतिविधियों के समन्वय के लिए इलेक्ट्रॉनिक संचार का उपयोग किया था, तो आपराधिक कानून के तहत इसकी जांच और कार्रवाई की जा सकती थी।

निवारक हिरासत और दंडात्मक कार्रवाई में अंतर

न्यायमूर्ति नर्गल ने रेखांकित किया कि निवारक हिरासत एक एहतियाती उपाय है और यह सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर यह एक असाधारण अतिक्रमण है, इसलिए इसका प्रयोग संयम से और केवल संवैधानिक तथा विधिक सुरक्षा उपायों के कड़े पालन के साथ किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को राज्य की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल होने से रोकना है, न कि उसे पहले से किए गए कृत्यों के लिए दंडित करना।

अदालत ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा हिरासत के आधार तैयार करने के तरीके पर भी सवाल उठाया और कहा कि यह प्रशासनिक प्राधिकारी द्वारा स्वतंत्र रूप से मन के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पुलिस डोजियर और हिरासत के आधारों की तुलना से यह संकेत मिलता है कि प्रायोजक एजेंसी द्वारा पेश किए गए आरोपों को यांत्रिक रूप से दोहराया गया था। इसके साथ ही अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि एजाज अहमद सेह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहाई दी जाए।

पूर्व के फैसलों का संदर्भ

यह पहला मौका नहीं है जब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने बिना उचित सोचे-समझे पीएसए के तहत हिरासत आदेश जारी करने पर जिला प्रशासन को फटकार लगाई है। गत 15 अक्टूबर को न्यायमूर्ति नर्गल ने श्रीनगर के जिला मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि जुबैर अमीन बंगरू के खिलाफ निवारक आदेश किस प्रकार लापरवाही से जारी किया गया था।

इसके अलावा 3 अक्टूबर को न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल ने शोपिया के मसूद अहमद शाह की पीएसए हिरासत को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि उनके खिलाफ राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोप अस्पष्ट थे। वहीं 16 जुलाई को न्यायमूर्ति राहुल भारती ने कुपवाड़ा के एक युवक की निवारक हिरासत को 'अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट दुरुपयोग' करार देते हुए खारिज कर दिया था, क्योंकि प्रशासन ने उस एफआईआर पर भरोसा किया था जिसमें वह 2016 में ही बरी हो चुका था।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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