बिहार में बाढ़ नियंत्रण और विकास को गति देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच नदियों की गाद से राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का समझौता हुआ है।
बिहार में नदियों की गाद से अब राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार और बिहार सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिससे राज्य में बाढ़ प्रबंधन और बुनियादी ढांचा विकास को एक नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है।
बिहार में हर साल बाढ़ की समस्या से जूझने वाले लोगों के लिए नदियों की गाद अब केवल परेशानी का सबब नहीं, बल्कि विकास का एक नया संसाधन बनने जा रही है। वर्षों से लंबित गाद प्रबंधन की मांग को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने नदियों व जलस्रोतों से वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने और उसका उपयोग सड़क निर्माण में करने का निर्णय लिया है। दिल्ली में मंगलवार को केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और बिहार सरकार के बीच इस संबंध में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने की पहल की सराहना
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस समझौते को बिहार के जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण की दिशा में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण पहल बताया है। उन्होंने इस मांग को लंबे समय से प्रमुखता से उठाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बुधवार को मुलाकात भी की। मुख्यमंत्री चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नीतीश कुमार लगातार गाद प्रबंधन की जरूरत पर बल देते रहे हैं और अब केंद्र के सहयोग से इस दिशा में ठोस धरातलीय शुरुआत हो चुकी है.
परियोजनाओं का विवरण और गाद का उपयोग
इस समझौते के तहत तय की गई कार्ययोजना के अनुसार, राज्य में चल रही 16 निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में लगभग 243 लाख घनमीटर उपयुक्त गाद का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा, भविष्य की 27 प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए करीब 835 लाख घनमीटर गाद के इस्तेमाल की व्यापक योजना बनाई गई है। हालांकि, आने वाली नई परियोजनाओं में इसका उपयोग पूरी तरह से तकनीकी उपयुक्तता और जरूरी वैधानिक मंजूरियों पर निर्भर करेगा।
बाढ़ नियंत्रण के साथ कृषि और जलस्रोतों को लाभ
नदियों, जलाशयों और अन्य जलस्रोतों में लगातार जमा होती गाद के कारण उनकी जलवहन और जलधारण क्षमता काफी हद तक प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से गाद निकाले जाने से नदियों के जलप्रवाह और जलनिकासी तंत्र में उल्लेखनीय सुधार होगा। इससे बाढ़ के जोखिम को काफी हद तक कम करने, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ाने और भूजल स्तर को रिचार्ज करने में मदद मिलेगी। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया का वास्तविक और सकारात्मक असर चयनित जलस्रोतों पर काम के सटीक वैज्ञानिक क्रियान्वयन पर टिका होगा।
पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षा के कड़े प्रावधान
समझौते में यह विशेष ध्यान रखा गया है कि गाद निकालने का कार्य बिना सोचे-समझे न हो। इसके लिए तकनीकी जांच के बाद पूरी तरह चिन्हित स्थानों से ही गाद निकाली जाएगी। निकाली गई सामग्री की गुणवत्ता की सख्त जांच के बाद ही उसे सड़क निर्माण में इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र, तटबंधों, पुलों और अन्य महत्वपूर्ण ढांचागत संरचनाओं को किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए निरंतर निगरानी और डिजिटल रिकॉर्ड रखने की पुख्ता व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।
विकास के लिए दोहरी उपयोगिता
इस नई पहल से राज्य को दोहरी उपयोगिता मिलने की पूरी संभावना है। एक तरफ जहां जलस्रोतों की बेहतर सफाई से बाढ़ प्रबंधन को मजबूती मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ सड़क निर्माण के लिए मिट्टी और अन्य जरूरी निर्माण सामग्री आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। इससे कृषि भूमि की उपजाऊ मिट्टी पर निर्माण कार्य के लिए होने वाली निर्भरता कम होगी और कुल निर्माण लागत में भी कमी आएगी। अब इस पूरी योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसे जमीन पर प्रभावी, पारदर्शी और पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल तरीके से लागू करने की होगी।