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आजादी से लेकर अब तक: कौन सी पुरानी सरकारी योजनाएं आज भी बदल रहीं रूप

आजादी से लेकर अब तक: कौन सी पुरानी सरकारी योजनाएं आज भी बदल रहीं रूप

स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक भारत सरकार ने जनता के उत्थान के लिए हजारों योजनाएं शुरू की हैं। इनमें से कुछ योजनाएं ऐसी हैं जिन्होंने देश की तस्वीर बदल दी, तो कुछ ऐसी भी रहीं जो वक्त के पहिए के नीचे दबकर बंद हो गईं। क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि दशकों पुरानी योजनाएं आज किस रूप में चल रही हैं? या फिर वे कौन से नियम थे जिनके कारण सरकारों को इन्हें बदलना पड़ा?

योजनाओं का जीवनचक्र: शुरू होना, बदलना और विलीन होना

किसी भी कल्याणकारी राज्य की पहचान उसकी नीतियों से होती है। भारत में योजना आयोग (अब नीति आयोग) और विभिन्न मंत्रालयों द्वारा शुरू की गई योजनाओं का एक पूरा इतिहास रहा है। कोई भी योजना सदाबहार नहीं होती। समाज की बदलती जरूरतें, तकनीकी विकास और आर्थिक हालात तय करते हैं कि कौन सी योजना जारी रहेगी और किसे इतिहास के पन्नों में दफना दिया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी योजनाओं के बंद होने या बदलने के मुख्य तीन कारण होते हैं—डुप्लीकेशन (एक जैसी कई योजनाएं होना), बजट का सही उपयोग न होना, और तकनीक के आने से पारंपरिक तरीकों का प्रासंगिक न रहना।

कौन सी ऐतिहासिक योजनाएं आज नए कलेवर में हैं?

भारत में कई ऐसी योजनाएं हैं जो बहुत पुरानी हैं, लेकिन आज के डिजिटल भारत के हिसाब से उनका रूप पूरी तरह बदल चुका है। इन्हें हम 'इवोल्यूशन' (विकास) का सबसे बड़ा उदाहरण मान सकते हैं:

  • इందిरा आवास योजना से प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): ग्रामीण गरीबों को पक्का मकान देने के लिए 1985 में शुरू की गई इंदिरा आवास योजना को 2016 में पूरी तरह से रिस्ट्रक्चर किया गया। इसमें जियो-टैगिंग, डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) और पारदर्शिता को जोड़ा गया।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम से मनरेगा (MGNREGA): काम के बदले अनाज और काम के अधिकार से जुड़ी पुरानी योजनाओं को समेटते हुए 2005 में नरेगा आया, जिसे बाद में मनरेगा कर दिया गया। आज यह दुनिया की सबसे बड़ी गारंटीशुदा रोजगार योजनाओं में से एक है।
  • जन धन योजना और पुरानी बैंकिंग नीतियां: वित्तीय समावेशन के लिए पहले कई योजनाएं आईं, लेकिन साल 2014 में शुरू की गई 'प्रधानमंत्री जन धन योजना' ने पुरानी असफल कोशिशों के अनुभवों से सीख लेते हुए एक नया मील का पत्थर स्थापित किया।

वे योजनाएं जो समय के साथ बंद कर दी गईं

हर योजना सफल हो, यह जरूरी नहीं है। कई योजनाएं ऐसी थीं जो अपने शुरुआती दौर में तो बहुत लोकप्रिय रहीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे या तो भ्रष्टाचार का शिकार हो गईं या अपनी प्रासंगिकता खो बैठीं।

उदाहरण के लिए, योजना आयोग के समय की कई ब्लॉक-स्तरीय योजनाएं अब अस्तित्व में नहीं हैं। इसी तरह, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना में मिला दिया गया और बाद में इसे सौभाग्य योजना के तहत आगे बढ़ाया गया। नाम बदलना और पुराने ढांचे को आधुनिक तकनीक से लैस करना सरकार की एक निरंतर प्रक्रिया बन गई है।

नाम बदलने की राजनीति बनाम प्रशासनिक सुधार

अक्सर यह बहस छिड़ती है कि योजनाओं के नाम बदलना महज राजनीतिक प्रोपेगेंडा है या इसके पीछे कोई प्रशासनिक मजबूरी है। इस पर नीति निर्माताओं का तर्क है कि जब तक पुरानी योजना की कमियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक नए भारत की उम्मीदों को पूरा नहीं किया जा सकता। नाम बदलने के साथ-साथ फंडिंग का पैटर्न, लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया और मॉनिटरिंग सिस्टम में भी भारी बदलाव किए जाते हैं।

डिजिटल युग में योजनाओं का भविष्य

आज के दौर में आधार कार्ड, डीबीटी और उमंग (UMANG) जैसे ऐप्स ने सरकारी योजनाओं के काम करने का तरीका ही बदल दिया है। पहले जहां बिचौलियों की फौज गरीबों का हक मार लेती थी, वहीं अब सीधे बैंक खाते में पैसे पहुंचते हैं। पुरानी योजनाओं की असफलता से सीख लेते हुए ही आज 'मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस' के सिद्धांत पर काम किया जा रहा है।

निष्कर्ष: सरकारी योजनाएं केवल कागजी घोषणाएं नहीं होतीं, बल्कि यह एक जीवित दस्तावेज की तरह होती हैं जो समय के साथ सांस लेती हैं और बदलती हैं। जो योजनाएं जनता की नब्ज़ को पहचानती हैं, वे रूप बदलकर अमर हो जाती हैं, और जो वक्त के साथ नहीं बदलतीं, वे फाइलों में बंद होकर रह जाती हैं।


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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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