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पहलगाम आतंकी हमला: ब्रिक्स समिट में उठी गूंज, पीड़ित परिवार बोले- कागजी प्रस्ताव नहीं, अब चाहिए आर-पार की कार्रवाई

पहलगाम आतंकी हमला: ब्रिक्स समिट में उठी गूंज, पीड़ित परिवार बोले- कागजी प्रस्ताव नहीं, अब चाहिए आर-पार की कार्रवाई

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब आतंकवाद के खिलाफ हुंकार भरी जाती है, तो उम्मीद की एक नई किरण उन परिवारों के दिलों में भी जगती है जिन्होंने अपनों को खोया है। साल 2026 के बहुप्रतीक्षित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit 2026) में हाल ही में हुए दर्दनाक पहलगाम आतंकी हमले का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। वैश्विक नेताओं ने इस कायरतापूर्ण कृत्य की एक स्वर में निंदा की और आतंकवाद के खात्मे के लिए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

लेकिन, इस कूटनीतिक निंदा के बीच उन बेकसूर परिवारों की चीखें और सवाल सबसे ऊपर हैं, जिनके घरों के चिराग हमेशा के लिए बुझ चुके हैं। ब्रिक्स घोषणापत्र में भले ही आतंकवाद के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया हो, लेकिन पहलगाम हमले में अपनों को खोने वाले परिवारों की प्रतिक्रिया बेहद स्पष्ट और दो टूक है। उनका साफ कहना है कि अब दुनिया को केवल शब्दों के जाल और कागजी प्रस्तावों से आगे बढ़कर जमीन पर ठोस कार्रवाई करनी होगी।

ब्रिक्स मंच पर गूंजा पहलगाम का दर्द

दुनियाभर की निगाहें इस समय ब्रिक्स समिट पर टिकी हुई हैं, जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीक और भू-राजनीतिक मुद्दों के साथ-साथ आतंकवाद का मुद्दा सबसे संवेदनशील विषय के रूप में उभरा। भारत समेत कई प्रमुख देशों के प्रतिनिधियों ने सीमा पार से संचालित हो रही आतंकी गतिविधियों पर गहरी चिंता व्यक्त की। विशेष रूप से पहलगाम में हुए हालिया आतंकी हमले ने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है।

शिखर सम्मेलन के दौरान आतंकवाद के वैचारिक और वित्तीय स्रोतों को नेस्तनाबूद करने पर गहन मंथन हुआ। वैश्विक नेताओं ने आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) की नीति अपनाने का संकल्प लिया। आतंकवादियों को पनाह देने वाले देशों और संगठनों पर नकेल कसने के लिए आपसी खुफिया तंत्र को मजबूत करने और वित्तीय लेन-देन पर कड़ी नजर रखने की बात कही गई।

पीड़ित परिवारों का छलका दर्द: 'सिर्फ निंदा से जख्म नहीं भरते'

जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़े प्रस्ताव पास हो रहे थे, तब भारत के विभिन्न कोनों में बैठे उन पीड़ित परिवारों के घरों में सन्नाटा पसरा हुआ था जिन्होंने पहलगाम हमले में अपने कमाने वाले सदस्यों को खो दिया। इन परिवारों का गुस्सा और निराशा अब खुलकर सामने आने लगी है।

हमले में जान गंवाने वाले एक नागरिक के परिजनों ने भावुक होते हुए कहा, "हम हर बार ऐसी घटनाओं के बाद नेताओं के कड़े बयान और निंदा प्रस्ताव सुनते आ रहे हैं। क्या इन कागजों पर लिखे शब्दों से हमारे घर का चूल्हा जल सकता है? क्या हमारे बच्चों के सिर से उठा पिता का साया वापस आ सकता है? हमें अब सिर्फ संवेदनाएं या प्रस्ताव नहीं चाहिए, हमें असली और निर्णायक कार्रवाई चाहिए जो इन आतंकवादियों और उनके आकाओं की रूह कंपा दे।"

परिवारों का यह दर्द इस बात का प्रतीक है कि आम जनता अब केवल खोखले आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उनका मानना है कि जब तक आतंकवाद के सरगनाओं को उनके अंजाम तक नहीं पहुंचाया जाता, तब तक ऐसे सम्मेलनों और प्रस्तावों का कोई बड़ा जमीनी अर्थ नहीं निकलता।

आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता की परीक्षा

ब्रिक्स जैसे बड़े समूह में इस मुद्दे का उठना यह तो साबित करता है कि वैश्विक समुदाय इस खतरे से अनजान नहीं है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये देश अपने भू-राजनीतिक हितों को दरकिनार कर आतंकवाद के खिलाफ एक मजबूत और साझा सैन्य-आर्थिक रणनीति तैयार कर पाएंगे?

  • कूटनीतिक दबाव: आतंकवाद को समर्थन देने वाले देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों और वैश्विक मंचों पर पूरी तरह से अलग-थलग करना होगा।
  • वित्तीय शिकंजा: आतंकियों तक पहुँचने वाले फंडिंग के रास्तों को सैटेलाइट और डिजिटल सर्विलांस के जरिए हमेशा के लिए बंद करना जरूरी है।
  • सीमा सुरक्षा: आधुनिक तकनीक और इंटेलिजेंस शेयरिंग के जरिए घुसपैठ के हर रास्ते को नेस्तनाबूद करना अब समय की सबसे बड़ी मांग है।

जनता की नजरें अब ठोस फैसलों पर

पहलगाम हमले के बाद देश के कोने-कोने में रोष का माहौल है। आम नागरिक से लेकर पीड़ित परिवार तक, हर कोई अब सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहा है कि आखिर कब तक निर्दोष लोग इस खूनी खेल का शिकार बनते रहेंगे? ब्रिक्स समिट में उठी इस आवाज के बाद अब देश और दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में भारत और उसके सहयोगी देश इस दिशा में क्या और कितने कड़े कदम उठाते हैं।

एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—अब समय बयानों का नहीं, बल्कि कड़े और निर्णायक फैसलों का है। पीड़ित परिवारों का यह दर्द देश की अंतरात्मा को झकझोर रहा है और नीति निर्माताओं के लिए यह समय कसौटी का है कि वे इन परिवारों के आंसुओं का मोल चुकाएं और आतंकवाद का हमेशा के लिए खात्मा करें।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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