सुबह उठने पर थकान और उदासी महसूस होना डिप्रेशन का शुरुआती लक्षण हो सकता है। जानें नींद, सर्केडियन रिदम और मानसिक स्वास्थ्य के बीच का संबंध।
सुबह की थकान और मानसिक सेहत
सुबह जागने के बाद ताजगी महसूस करने के बजाय हर रोज थकान और उदासी महसूस करना सामान्य बात नहीं है। भले ही लोग शाम होते-होते थोड़ा बेहतर महसूस करते हों, लेकिन नींद की अधिकता या कमी के चलते दिनभर ऊर्जा की कमी बनी रहती है। कई लोग हफ्ते के सामान्य दिनों में नींद खराब होने के बाद भी अपना कामकाज तो कर लेते हैं, लेकिन सप्ताहांत या अवकाश के दिनों में अत्यधिक सोना चाहते हैं या भारी थकान व कमजोरी महसूस करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नींद खराब होने से शरीर का ऊर्जा संतुलन बिगड़ जाता है। यदि मानसिक सेहत ठीक लगने के बावजूद नींद के साथ-साथ भूख में भी असामान्य बदलाव नजर आ रहे हैं, तो यह अवसाद (डिप्रेशन) का संकेत हो सकता है। एम्स, नई दिल्ली की पूर्व क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. सुजाता मिन्हास का कहना है कि अवसाद के मरीजों के उपचार में सबसे अहम सलाह नींद को सुधारना होती है, क्योंकि नींद पूरी होने पर मरीज खुद की देखभाल के प्रति अधिक सजग होते हैं।
नींद और अवसाद का आपसी संबंध
अवसाद से बचाव के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि नींद पूरी न होने या इसके असंतुलन के कारणों का पता लगाया जाए। नींद की कमी या इसकी अधिकता हमारी भावनाओं के प्रबंधन को मुश्किल बना देती है। इसके चलते छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, अत्यधिक चिड़चिड़ापन रहना या किसी बात पर उचित प्रतिक्रिया न दे पाना आम हो जाता है। यह स्थिति व्यक्ति के निजी, कामकाजी और सामाजिक रिश्तों को बुरी तरह प्रभावित करती है। जब नींद की परेशानियां और अवसाद एक साथ मिलते हैं, तो यह व्यक्ति को एक ऐसे कुचक्र में फंसा देते हैं जहाँ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां गंभीर रूप लेने लगती हैं।
सर्केडियन रिदम और डिप्रेशन का कनेक्शन
आधुनिक जीवनशैली में देर रात तक काम करने, नाइट शिफ्ट करने और देर रात बाहर खाने की संस्कृति के कारण शरीर की जैविक घड़ी (सर्केडियन रिदम) का बाहरी वातावरण से तालमेल बिगड़ रहा है। इसका सीधा असर नींद से जुड़े हार्मोन मेलाटोनिन पर पड़ता है। मेलाटोनिन के असंतुलित होने से हमारी मनोदशा को नियंत्रित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण हार्मोन जैसे सेरोटोनिन और डोपामाइन भी प्रभावित होते हैं। हार्मोनल स्तर पर होने वाला यह बदलाव अवसाद के लक्षणों को उभारने में बड़ी भूमिका निभाता है।
शरीर की आंतरिक कार्यप्रणाली और जीवनशैली में सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि डेडलाइन का दबाव और देर रात तक जागने की संस्कृति इतनी आम हो गई है कि लोग उन शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने लगते हैं जो सीधे तौर पर डिप्रेशन से जुड़े हो सकते हैं। यदि नींद की समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो इससे न केवल जीवनशैली से जुड़ी अन्य बीमारियां घेर सकती हैं, बल्कि व्यक्ति जल्द ही अवसाद की चपेट में आ सकता है। इसलिए शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को समझना बेहद जरूरी है। हमारा शरीर हमारी इच्छा से नहीं बल्कि अपने तय नियमों के अनुसार चलता है। सुबह के समय शरीर अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है, सुबह नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक यह भोजन स्वीकार करता है, और दोपहर तीन बजे से रात नौ बजे तक पोषक तत्वों को प्रोसेस करता है। यही कारण है कि रात में हल्का भोजन करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद रात नौ बजे से सुबह तीन बजे तक की नींद के दौरान शरीर में मरम्मत (रिपेयरिंग) की प्रक्रिया चलती है। यदि कोई व्यक्ति शरीर की इस प्राकृतिक घड़ी के विपरीत जीवनशैली अपनाता है, तो उसका बीमार होना स्वाभाविक है। ऐसे में यदि नींद से जुड़ी कोई भी समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो किसी विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।