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वर्ल्ड मेनोपॉज डे: महिलाओं में इस दौर के 7 बड़े बदलाव और पुरुषों की भूमिका

वर्ल्ड मेनोपॉज डे: महिलाओं में इस दौर के 7 बड़े बदलाव और पुरुषों की भूमिका

विश्व मेनोपॉज दिवस पर विशेष: महिलाओं के जीवन के इस अहम पड़ाव को समझें और परिवार के सदस्यों के लिए बढ़ाएं सहयेाग के हाथ।

घर में जब पत्नी, मां या बहन चिड़चिड़ी रहने लगें, रात में ठीक से सो न पाएं या बार-बार थकान और शरीर में दर्द की शिकायत करें, तो परिवार के लोग अक्सर इसे केवल उम्र का असर या स्वभाव में बदलाव मान लेते हैं। लेकिन 40 से 50 वर्ष की आयु के आसपास महिलाओं में होने वाले इन बदलावों के पीछे पेरिमेनोपॉज या मेनोपॉज मुख्य वजह हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, ज्यादातर महिलाओं में मेनोपॉज 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच होता है, हालांकि इसका समय और अनुभव हर महिला के लिए भिन्न हो सकता है। हर साल 18 अक्टूबर को मनाए जाने वाले 'वर्ल्ड मेनोपॉज डे' का मुख्य उद्देश्य इसी विषय पर समाज में जागरूकता बढ़ाना है ताकि महिलाएं इस दौर का सामना बिना किसी सामाजिक संकोच और मानसिक तनाव के कर सकें।

हार्मोनल बदलाव और शरीर पर असर

मेनोपॉज महिलाओं के जीवन का एक प्राकृतिक चरण है। इस दौरान शरीर में एस्ट्रोजन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन का स्तर बदलता है, जिससे कुछ महिलाओं को शारीरिक और मानसिक स्तर पर कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पुरुषों के लिए भी यह समझना बेहद जरूरी है कि इस दौरान घर की महिलाएं किन बदलावों से गुजरती हैं और वे किस प्रकार एक मजबूत सहारा बन सकते हैं।

1. पीरियड्स के समय और रक्तस्राव में बदलाव

मेनोपॉज से ठीक पहले के दौर को पेरिमेनोपॉज कहा जाता है। इस समयावधि में पीरियड्स के समय और रक्तस्राव (ब्लडिंग) के पैटर्न में बदलाव आने लगते हैं। कभी मासिक धर्म तय समय से पहले आ सकता है, तो कभी इनके बीच का अंतराल काफी बढ़ जाता है। रक्तस्राव भी पहले की तुलना में कम या ज्यादा हो सकता है। इस अनियमितता के कारण महिलाओं को मानसिक चिंता होती है। ऐसे में सवाल पूछते समय संकोच या मजाक करने के बजाय उनकी बात सहजता से सुनें। यदि ब्लीडिंग बहुत ज्यादा हो या सामान्य से अलग महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेने में उनका सहयोग करें।

2. अचानक गर्मी लगना और रात में पसीना आना

इस अवस्था से गुजर रही कुछ महिलाओं को अचानक चेहरे, गर्दन और छाती के हिस्से में तेज गर्मी का अहसास होता है, जिसे चिकित्सा की भाषा में 'हॉट फ्लैशेज' कहा जाता है। रात के समय अत्यधिक पसीना आने के कारण कपड़े या बिस्तर तक बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। ऐसे में बार-बार पंखा चलाने, कमरे का तापमान कम रखने या रात में उठने की उनकी जरूरत को बेवजह की परेशानी न समझें। कमरे के माहौल को आरामदायक रखने से उन्हें काफी राहत मिलती है।

3. नींद पूरी न होने से बढ़ती थकान

मेनोपॉज के दौरान सोने में कठिनाई होना या रात में बार-बार नींद टूटना आम बात है। रात में आने वाले पसीने के कारण भी नींद में बाधा आती है। पर्याप्त नींद न मिलने के कारण अगले दिन अत्यधिक थकान, चिड़चिड़ापन और किसी भी काम में ध्यान लगाने में समस्या उत्पन्न होती है। यदि महिला दिनभर थकी हुई नजर आए, तो इसे उनका आलस न समझें। घरेलू कामकाज आपस में बांटें, उन्हें पर्याप्त आराम करने का समय दें और घर में सोने के लिए शांत व आरामदायक माहौल तैयार करें।

4. मूड स्विंग और बेचैनी की स्थिति

हार्मोनल असंतुलन के इस दौर में कुछ महिलाओं को बार-बार मूड स्विंग, बेचैनी, उदासी या गंभीर चिंता महसूस होती है। नींद की कमी इन सभी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देती है। इसका सीधा असर उनके पारिवारिक रिश्तों और रोजमर्रा के कार्यों पर भी पड़ता है। हर बार उनकी इस मानसिक स्थिति को गुस्सा या नखरा कहकर टालने से बचें। उनकी बातें ध्यान से सुनें, बिना किसी पूर्वाग्रह के उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने दें और यह न मानें कि हर बदलाव का कारण सिर्फ मेनोपॉज ही है। अगर उदासी या चिंता लगातार बनी रहे, तो पेशेवर डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

5. जोड़ों और मांसपेशियों का दीर्घकालिक दर्द

इस विशेष जीवनकाल के दौरान कुछ महिलाओं को घुटनों, कंधों, कमर या शरीर के अन्य जोड़ों में तीव्र दर्द और अकड़न महसूस हो सकती है। इस वर्ष के वर्ल्ड मेनोपॉज डे की थीम भी मिडिल एज में होने वाले लंबे समय के दर्द पर विशेष रूप से केंद्रित है। यदि परिवार की कोई महिला बार-बार शरीर में दर्द की शिकायत करती है, तो इसे केवल बढ़ती उम्र का असर मानकर नजरअंदाज न करें। रोजमर्रा के कामों में उनका हाथ बंटाएं। हालांकि, लगातार और तेज दर्द के अन्य चिकित्सीय कारण भी हो सकते हैं, इसलिए केवल मेनोपॉज को ही इसका एकमात्र कारण मान लेना उचित नहीं है।

6. याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई

इस अवस्था के दौरान कई महिलाओं को छोटी-छोटी बातें याद रखने, किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित करने या एक साथ कई कार्य संभालने में दिक्कत महसूस होती है। इसे आम बोलचाल की भाषा में 'ब्रेन फॉग' कहा जाता है, जिसका मुख्य कारण नींद की कमी और मानसिक तनाव होता है। छोटी बातें भूलने पर उन्हें ताना देने या बार-बार टोकने से बचना चाहिए। जरूरी कार्यों की सूची तैयार करने, अप्वाइंटमेंट याद रखने या जिम्मेदारियों का बोझ कम करने में उनका सहयोग करें।

7. यौन स्वास्थ्य से जुड़े बदलाव

मेनोपॉज के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर घटने से योनि में सूखापन, खुजली या यौन संबंध के दौरान दर्द व असहजता जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ महिलाओं की यौन इच्छा में भी स्वाभाविक बदलाव आते हैं। इन संवेदनशील विषयों पर खुलकर बात करना कई बार उनके लिए कठिन होता है। ऐसे में शारीरिक नजदीकी को लेकर किसी भी प्रकार का दबाव न बनाएं और उनकी इस असहजता का पूरा सम्मान करें।

परिवार और पुरुषों की व्यावहारिक भूमिका

मेनोपॉज के इस संवेदनशील दौर में पुरुष कई तरीकों से एक बेहतर जीवनसाथी और परिवारजन की भूमिका निभा सकते हैं। हर समस्या का तुरंत समाधान सुझाने के बजाय पहले यह समझने का प्रयास करें कि वे क्या महसूस कर रही हैं। खाना पकाने, घर की साफ-सफाई और अन्य घरेलू जिम्मेदारियों में बराबर की हिस्सेदारी निभाएं। यदि लक्षण उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को अधिक प्रभावित कर रहे हैं, तो डॉक्टर के पास जाने के लिए अप्वाइंटमेंट लेने या उनके साथ अस्पताल जाने की पहल करें। उनकी किसी भी शारीरिक या मानसिक परेशानी को बढ़ती उम्र या गुस्से का नाम देकर नजरअंदाज न करें, बल्कि इस विषय पर खुद भी अपनी जानकारी बढ़ाएं और उनसे पूछें कि उन्हें किस तरह की मदद की आवश्यकता है।

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अल्का सिंह

अल्का सिंह

Senior Content Writer

अल्का सिंह स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषयों पर गहन शोध के साथ लेखन करती हैं। उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को केवल सामान्य जानकारी ही नहीं, बल...

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