गड़चिरोली जिले के दुर्गम एटापल्ली तहसील में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, खराब सड़कें और गरीब परिवारों के सामने खड़े आर्थिक संकट का एक और मानवीय त्रासद मामला सामने आया है। तहसील के रेखानार गांव की रहने वाली 21 वर्षीय पार्वती सुरेश झोरे की 24 अक्टूबर को उपचार के दौरान मौत हो गई। इससे ठीक पहले, गत 30 सितंबर को शल्यक्रिया के बाद जन्मे उनके नवजात शिशु की भी महज तीन दिन के भीतर मौत हो गई थी। इस दोहरी त्रासदी ने एक बार फिर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे की पोल खोल दी है।
सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की दुश्वारियां
एटापल्ली तहसील के चोकेवाड़ा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले रेखानार गांव में बुनियादी सड़कों और परिवहन साधनों की भारी कमी है। प्रसव के दौरान गर्भवती महिलाओं को होने वाली परेशानियों को ध्यान में रखते हुए पार्वती को उनके मायके पैंडी गांव में रखा गया था। हालांकि, 29 सितंबर को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें पहले गड़चिरोली के महिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए चिकित्सकों ने उसी दिन उन्हें चंद्रपुर रेफर कर दिया।
अतिदक्षता विभाग में भी नहीं बच सका नवजात
चंद्रपुर के अस्पताल में 30 सितंबर को शल्यक्रिया (सिजेरियन) के माध्यम से पार्वती ने एक बेटे को जन्म दिया। जन्म के समय नवजात का वजन महज 600 ग्राम था और उसकी स्थिति अत्यंत नाजुक थी। बच्चे को अस्पताल के अतिदक्षता विभाग (NICU) में रखकर बचाने के तमाम प्रयास किए गए, लेकिन तीन दिन बाद ही उसकी मौत हो गई।
आर्थिक तंगी और इलाज की लंबी भागदौड़
नवजात की मृत्यु के बाद भी पार्वती के स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार दर्ज नहीं किया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए नागपुर ले जाया गया। परिजनों के मुताबिक, नागपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी गई, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर होने के कारण वे वहां का भारी खर्च उठाने में असमर्थ थे। मजबूरन उन्हें वापस गड़चिरोली लाना पड़ा। स्थानीय स्तर पर एक निजी अस्पताल में जांच कराने पर वहां भी इलाज का खर्च उनकी क्षमता से बहुत अधिक बताया गया, जिससे परिवार की मुश्किलें और अधिक बढ़ गईं।
अंतिम समय में नहीं मिली राहत
लगातार गिरते स्वास्थ्य के बीच 23 अक्टूबर की शाम पार्वती की तबीयत एक बार फिर गंभीर रूप से बिगड़ गई। परिजन उन्हें शाम करीब सात बजे कसनसूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे। आरोप है कि वहां के डॉक्टरों ने स्थिति को संभालने के बजाय उन्हें सीधे गड़चिरोली ले जाने की सलाह दी। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिजन उन्हें गड़चिरोली न ले जाकर रात करीब दो बजे किसी अन्य अस्पताल में ले गए, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 24 अक्टूबर को पार्वती की भी मौत हो गई।
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए एटापल्ली तहसील के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. भूषण चौधरी ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग शुरुआत से ही पार्वती झोरे की सेहत पर नजर रखे हुए था। उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए समय-समय पर उच्च स्तरीय और बेहतर अस्पतालों में इलाज कराने की सलाह दी गई थी, लेकिन परिजनों ने आर्थिक कारणों या अन्य वजहों से मना किया। यदि समय रहते नागपुर जाकर उचित उपचार लिया गया होता, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्गम क्षेत्रों के मरीजों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए विभाग लगातार प्रयासरत रहता है।