सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी गरीबों के हक का राशन अक्सर भ्रष्टाचार और धांधली के साए में घिरा रहता है। महाराष्ट्र के नागपुर जिले से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां राशन की कालाबाजारी और बड़े घोटाले की आशंका ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। नागपुर में पिछले दो महीनों से राशन ढोने वाले वाहनों की ऑनलाइन ट्रैकिंग पूरी तरह से ठप पड़ी है। हैरानी की बात यह है कि तकनीकी खराबी या सिस्टम फेल होने के बजाय यह सब विभागीय लापरवाही और बकाया भुगतानों के चलते हो रहा है, जिसका सीधा फायदा बिचौलियों और खाद्यान्न माफिया को मिल रहा है.
दो महीने से जीपीएस और ऑनलाइन सिस्टम पूरी तरह से बंद
पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए सरकार ने राशन के ट्रकों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए जीपीएस (GPRS) ट्रैकिंग और ऑनलाइन पोर्टलों का सहारा लिया था। लेकिन नागपुर में पिछले 60 दिनों से यह पूरा डिजिटल पहरा बेअसर साबित हो रहा है। ट्रकों में लगे जीपीएस उपकरण या तो बंद हैं या फिर संबंधित एजेंसी ने बकाया राशि न मिलने के कारण अपनी सेवाएं रोक दी हैं। सिस्टम के इस तरह अचानक आंखें मूंद लेने से गोदाम से लेकर उचित मूल्य की दुकानों तक पहुंचने वाले अनाज का हिसाब-किताब भगवान भरोसे चल रहा है।
नियमों के मुताबिक, हर एक ट्रक की मूवमेंट, उसकी गति, रूट और अनलोडिंग पॉइंट की डिजिटल मॉनीटरिंग होनी चाहिए ताकि रास्ते में अनाज की हेराफेरी न की जा सके। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि कागजी कार्रवाई के नाम पर सारा तंत्र अंधेरे में तीर चला रहा है।
1.40 करोड़ रुपये का बकाया और 'मैनुअल बिल्टी' का खेल
इस पूरे मामले की सबसे कमजोर और संदिग्ध कड़ी मैनुअल बिल्टी (हाथ से पर्ची बनाकर माल भेजना) का इस्तेमाल है। ऑनलाइन सिस्टम बंद होने के बाद परिवहन कंपनियों और संबंधित वेंडर का करीब 1.40 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया चल रहा है। भुगतान न होने के विवाद के बीच डिजिटल व्यवस्था को दरकिनार कर दिया गया है और अब धड़ल्ले से हाथों से लिखकर बिल्टी तैयार की जा रही हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि मैनुअल बिल्टी का यह दौर किसी बड़े घोटाले का संकेत है। जब डिजिटल ट्रेसिंग नहीं होती, तो ट्रकों में लदे चावल, गेहूं और अन्य खाद्यान्न की वास्तविक मात्रा और उसकी मंजिल को आसानी से बदला जा सकता है। कागजों पर एक ट्रक को एक निश्चित दुकान पर दिखाया जा सकता है, जबकि वह माल रास्ते में ही किसी और ठिकाने या खुले बाजार में ऊंचे दामों पर खपाया जा सकता है।
गरीबों के हक पर डाका डालने की पुरानी पटकथा
देश के विभिन्न हिस्सों में राशन माफिया हमेशा से सक्रिय रहे हैं जो गरीबों के निवाले को छीनकर अपनी तिजोरियां भरते हैं। नागपुर में सामने आई यह स्थिति इस बात का प्रमाण है कि कैसे मामूली प्रशासनिक सुस्ती या तकनीकी बहानेबाजी का फायदा उठाकर सिस्टम को हाईजैक किया जा सकता है।
- पारदर्शिता की बलि: डिजिटल निगरानी हटने से पारदर्शिता का दावा कागजी साबित हो रहा है।
- भ्रष्टाचार के रास्ते खुले: मैनुअल पर्चियों के जरिए माल के डायवर्जन की आशंका कई गुना बढ़ गई है।
- विभागीय चुप्पी: करोड़ों के बकाये और सिस्टम की विफलता पर जिम्मेदार अधिकारी खुलकर बोलने से बच रहे हैं।
प्रशासनिक सुस्ती और जनता के सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर पिछले दो महीनों से जब जीपीएस और ऑनलाइन ट्रैकिंग बंद थी, तब जिला प्रशासन और खाद्य आपूर्ति विभाग की नींद क्यों नहीं खुली? क्या डेढ़ करोड़ के करीब के बकाये का भुगतान समय पर न होना किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा है? गरीबों के लिए आने वाला अनाज यदि रास्ते में ही गायब हो जाएगा, तो सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं महज छलावा बनकर रह जाएंगी।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक या स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि पिछले दो महीनों के दौरान नागपुर जिले में जितने भी ट्रकों ने खाद्यान्न की ढुलाई की है, उनके रूट, वजन और दुकानदारों को मिले स्टॉक का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया जाना चाहिए।
आगे क्या कदम उठाए जाने की जरूरत है?
इस गंभीर प्रकरण के सामने आने के बाद अब सरकार और विभाग पर त्वरित कार्रवाई करने का भारी दबाव है। यदि समय रहते इस डिजिटल ब्लैकआउट को ठीक नहीं किया गया, तो नागपुर का यह राशन घोटाला आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है।
- तुरंत बहाल हो ऑनलाइन सिस्टम: जीपीएस और सॉफ्टवेयर से जुड़ी तकनीकी बाधाओं को तत्काल प्रभाव से दूर किया जाए।
- बकाये का निपटारा: वेंडर के 1.40 करोड़ रुपये के बकाये की फाइल को तेजी से निपटाकर जवाबदेही तय हो।
- दोषियों पर शिकंजा: जिन अधिकारियों की नाक के नीचे यह खेल दो महीने तक चला, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो।
फिलहाल, नागपुर के राशन वितरण तंत्र में मचे इस घमासान ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में पर्दा डालने की कोशिश करता है या फिर गरीबों के हक पर डाका डालने वालों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे पहुंचाता है।