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नागपुर में SIR वोटर लिस्ट से 37% नाम गायब, सियासी दलों की बढ़ी धड़कन

नागपुर में SIR वोटर लिस्ट से 37% नाम गायब, सियासी दलों की बढ़ी धड़कन

महाराष्ट्र के नागपुर जिले से इस वक्त की एक बेहद चौंकाने वाली और राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा देने वाली खबर सामने आ रही है। निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) अभियान के तहत जारी की गई पहली मतदाता सूची ने सभी राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है। नागपुर के कई महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 37 से 40 प्रतिशत तक मतदाताओं के नाम नई सूची से गायब पाए गए हैं। इस बड़े पैमाने पर नामों के कटने या शामिल न होने से चुनावी समीकरण पूरी तरह से प्रभावित होते नजर आ रहे हैं, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में मैराथन बैठकों का दौर शुरू हो गया है।कामठी और हिंगना में सबसे खराब हालात, आंकड़ों ने चौंकाया

सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, नागपुर शहर और ग्रामीण इलाकों में बीएलओ (BLO) के काम में भारी अंतर देखने को मिला है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, लेकिन शहरी और अर्बन-रूरल बाउंड्री वाले विधानसभा क्षेत्रों में हालात चिंताजनक हैं। पालक मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले की प्रतिष्ठा से जुड़ी कामठी विधानसभा सीट पर ही करीब 1,38,904 मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हो गए हैं, जो कुल मतदाताओं का 26.70 प्रतिशत है। यह कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, क्योंकि यह संख्या किसी भी कड़े मुकाबले वाले चुनाव के परिणाम को पूरी तरह पलटने की क्षमता रखती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कामठी सीट पर छूटे 1.39 लाख मतदाताओं में अल्पसंख्यक और दलित समुदाय का एक बड़ा हिस्सा शामिल है, जो चुनावी नतीजों में हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। यदि पिछले चुनावी गणित पर नजर डालें, तो बावनकुले ने यहां कांग्रेस उम्मीदवार सुरेश भोयर को करीब 40,946 वोटों के अंतर से हराया था। ऐसे में एक लाख से अधिक वोटों का सूची से बाहर होना राजनीतिक दलों के लिए शोध और गहरी चिंता का विषय बन गया है।

सावनेर में जीत के अंतर से तीन गुना अधिक वोटर सूची से बाहर

नागपुर जिले के सावनेर विधानसभा क्षेत्र का हाल तो और भी ज्यादा हैरान करने वाला है। यहां एसआईआर के बाद जारी हुई नई सूची में कुल 80,428 मतदाताओं के नाम गायब मिले हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह संख्या पिछले विधानसभा चुनाव में जीत के अंतर से तीन गुना से भी अधिक है। पिछले चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के आशीष देशमुख ने कांग्रेस की अनुजा केदार को 26,401 मतों के अंतर से शिकस्त दी थी। अब इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम कटना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में राजनीतिक दल अपने 'बीएलए' (BLA) यानी बूथ लेवल एजेंट्स को मैदान में उतारकर इन छूटे हुए नामों को जुड़वाने के लिए कितनी कड़ी मेहनत करने वाले हैं।

हिंगना में बीएलओ की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

नागपुर जिले के 6 प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों में हिंगना का प्रदर्शन सबसे लचर और निराशाजनक रहा है। यहां कुल मतदाताओं के 32 प्रतिशत हिस्से के नाम सूची से गायब हैं। हिंगना में कुल मतदाताओं की संख्या 4,64,744 है, जिनमें से 1,48,765 लोगों के नाम नई सूची में दिखाई नहीं दे रहे हैं। इनमें एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जिनके गणना फॉर्म (Enumeration Forms) जमा ही नहीं हो पाए।

  • जनता की सीधी शिकायत: स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि बीएलओ उनके घरों तक पहुंचे ही नहीं, जबकि चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देश थे कि हर घर में कम से कम तीन बार संपर्क किया जाना चाहिए।
  • विपक्ष के आरोप: इस सीट पर पिछले चुनाव में भाजपा के समीर मेघे ने एनसीपी (शरद पवार गुट) के रमेशचंद्र बंग को करीब 78,901 मतों से हराया था। विपक्षी दलों ने पहले ही इस क्षेत्र में भारी संख्या में फर्जी मतदाताओं के होने की शिकायत चुनाव आयोग से की थी, जिसके बाद इस तरह के आंकड़े सामने आना और गंभीर सवाल खड़े करता है।

उमरेड, काटोल और रामटेक में मिली राहत

एक तरफ जहां कुछ सीटों पर हालात चिंताजनक हैं, वहीं नागपुर जिले की कुछ अन्य सीटों पर एसआईआर प्रक्रिया को काफी अच्छा प्रतिसाद भी मिला है। उमरेड, काटोल और रामटेक जैसे आदिवासी बहुल और ग्रामीण क्षेत्रों में बीएलओ ने बेहतर कार्य किया है।

उमरेड में केवल 15.79 प्रतिशत नाम ही सूची से बाहर रहे, जबकि 84.21 फीसदी मतदाताओं के नाम सफलतापूर्वक नई सूची में शामिल कर लिए गए। इसी प्रकार काटोल विधानसभा क्षेत्र में भी 82.54 प्रतिशत मतदाताओं ने इस प्रक्रिया में अपनी सहभागिता दर्ज कराई और महज 17.46% नाम ही सूची से बाहर हुए। रामटेक में भी स्थिति नियंत्रण में दिखी, हालांकि वहां भी 55,566 वोटर्स के नाम किन्हीं कारणों से सूची में नहीं आ सके।

आगे की राह और राजनीतिक दलों की रणनीति

चुनाव आयोग द्वारा इस विसंगति को दूर करने के लिए आगामी एक महीने का समय दिया गया है। इस तय समयसीमा के भीतर राजनीतिक दल और प्रशासनिक अमला युद्ध स्तर पर छूटे हुए पात्र मतदाताओं के नाम फिर से सूची में दर्ज कराने के प्रयास में जुट गया है। जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि किसी भी पात्र नागरिक का नाम मताधिकार से वंचित न रहे, इसके लिए विशेष कैंप आयोजित किए जाएंगे। बहरहाल, नागपुर के इस सियासी घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण चुनाव परिणामों को किस हद तक प्रभावित कर सकता है। अब देखना यह होगा कि आने वाले हफ्तों में राजनीतिक दल अपने छूटे हुए वोटर्स को वापस सूची में जोड़ने में कितने कामयाब हो पाते हैं।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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