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गांधी जयंती पर जरूर देखें महात्मा गांधी पर बनी ये 5 शानदार फिल्में

गांधी जयंती पर जरूर देखें महात्मा गांधी पर बनी ये 5 शानदार फिल्में

अक्टूबर का महीना आते ही देश भर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यादें और उनके विचार नए सिरे से जीवंत हो उठते हैं। हर साल दो अक्टूबर को हम बापू की जयंती मनाते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है किताबी पन्नों से बाहर निकलकर अगर बापू को पर्दे पर देखना हो, तो सिनेमा ने उन्हें किस तरह से गढ़ा है? महात्मा गांधी का जीवन केवल एक व्यक्ति की गाथा नहीं है, बल्कि यह सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का एक ऐसा दर्शन है जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है।

साल 2026 में भी गांधी के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने दशकों पहले थे। आज की डिजिटल और तेज रफ्तार जिंदगी में, जब हम अक्सर अपनी मूल जड़ों और नैतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं, तब सिनेमाई पर्दे पर बापू के जीवन को देखना एक अनूठा अनुभव हो सकता है। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं ऐसी पांच बेहतरीन फिल्मों की सूची, जो महात्मा गांधी के व्यक्तित्व, उनके संघर्ष और उनके विचारों को बहुत ही गहराई से आपके सामने रखती हैं।

1. गांधी (1982) - रिचर्ड एटनबरो का मास्टरपीस

जब भी महात्मा गांधी पर बनी फिल्मों का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गांधी' का ही आता है। इस फिल्म में बेन किंग्सले ने बापू की भूमिका को इस शिद्दत और जीवंतता के साथ निभाया कि पर्दा और हकीकत का फर्क मिट गया। यह फिल्म दक्षिण अफ्रीका में एक वकील के रूप में मोहनदास करमचंद गांधी के शुरुआती सफर से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम और अंततः उनकी दुखद हत्या तक की पूरी दास्तां कहती है।

यह फिल्म केवल एक बायोग्राफी नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा दस्तावेज है जिसे ऑस्कर मंच पर भी जबरदस्त सराहना मिली। अगर आप गांधी के जीवन को समग्रता से समझना चाहते हैं, तो इस फिल्म को अपनी वॉचलिस्ट में सबसे ऊपर रखना चाहिए। बेन किंग्सले की एक्टिंग और फिल्म का संगीत दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

2. हे राम (2000) - कमल हासन की संवेदनशीलता

कमल हासन द्वारा निर्देशित और अभिनीत फिल्म 'हे राम' भारत के विभाजन के समय के दर्द और महात्मा गांधी की हत्या के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फिल्म एक अलग दृष्टिकोण से बापू को देखती है। इसमें एक आम इंसान के गुस्से और राष्ट्रपिता के प्रति उसके विरोधाभास को बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारा गया है। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह ने महात्मा गांधी की भूमिका को बेहद गरिमा के साथ निभाया है।

यह फिल्म दिखाती है कि कैसे नफरत के माहौल में भी गांधीजी का शांति और अहिंसा का संदेश कितना भारी पड़ सकता है। हालांकि यह फिल्म अपने समय में कमर्शियल रूप से बहुत बड़ी हिट नहीं रही, लेकिन क्रिटिक्स के बीच इसे मास्टरपीस माना जाता है। इतिहास की कड़वी सच्चाइयों से रूबरू होने के लिए यह एक अनिवार्य फिल्म है।

3. द मेकिंग ऑफ द महात्मा (1996) - श्याम बेनेगल की रियलिस्टिक सोच

प्रसिद्ध निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्म 'द मेकिंग ऑफ द महात्मा' दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के 21 वर्षों के संघर्ष पर आधारित है। यह फिल्म बताती है कि कैसे एक सामान्य बैरिस्टर रंगभेद के खिलाफ लड़ते-लड़ते 'महात्मा' बनने की राह पर अग्रसर हुआ। इस फिल्म में रजनीश त्यागी ने गांधीजी के युवा दिनों का किरदार निभाया, जबकि रजत कपूर ने परिपक्व गांधी की भूमिका को जीवंत किया।

यह फिल्म इस बात पर प्रकाश डालती है कि महात्मा गांधी अचानक से महान नहीं बने थे, बल्कि उनके भीतर के विचारों का परिपक्व होना एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा का परिणाम था। अगर आप उनके शुरुआती जीवन और वैचारिक बदलावों को गहराई से जानना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।

4. एस.के.एस. गांधी / सरदार (1993) - राजनीतिक और वैचारिक गहराई

केतन मेहता द्वारा निर्देशित फिल्म 'सरदार' मुख्य रूप से सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर आधारित है, लेकिन इसमें महात्मा गांधी के साथ उनके रिश्तों, विचारों की भिन्नता और देश की आजादी के समय लिए गए कठिन फैसलों को बहुत ही करीब से दिखायाया गया है। फिल्म में अन्नू कपूर ने महात्मा गांधी का किरदार निभाया था।

यह फिल्म हमें सिखाती है कि कैसे दो महान नेता, जिनकी कार्यशैली और सोच में कई बार मतभेद होते थे, वे देशहित के लिए एक साथ खड़े रहते थे। यह फिल्म इतिहास के पन्नों से कई अनसुने पहलुओं को सामने लाती है और राजनीति तथा नैतिकता के बीच के बारीक अंतर को समझाती है।

5. लगे रहो मुन्ना भाई (2006) - गांधीगिरी का नया दौर

इस फेहरिस्त में सबसे अलग और आधुनिक फिल्म है 'लगे रहो मुन्ना भाई'। राजकुमार हिरानी द्वारा निर्देशित इस कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ने युवाओं के बीच 'गांधीगिरी' शब्द को लोकप्रिय बना दिया। संजय दत्त और अरशद वारसी की इस फिल्म में दिखाया गया कि कैसे आज के आधुनिक समाज में भी महात्मा गांधी के सिद्धांत—जैसे सच बोलना, अहिंसा और प्रेम—समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।

फिल्म में दिलीप प्रभावलकर ने गांधीजी के किरदार को जिस सहजता और संवेदनशीलता के साथ निभाया, उसने हर उम्र के दर्शक के दिल को छू लिया। यह फिल्म साबित करती है कि गांधीजी केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज कोई नाम नहीं हैं, बल्कि वे एक जीने का तरीका हैं जो आज भी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में काम आ सकता है।

क्यों देखना चाहिए इन फिल्मों को?

आज की पीढ़ी के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि हमें जो आजादी मिली है, उसके पीछे कितना बड़ा वैचारिक और शारीरिक संघर्ष रहा है। ये फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमें एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती हैं। जब आप इन फिल्मों को देखेंगे, तो आपको महसूस होगा कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलना कठिन जरूर है, लेकिन अंततः जीत उसी की होती है।

तो इस बार जब भी आपको फुर्सत मिले, इन पांच फिल्मों में से किसी एक को जरूर चुनें और अपने परिवार के साथ बैठकर देखें। यह न सिर्फ आपके ज्ञान को बढ़ाएगा, बल्कि आपको अपने देश के इतिहास और उसके महापुरुषों के प्रति और अधिक गर्व महसूस कराएगा। बापू के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और आगे भी रहेंगे, बस जरूरत है उन्हें अपने जीवन में उतारने की।

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तनु उपाध्याय

तनु उपाध्याय

Senior Sub Editor

तनु उपाध्याय एंटरटेनमेंट जगत की हलचल को करीब से समझती हैं और उसे दर्शकों के सामने आकर्षक अंदाज में पेश करती हैं। फिल्मों, टीवी, ओटीटी और वायरल ट्रे...

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