आलू की मंदी और बढ़ते किराए से मुरादाबाद के किसानों को भारी आर्थिक नुकसान, सरकारी बीज पर 1000 रुपये की सब्सिडी के बावजूद केवल सात किसानों ने कराई ऑनलाइन बुकिंग
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में आलू उत्पादक किसानों के सामने इस समय गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बाजार में फसल के उचित दाम न मिलने और कोल्ड स्टोरेज के भारी-भरकम किराए के चलते किसानों की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि किसानों ने न केवल आगामी सत्र में आलू की खेती का रकबा बड़े पैमाने पर घटाने का फैसला किया है, बल्कि सरकारी बीज खरीदने से भी अपने हाथ खींच लिए हैं।
कोल्ड स्टोरेज का किराया बना जी का जंजाल
जिले के सलेमपुर बंगर गांव के रहने वाले आलू किसान शेर सिंह के लिए इस बार की फसल घाटे का बड़ा सौदा साबित हुई है। जब उन्होंने अपनी फसल की कटाई की थी, तब मंडी में 50 किलो आलू का कट्टा मात्र 300 रुपये के भाव पर बिका था। बेहतर और लाभकारी दाम मिलने की उम्मीद में उन्होंने अपने आलू को कोल्ड स्टोरेज में सुरक्षित रखवा दिया था। लेकिन अब जब फसल को बाहर निकालने का समय आया है, तो स्टोरेज का किराया और अन्य ढुलाई खर्च ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
किसान शेर सिंह के अनुसार, कोल्ड स्टोरेज से एक कट्टा आलू बाहर निकालने के लिए उन्हें 170 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। इसके अलावा, आलू की छंटाई से लेकर मंडी तक पहुँचाने की ढुलाई में 30 रुपये प्रति कट्टा अतिरिक्त खर्च हो जाता है। इस प्रकार, बाजार में ले जाने से पहले ही प्रति कट्टा 200 रुपये का खर्च आ रहा है, जबकि वर्तमान बाजार में आलू का भाव केवल 400 रुपये प्रति कट्टा ही मिल रहा है। लागत और किराए के बाद हाथों में बेहद कम रकम आने से किसानों की पूंजी भी सुरक्षित नहीं बच पा रही है।
खेती का रकबा घटाने लगे हैं किसान
शेर सिंह अकेले ऐसे किसान नहीं हैं, बल्कि उनकी यह पीड़ा अब मुरादाबाद के अधिकांश आलू किसानों की बन चुकी है। बाजार में फसल की लगातार बेकद्री से हताश किसानों ने इस साल खेती के दायरे को सीमित करने का मन बना लिया है। सलेमपुर बंगर गांव के ही एक अन्य युवा किसान विकास कुमार बताते हैं कि उनका पूरा परिवार पहले हर साल करीब 50 बीघा भूमि पर आलू की खेती करता था। परंतु, इस बार के हालात को देखते हुए उन्होंने केवल 15 बीघा में ही आलू की फसल लगाने की तैयारी की है।
विकास का तर्क है कि जब बाजार में फसल की लागत तक वसूल नहीं हो पा रही है, तो बड़े पैमाने पर खेती करने का कोई औचित्य नहीं बनता है। किसानों के पास पिछले साल का बचाया हुआ अपना खुद का बीज भी उपलब्ध है। जिन्हें आवश्यकता है, वे स्थानीय स्तर पर अन्य किसानों से कम कीमत पर बीज खरीद रहे हैं। यही कारण है कि कोई भी किसान महंगा सरकारी बीज खरीदने में अपनी रुचि नहीं दिखा रहा है। कुंदरकी क्षेत्र के किसान अमन सैनी भी सरकारी बीज की दरों को अधिक बताते हैं, जबकि नानकार गांव के मशकूर अहमद का कहना है कि खेती में लगातार जोखिम बढ़ रहा है और पिछले साल भी संतोषजनक भाव नहीं मिलने के कारण इस बार खेती बढ़ाने की हिम्मत नहीं हो रही है।
सरकारी बीज और सब्सिडी से भी दूरी
किसानों का कृषि बाजार से डगमगाया भरोसा इस बात से भी साफ झलकता है कि प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद सरकारी स्तर पर बांटे जाने वाले बीजों की मांग बेहद सुस्त है। जिला उद्यान विभाग की ओर से इस बार आलू किसानों के लिए कुल 312 क्विंटल प्रमाणित बीज आवंटित किया गया है। सरकार इस पर एक हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से सब्सिडी भी दे रही है, ताकि किसानों का वित्तीय बोझ कुछ कम हो सके।
इसके बावजूद, अब तक जिलेभर से केवल सात किसानों ने ही इसके लिए ऑनलाइन बुकिंग कराई है। विभागीय अधिकारी लगातार किसानों से संपर्क साधकर बीज की बुकिंग और वितरण को बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, किसानों की वर्तमान प्राथमिकता नए निवेश या महंगे बीज खरीदने के बजाय अपने कृषि खर्च को न्यूनतम करना और किसी तरह संभावित घाटे से बचना है।
इस संबंध में उप निदेशक उद्यान विनीत कुमार का कहना है कि विभाग की ओर से किसानों को विभिन्न माध्यमों और श्रेणियों में आलू के बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। प्रमाणित बीजों पर एक हजार रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी भी दी जा रही है और किसान इसके लिए बुकिंग भी करा रहे हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर किसानों का रुझान फिलहाल बेहद सतर्क रुख अपनाने का है।