संत कबीर नगर के पौली क्षेत्र में आधुनिक सजावट और बिजली की झालरों के कारण मिट्टी के दीये बनाने वाले कुंभकारों की आजीविका पर संकट गहरा गया है।
आधुनिक सजावट और बिजली की झालरों के बीच संत कबीर नगर में कुंभकारों का पारंपरिक कारोबार और आजीविका संकट में है, फिर भी वे परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
संत कबीर नगर जिले के पौली क्षेत्र में दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक तो बढ़ गई है, लेकिन यह चमक-धमक मिट्टी के दीये बनाने वाले कुंभकारों के चेहरों पर खुशी नहीं ला पा रही है। बाजार में आधुनिक सजावटी सामानों और रंग-बिरंगी बिजली की झालरों के बढ़ते चलन ने कुंभकारों की आजीविका पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। इसके बावजूद, अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए इन कारीगरों के हाथ आज भी चाक पर मिट्टी के दीये और दीपावली के पारंपरिक खिलौने गढ़ने में जुटे हुए हैं।
बदलते दौर में घटती मांग और पुराना अनुभव
क्षेत्र के कुंभकार परिवारों का कहना है कि एक समय ऐसा था जब उनकी दीपावली मिट्टी के दीये और खिलौने बेचकर ही जगमग हुआ करती थी। स्थानीय कुंभकार हरिराम, रामजस, महेंद्र और सुभाष ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि पहले दीपावली से काफी पहले से ही लोग मिट्टी के दीये खरीदने का इंतजार किया करते थे।
उस दौर में कारीगर खुद गांव-गांव जाकर दीये और खिलौने बेचा करते थे। वे गांव में किसी एक निश्चित स्थान पर बैठते थे, जहां ग्रामीण इकट्ठा होकर या तो नकद पैसे देते थे या फिर अनाज के बदले दीयों की खरीदारी करते थे। इससे एक तरफ जहां कुंभकारों की आजीविका आसानी से चलती थी, वहीं दूसरी तरफ हर घर की दीपावली मिट्टी के दीयों की प्राकृतिक रोशनी से रोशन होती थी।
जीविकोपार्जन का संघर्ष और उम्मीद के चुनिंदा ग्राहक
समय के साथ बाजार की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। बाजारों में चाइनीज और आधुनिक बिजली की झालरों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के सजावटी सामानों की भरमार हो गई है। इसका सीधा असर मिट्टी के बर्तनों और दीयों की मांग पर पड़ा है। कुंभकारों का कहना है कि अब केवल मिट्टी के बर्तन या दीये बनाकर परिवार का भरण-पोषण करना बेहद कठिन हो गया है। यदि आज भी पूरी तरह इसी पारंपरिक कारोबार पर निर्भर रहना पड़े, तो परिवार चलाना नामुमकिन सा हो जाता है।
हालांकि, इस निराशा के बीच कुछ उम्मीदें अभी भी बाकी हैं। आज भी समाज में ऐसे तमाम लोग मौजूद हैं जो मिट्टी के दीये जलाने की पुरानी परंपरा से जुड़े हुए हैं और आधुनिकता के इस दौर में भी कुंभकारों से दीये खरीदते हैं। यही समर्पित ग्राहक वर्ग इन कारीगरों की आखिरी उम्मीद और आजीविका का मुख्य सहारा बना हुआ है। भले ही अब पहले की तरह बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री नहीं होती है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक विरासत और परंपरा को बचाने की जिद के कारण ये कुंभकार हर दीपावली पर अपना चाक चलाना नहीं छोड़ते हैं।